सिमट गई जन आंदोलन की ताकत तो अन्ना को एक भी ईमानदार नहीं मिला !
सिमट गई जन आंदोलन की ताकत तो अन्ना को एक भी ईमानदार नहीं मिला !
इस चुनाव के क्या मायने हैं !
डॉ. सुनीलम्
अब तक कुल 14 चुनावों में सक्रिय भागीदारी करने तथा सात चुनाव स्वयं लड़ने के बाद वर्तमान लोकसभा चुनाव में 20 लोकसभा क्षेत्रों में चुनाव प्रचार में शामिल होने के बाद यह लगा कि कुछ अनुभव तथा टिप्पणियाँ साझा की जाएँ। सभी चुनावों में पार्टी के नेता, उम्मीदवार, चुनाव चिन्ह, पार्टियों के नारे तथा बूथ प्रबंधन सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं।
लोकसभा आम चुनाव सामान्य परिस्थिति में हवा-लहर के आधार पर जीते जाते हैं, पार्टी के पक्ष में हवा बनाने का काम पूरे पांच साल उम्मीदवारों, पार्टियो तथा सरकारों द्वारा किया जाता है। चुनावों में फैसला तथ्यों के आधार पर नहीं नजरिए के आधार पर होता है। बोफोर्स घोटाले के असली आरोपी कौन थे, वे आज तक कानून की गिरफ्त में नहीं आये हैं लेकिन वीपी सिंह यह दृष्टिकोण बनाने में कामयाब रहे कि मिस्टर क्लीन कहे जाने वाले राजीव गांधी का परिवार घोटाले मे लिप्त है। जिसके परिणाम स्वरूप देश में सर्वाधिक बहुमत पाने वाला व्यक्ति अपनी पार्टी के हार का कारण बना। अब तो यह स्पष्ट है राजीव गांधी भ्रष्ट है, के नारे ने लोगों के मन में पैठ बना ली थी।
इसी तरह गरीबी हटाओ के नारे पर इंदिरा गांधी ने सरकार बनाई थी। एनडीए-भारतीय जनता पार्टी सत्ता में रहते हुए मतदाताओं को फीलगुड नहीं करा सकी। अबकी बार मोदी सरकार के नारे को काफी हद तक मतदाताओं के मन में बिठाने में कामयाब होती दिखाई पड़ रही है। अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी भी इसी तरह भ्रष्ट कांग्रेस सरकार को हटाने को लेकर तीन बार की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित तक कों हराने में कामयाब रही। चुनावों में प्रचार तंत्र की अत्यधिक अहम भूमिका रहती है, यह हजारों करोड़ का खेल है। कांग्रेस ने कहा नरेन्द्र मोदी ने प्रचार पर 10 हजार करोड़ खर्च किए। भाजपा लंबे समय से कहते आ रही है कि राहुल गांधी को स्थापित करने के लिए पांच हजार करोड़ रुपए खर्च कर विदेशी कंपनियों को ठेका सौंपा गया है। इस बार के चुनाव में कारपोरेट जो पिछले चुनाव तक खुल कर कांग्रेस के साथ खड़ा होता था, वह भाजपा के साथ खडा दिखाई पड़ता है। कांग्रेस ने अंबानी के साम्राज्य को पांच लाख करोड़ तक पहुंचाया, उसी लक्ष्य को लेकर अब नरेन्द्र मोदी अदानी को साथ लेकर आगे बढ़ गए है। पिछले पांच वर्षों में यूपीए सरकार के पांच लाख करोड़ के घोटाले सामने आए हैं। लेकिन न तो आम आदमी पार्टी ने उन 15 घोटालेबाजो को चुनाव हराने के लिए कमर कसी न ही भाजपा या तीसरे मोर्चे का कोई फोकस इन सीटो पर