सिंहासन खाली करो कि जनता आती है...............
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है...............
प्रत्यूष मिश्र
देश में आंदोलनों की बाढ़ है और पहली बार देश की जनता सचमुच इन आंदोलनों से जुडी हुई है या जुड़ना चाहती है और आन्दोलन करने वाले लोग किसी सियासी पार्टी के लोग न होकर जनता के बीच के लोग हैं जिन्हें आगे आकर अपनी आवाज को उठाना पड़ा है. .यह बातें किस ओर संकेत करती हैं........कि एक लोकतान्त्रिक देश में जहाँ देश की सबसे पुरानी पार्टी सत्ता में है ओर दूसरी बड़ी पार्टी विपक्ष की भूमिका में है से जनता का भरोसा उठ गया है.या अब पार्टियों की पहुँच आम जनता तक रह ही नहीं गई है . देश की दोनों बड़ी पार्टियाँ पिछले कुछ सालों में कहीं न कहीं जनता पर अपनी पकड़ कमजोर कर चुकी हैं.देश में सत्तारूढ़ कांग्रेस का हाल ये है कि उसके पास तीन ही चेहरे बचे हुए हैं सोनिया, राहुल ओर मनमोहन सिंह . इसके अलावा जो बचे खुचे चेहरे हैं वो राहुल या सोनिया के पीछे खड़े हुए नजर आते हैं.लेकिन पार्टी की मज़बूरी ये है कि राहुल सोनिया की तमाम कोशिशों के बावजूद जनता का विश्वास जीतने में पार्टी नाकाम रही है . दरअसल पार्टी के तमाम नेता चुनाव जीतने के बाद सीमित हो गए हैं.........और पार्टी चेहरों की कमी से जूझने लगी है.हालत यह है कि राहुल और सोनिया के अलावा जनता के साथ खड़े होने को ओर कोई नेता नजर नहीं आता .इसे कांग्रेस की मज़बूरी कहें या गाँधी परिवार की खुद को राजनीति में जीवित रखने की कवायद क्यूँकी जनता के लिए संघर्ष करने के नाम पर यही दोनों नजर आते हैं.बात चाहे भट्टा पारसोल में किसानो के साथ खड़े राहुल की हो या जन कल्याणकारी योजनायें बांटती सोनिया गाँधी की.इन दोनों के तमाम प्रयासों के बाद भी पार्टी का जनाधार लगातार गिर रहा है.क्यूंकि जिस राज्य में भी पार्टी की सरकार है वहां जमीनी स्तर पर पार्टी का कोई बड़ा चेहरा नहीं है जिसपर जनता ऐतबार कर सके . इसके उलट गैर कांग्रेसी राज्यों में भी आम जनता से जुड़ने वाला कोई कांग्रेसी नेता नजर नहीं आता जो मजबूत विपक्ष की भूमिका निभा सके .नतीजा आम आदमी ने भी कांग्रेस का हाथ छोड़ दिया है. उदाहरण के तौर पर राहुल के तमाम प्रयासों और रात्रि प्रवासों के बावजूद भी उत्तर प्रदेश में पार्टी तीसरे नंबर पर आती है. वहां भी एक रीता बहुगुणा को छोड़ दें तो कोई बड़ा चेहरा जनता की आवाज उठाता नहीं दिखता.कुल मिलाकर यह कांग्रेस के लिए शुभ संकेत नहीं है..क्यूंकि आम आदमी की बात करने वाली पार्टी में अब जनता का भरोसा थोडा कम ही है......
दूसरी तरफ चाल चरित्र और चेहरे की बात करने वाली भाजपा अब अपना रास्ता खो चुकी है..न तो पार्टी के पास जन कल्याणकारी मुद्दों को उठाने की ताक़त रह गई है और न ही सड़कों पर उतरकर संघर्ष करने की हिम्मत.और जो थोड़ी बहुत हिम्मत करके पार्टी कहीं पर किसी मुद्दे को उठाती भी है तो उसे जन समर्थन हासिल नहीं होता .महंगाई के मुद्दे को लेकर असम में पार्टी ने जनादेश माँगा तो जनता ने इसे नकारते हुए तरुण गोगोई को समर्थन दे दिया.इसका सीधा संकेत यह है कि पार्टी जनता से दूर हो गई है..और अब पार्टी कि भाषा जनता को समझ नहीं आ रही है.हिंदुत्व का मुद्दा भी बीते ज़माने की बात हो चुका है.और नए ज़माने में भाजपा आधारहीन हो चुकी है. यहाँ तक कि जिनके दम पर पार्टी खड़ी हुई थी उसके दो मजबूत स्तम्भ विहिप और RSS भी उससे दामन छुडाते हुए नजर आ रहे हैं.RSS का देश भर में बड़ा नेटवर्क है.और जनता के बीच जाकर काम करना उसका प्रमुख उद्देश्य इसीलिए अब तक भाजपा के पीछे खड़े होकर RSS जनता के सवालों को सरकार तक पहुँचाती रही.लेकिन अब जब जनता ने भाजपा को लगभग नकार दिया है rss भी अन्य विकल्प तलाशती नजर आ रही है .दरअसल देश में जो सवाल इस समय मुद्दा बने हुए हैं उनके घेरे में भाजपा भी है और इन सवालों पर भाजपा की चुप्पी उसके लिए घातक बन रही है.भ्रष्टाचार जैसे अहम् मुद्दे पर भी पार्टी की कमजोर पहल RSS और जनता दोनों को ही अखर रही है.शायद यही वजह है की दोनों अब भाजपा से दूरी बना रहे हैं..संघ अब अपनी साख को कायम रखने की कवायद में अन्ना और राम देव को समर्थन दे रहा है.RSS का इस तरह रामदेव और अन्ना को समर्थन देना कई सवाल खड़े करता है.जिनके जवाब खोजना इस पार्टी के लिए जरुरी हो चला है..
इन सारी बातों का मतलब यह निकलता है कि देश में सत्तारूढ़ पार्टी पर लोगो का विश्वास रह नहीं गया है और विपक्ष में बैठी पार्टी उसका विकल्प होने लायक नहीं है . मतलब पक्ष विपक्ष के बाद रह गई जनता जो अब कहीं न कहीं आंदोलनों कि भाषा समझने और बोलने लगी है.
(लेखक प्रत्यूष मिश्र जयपुर से प्रकाशित मासिक पत्रिका "शाइनिंग वर्डस" के मुख्य संपादक हैं)


