सबिता बिश्वास
हमें अपनी विश्वविजेता लड़कियों की कितनी परवाह है?
फिरभी हमारी काली हिरणियों ने रिओ में रच दिये इतिहास।
साइना हारी, लेकन पिछले ओलंपिक में उनके हासिल कांस्य पदक को स्वर्ण पदक में बदलने की लड़ाई के सिलसिले में अपने से ऊंचे रैंक की जापानी खिलाड़ी नोजुमी ओकुहारा के खिलाफ सीधे सेटों से और मैच पायंट तक लगातार ग्यारह अंक लगातार जीतकर हैदराबाद की सिंधु ने साबित किया कि हमारी बेटियों में दम किसी से कम नहीं है। उन्होंने सेमीफाइनल में सेमीफाइनल में छठी रैंकिंग वाली जापान की नोजोमी ओकुहारा को सीधे सेटों में 21-19 और 21-10 से हराया। इसके साथ ही उनका रजत पदक पक्का हो गया है और अब वह स्वर्ण पदक के लिए जान लड़ाएंगी...
बिटिया जिंदाबाद। बिटिया को मौका देंगे तो वह जरूर कामयाबी के फूल खिलायेगी,
पितृसत्ता में कैद इस गुलाम देश की मानसिकता बदलना जश्न मनाने से कहीं ज्यादा था।

इसी तरह सेमीफानल में हारने के बावजूद फ्रीस्टाइल कुश्ती में रोहतक की लड़की साक्षी मलिक ने रेपेचेज के दो लगातार मैचों मे पीछे से पलटकर प्रतिद्वंद्वी को पटखनी देकर भारत के लिए स्वर्ण दपक जीत लिया।

बिनेश अगर जख्मी नहीं होती तो हमारी हिरणियों की कुलांचे कुछ और जलवा बहार होते।
हमारी आधी लड़कियां तो गर्भ से बाहर निकल ही नहीं पाती हैं। भ्रूण हत्या आज भी जारी है। जो बेटियां हमारी लाड़ली होती हैं, उन्हें भी हम अपने बेटों के मुकाबले में तवज्जो नहीं देते। पढ़ लिखकर जो काबिल बन जाती हैं, घर बाहर उत्पीड़न कामयाबी के बावजूद उनकी उपलब्धियां है। जबकि जीवन के हर क्षेत्र में उनका प्रदर्शन हमारे बेटों से बेहतर है।
ओलंपिक में भी यही हुआ है।

सिर्फ हमारी बेटियां देश का नाम रोशन कर रही हैं।
कामयाब और नाकामयाब बेटियां जिन्होंने हमें शर्मिंदा नहीं किया। हार में भी उनके पांव लड़खड़ाये नहीं। जैसी दीपा कर्मकार, तमाम ओलंपिक चैंपियनों और विश्व चैंपियनों का मुकाबला उसने एक बेशकीमती चैंपिंयन की तरह किया और कहीं भी उसके पांव डगमगाये नहीं। एकमात्र वहीं थीं जो फाइनल में फूल की तरह खिलखिला रही थीं।
जिस हाकी टीम पर हमारी उम्मीदें सबसे ज्यादा थीं, जिस पर सबसे ज्यादा खर्च हुआ, उसके खेल और हौसले का हाल यह है कि वह बेलज्यिम से भी हार गयीं।
लीड लेकर भी खेल के आखिरी मौके पर विपक्षियों को उनने जीत का जश्न मनाने दिया और हमारी नजर में वे हीरो हैं और जो जंग गरीबी से लेकर सामाजिक पारिवारिक दीवारों के खिलाफ, अटूट पितृसत्ता के खिलाफ लड़कर जीत की जिद के साथ मैदान में बहादुरी के साथ लड़ने वाली लड़कियों को हम उनकी हार के साथ ही भूला देंगे।

जो कामयाब इक्का दुक्का हैं, उनके चेहरे पर तिरंगा चस्पा करके अगले ओलंपिक तक हम जश्न मनाते रहेंगे।
सारा देश दीपा कर्मकार से पदक मांग रहा था और जजों ने अंकों में जो कटौती करके उसे पदक से वंचित कर दिया, उसके खिलाफ अपील करने के लिए भारत से कोई नहीं था। उसे फीजियो तक नहीं मिला, जबकि प्रुडोनोवा वल्ट में जान का इतना गंभीर खतरा है कि अमेरिकी 19 साल की अश्वेत जिमनास्ट सिमोन बाइल्स तक ने कह दिया कि दीपा पागल है कि वह ऐसा खतरनाक वल्ट करके जान का जोखिम उठाती है।
इन्हीं सिमोन बाइल्स ने जिमनास्टिक में चार स्वर्ण और एक कांस्य पदक जीत लिये।
बिना कुछ किये, यहां तक कि अगर कुछ अनहोनी हो जाती, उसके लिए कोई एहतियाती बंदोबस्त किये बिना सारा देश दीपा से पदक मांग रहा था।
गौरतलब है कि इस ओलंपिक से पहले दीपा ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय 77 पदक जीते, जिनमें 67 स्वर्ण पदक हैं और देश के मीडिया के फोकस में दीपा कहीं नहीं थीं।