दिखलाई पड़ा। अन्ना हजारे भी इन 15 भ्रष्ट मंत्रियों के खिलाफ अच्छे उम्मीदवार मैदान में उतारने या उनका समर्थन करने में नाकाम दिखाई पड़े। सभी उम्मीदवारों को हराओ, नोटा के विकल्प को लेकर भी कोई ठोस प्रयास किसी ताकतवर जन संगठन द्वारा नही किए गए। हमने मध्यप्रदेश में छिंदवाड़ा में विधानसभा चुनावों में नोटा का प्रचार कर 40 हजार मतदाताओं को प्रेरित करने में कामयाबी हासिल की थी, लेकिन इस बार छिंदवाड़ा सहित पूरे प्रदेश में कहीं भी हमें नोटा के प्रचार की अनुमति नहीं दी गई। चुनाव आयोग ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशानुसार नोटा का विकल्प मतदाताओं के समक्ष न तो स्वयं पहुंचाने का कार्य किया और न ही हमें करने दिया।
आम आदमी पार्टी ने तकनीकी तौर पर 400 से अधिक उम्मीदवार लोकसभा चुनाव में उतारे लेकिन अधिकतर उम्मीदवारों की अनुभव हीनता, साधन हीनता, गत् पाच वर्षी में अपने चुनाव क्षेत्र में चुनावी दृष्टि से कार्य न किये जाने, स्टार प्रचारकों के अभाव कार्यकर्ताओं के टोटे के चलते देश भर में ताकतवर पार्टियों के आगे स्थान बनाने में नाकामयाब दिखलाई पड़े। हालांकि मीडिया ने आम तौर पर आप पार्टी के उम्मीदवारों का स्थानीय स्तर पर अच्छा साथ दिया। मेरा जिन 20 क्षेत्रों में दौरा हुआ वहां आंदोलन के प्रभाव क्षेत्र में सभी आप उम्मीदवार ताकतवर दिखलाई पड़े लेकिन 1800 बूथ तथा 16 लाख के चुनाव क्षेत्र में जनआंदोलनों के उम्मीदवारों की ताकत बहुत सीमित दिखलाई पड़ी।
अब तक के सभी चुनाव की तुलना के बाद यह खुलकर कहा जा सकता है कि पार्टियों नें करोड़ों रूपया बांटा तथा हर तरीके से मतदाताओं को उपकृत तथा प्रभावित करने का हरसंभव प्रयास किया। चुनाव आयोग नें होर्डिंग, बैनर, पोस्टर, झंडियाँ , वाल राइटिंग पर रोक लगाने में कामयाबी हासिल की, लेकिन पार्टियों के उम्मीदवारों ने एक-एक लोकसभा क्षेत्र में 200 से 500 वाहनों का इस्तेमाल किया। बड़े नेताओं की एक एक रैली में हजार दो हजार वाहनों से मतदाताओं को खुलकर ढोकर लाया जाता रहा। एक तरफ तो मतदान के दिन झाड़ू की टोपी पहनने वालों को मेरे सामने गिरफ्तार कर मेधा पाटकर के चुनाव क्षेत्र में स्वयं पुलिस को देखा गया। वहीं गत् तीन और चार बार से अपने मोहल्ले में मतदान कर रहे 50 हजार से एक लाख मतदाताओं के नाम एक एक क्षेत्र में कटे पाए गए। जिस पर चुनाव आयोग आज भी मौन है जबकि चुनाव आयोग को यह घोषित करना चाहिए था कि चुनाव नतीजो का अंतर यदि पात्र मतदाताओं जो वोट नही डाल पाए से यदि कम होता है तो उस क्षेत्र में पुनः मतदान कराया जायेगा।
यह जरूर कहा जा सकता है कि एक दशक पहले तक यूपी और बिहार में जिस तरह बूथ लूटने और छापने का काम अपराधियो द्वारा किया जाता था। इसका प्रत्यक्षदर्शी मैं जार्ज फर्नांडीज के मुजफ्फरपुर और भागलपुर के चुनाव में रहा हूँ, यह स्थिति अब समाप्त हो चुकी है। लेकिन चुनाव में जातिवादी और साम्प्रदायिक ताकतों का जबरदस्त प्रभाव बना हुआ है। मतदाता जाति, धर्म, क्षेत्र तथा लालच से उपर उठ कर वोट करें ऐसी परिस्थिति अभी देश में बनी नहीं है। अच्छे और योग्य उम्मीदवार चुनाव जीते यह विचार इस चुनाव में धरती पर उतरता दिखाई नही पड़ता।
अन्ना आंदोलन ने देश में निराशा के वातावरण में उम्मीद पैदा की थी। पहली बार किसी जनआंदोलन के चलते संसद और सरकार को घुटने टेकने पड़े थे। आंदोलन का नेतृत्व उस युवा तथा मध्यमवर्गीय तबकों द्वारा किया गया था जिन्हें आम तौर पर आत्मकेंद्रित, केवल अपने भविष्य और उन्नति को लेकर देखा जाता है। लेकिन इन तबकों ने साबित किया कि यदि नेतृत्व भरोसेमंद हो तो यह तबके अपना सबकुछ छोड़कर समाज और देश के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने को तैयार हो सकता है।
अन्ना टीम के कुछ सदस्यों की जल्दबाजी व महत्वकांक्षा के चलते यदि अन्ना आंदोलन में बिखराव नहीं हुआ होता तथा सभी लोकसभा क्षेत्रों में मतदाताओं ने अपने-अपने क्षेत्रों में स्वयं उम्मीदवार तय कर तथा अपना साधन लगाकर उम्मीदवार मैदान में उतारे होते तो, इस चुनाव में भले ही सफलता नहीं मिलती लेकिन आगामी चुनावों के लिए नींव तैयार हो जाती। आम आदमी पार्टी सहित देश में कोई भी पार्टी आज यह दावा करने की स्थिति में नहीं है कि उसने मतदाताओं के प्रस्ताव पर उम्मीदवार उतारा, मतदाताओं के संसाधनों से चुनाव लड़ाया तथा मतदाताओं की मंशा के अनुसार चुनाव घोषणा पत्र तैयार किया। इसके बावजूद भी आम आदमी पार्टी को देश भर में तमाम ऐसे नागरिकों का समर्थन प्राप्त हुआ जो राजनीति में परिवर्तन करना चाहते हैं। पहली बार किसी पार्टी ने जनआंदोलनों के 30 आंदोलनकारियों को अपना उम्मीदवार बनाया है। जो लोग राजनीति धोखा है, धक्का मारो मौका है, ऐसे तमाम आंदोलनकारियों को राजनीति में बदलाव के लिए चुनाव मैदान में उतारने में पार्टी कामयाब रही। लेकिन अन्ना आंदोलन को जिन करोड़ों युवाओं और मध्यमवर्गीय लोगों ने सफल बनाया था उन्हें देश के स्तर पर जोड़े रखने मे पार्टी नाकामयाब रही।
देश में व्यवस्था परिवर्तन चाहने वाले आम नागरिकों के मन में चुनाव अभियान के दौरान तथा मतदान के दिन जो शमशानी भाव पैदा होता है कि चुनाव सुधार ही सबसे बड़ा मुद्दा है, वहीं भाव यह लेख लिखते समय मेरे मन में है। लेकिन सरकार कोई भी बनाये, विपक्ष में कोई भी रहे, किसी भी पार्टी, नेता व सरकार के लिए चुनाव सुधार सर्वोच्च प्राथमिकता रहने वाली नहीं है। ऐसी स्थिति में एकमात्र आशा की किरण देश का आम आदमी-औरत ही रह जाता है, जिसकी दम पर समाज और देश के बेहतर भविष्य की उम्मीद की जा सकती है।
जनादेश न्यूज़ नेटवर्क