खेल मंत्रालय को लगता था कि अगर दीपा पर खर्च किया तो वह बेमतलब है।
कुश्ती में जिस तरह बिनेश जख्मी होकर पदक से वंचित हो गयी, ऐसा हादसा दीपा के साथ नहीं हुआ गनीमत है। लेकिन बिनेश के लिए देश ने क्या किया या कांस्य पदक जीतकर भारत को पदक तालिका में दाखिला दिलाने वाली साक्षी मलिक की जीत में देश का क्या योगदान है, समझ में आने वाली बात है।
कामयाबी मिलती है तो सभी लोग सर माथे चढ़ा लेते हैं।
स्पांसर पूंजी लगाकर तुरत-फुरत कामयाबी की ब्रांडिग करने लगती है। हर कहीं स्वागत और सम्मान। 1984 में पीटी उषा नाम की पहली एथलीट के पदक से चूकने के बाद हमने जो देखा था, दीपा कर्मकार के मामले में भी वही करतब दोहराया जाना है।
हमें सानिया मिर्जा और साइना नेहावाल से भी उम्मीदें खूब थीं और उन्होंने निराश किया। निराश किया दीपिका कुमारी और बोम्मेला देवी ने। लेकिन इन लड़कियों ने दुनिया भर की काली और गोरी लडकियों के मुकाबले देश के लिए जो पदक जीतने की कोशिश की, वह बेमतलब नहीं है।

अभी इतनी बड़ी ओलंपिंक टीम के सारे भारतीय खिलाड़ी मैदान से बाहर हैं और अकेली जो पीवी सिंधु उम्मीद की किरण बनी हुई हैं, संजोग से वह भी लड़की है।
चक दे इंडिया में बेहतरीन तरीके से हमारी लड़कियों से होने वाले भेदभाव का इतिहास भूगोल बेपरदा कर दिया गया था। यह फिल्म भले सुपरहिट रही, लेकिन पितृसत्ता में हमारी महिला हाकी या महिला क्रिकेट टीम के लिए आम तौर पर मीडिया में कोई स्पेस नहीं होता, जबकि उनकी उपलब्धियां पुरुष टीम के मुकाबले कम नहीं होतीं।
ऐन मौके पर ओलंपिक जैसे मंच पर प्रदर्शन का दबाव उनपर 130 करोड़ जनाता का इतना भारी होता है कि साइना, सानिया और दीपिका कुमारी जैसी चैंपियन लड़कियों के कदम डगमगा जाते हैं।
गनीमत है कि प्रोफेशन सर्किट में होने की वजह से साइना या सानिया के लिए साधनों की कमी नहीं है और उनके पीछे तमाम बड़ी कंपनियां पूंजी लेकर खड़ी हैं। लेकिन जो लड़कियां भारत के कोने-कोने में एक मौके के लिए तरस रही हैं और मौका पाकर भी लगातार बेहतरीन प्रदर्शन करके असहाय होकर मैदान से बाहर हो जाती हैं जीत के बिना, उन सबका चेहरा दीपा का चेहरा है।
अमेरिका से लेकर सारे पश्चिमी देशों की एथलीटों को देखें, उनके आधे से ज्यादा पदक इन्ही काली हिरणियों के नाम हैं और हम अपने यहां आदिवासी और अछूत पिछड़ी काली लड़कियों औरगांव देहात दूरदराज की लड़कियों को कोई मौका देते ही नहीं है।

हर ऐसे मौके पर मत्रियों, सांसदों और अफसरान, राजनेताओं की मस्ती और बदतमीजियों से सारा देश शर्मिंदा होता है।
उनकी अय्याशी के लिए जो रकम खर्च होती है, ओलंपिक की तैयारी में उतनी भी रकम हम त्रिपुरा की तरह छत्तीसगढ़, झारखंड, ओड़ीशा, हिमालयी भूगोल और दलितआदिवासी भूगोल की लड़कियों पर खर्च करें तो हर ओलंपिक के बाद सर धुनने की नौबत नहीं आती।
खेल संघों की राजनीति और चयन में भेदभाव की वजह से विभिन्न स्पर्द्धाओं में हम स्रवश्रेष्ठ खिलाड़ियों को घर में बैठने को मजबूर करके ओलंपिक कूच करते हैं, तो ये टीमें हर मौके पर चारों खाने चित्त हो जाती हैं।
हर बार 130 करोड़ जनता किन्हीं खास चेहरों पर इतने थोक भाव से बाजी लगाती है कि इस 130 करोड़ की अपेक्षाओं की बाधा दौड़ पार करके निशाने साध कर उनके लिए कुछ कर पाना असंभव है।