सियासत की आखरी बाजी हारे मुलायम पर एक पिता के रूप में बड़ी जीत
महेंद्र मिश्र

सपा मुखिया मुलायम सिंह की हार में भी उनकी जीत है। पुत्र को स्थापित करने के लिए पिता के धृतराष्ट्र बनने की कहानियां आम हैं। लेकिन यहां तो पुत्र से दुश्मनी पिता का सपना पूरा होने की कसौटी बन गई है।
दरअसल राजनीति में परिस्थितियों और मौकों का बड़ा महत्व होता है। सपा आज जहां खड़ी है अखिलेश उसके स्वाभाविक नेता बन गए हैं। मुलायम के कुदरती और राजनीतिक वारिस भी वही हैं। उनको बढ़ाने और स्थापित करने में मुलायम का ही हाथ रहा है। लेकिन साढ़े चार साल के शासन में उन्होंने अपनी एक स्वतंत्र छवि और वजूद कायम कर लिया है। और यह मुलायम सिंह और सपा की परंपरागत छवि को भी पार कर जाती है। जिसमें अपराधी माफियाओं का विरोध है तो विकास की नई संभावनाएं भी हैं। अब समय के इस चक्र को पीछे नहीं लौटाया जा सकता है। न ही किसी दूसरे नेता को उसकी जगह स्थापित किया जा सकता है।

लेकिन इस पूरे मामले में मुलायम सिंह की भी मजबूरी को समझना होगा।
नेताजी अभी भी अपने परिवार के साथ रहते हैं और अखिलेश को चुनकर बाकी को वो छोड़ भी नहीं सकते हैं। वो चाहे साथ रहने वाली पत्नी हों या फिर 30 सालों से साथ दे रहे छोटे भाई शिवपाल। बाकी जिंदगी भी मुलायम जी सुकून से जिएं और उनकी राजनीतिक विरासत भी सुरक्षित रहे। इस लिहाज से उनके लिए यही रास्ता हो सकता था। इसमें अखिलेश उनके जीते जी पूरी तरह स्थापित हो जाएंगे और परिवार के प्रति उनके समर्पण पर भी आंच नहीं आएगी।

मुलायम सिंह शिवपाल के साथ-साथ अपनी पत्नी से घिरे हुए हैं। ऐसे में उनको छोड़कर सीधे अखिलेश के पक्ष में खड़ा होना उनके लिए मुश्किल था।
सरकार से बाहर किये जा चुके शिवपाल को एक ही बार में पार्टी के अधिकारों से भी बेदखल नहीं किया जा सकता था। लेकिन साथ ही सत्ता की कमान के साथ-साथ पार्टी और चुनाव की कमान भी अखिलेश को देनी थी। ऐसे में इस काम को भी अब पिछली बार की तरह जनदबाव में पूरा किया जाएगा। जिसमें आखिरी तौर पर एक बार फिर शिवपाल आगे आ कर समर्पण कर सकते हैं। और फिर कुछ प्रत्याशी बदले जाएंगे और अखिलेश के नेतृत्व में चुनाव लड़ने की घोषणा होगी। क्योंकि पार्टी के बंटवारे से सबका नुकसान है।
हां ये बात जरूर है कि राजनीति के हर अखाड़े में जीतने वाला ये पहलवान आखिरी बाजी हारता दिख रहा है। लेकिन ये हार भी अपने बेटे से मिल रही है इसलिए एक नेता के तौर पर भले ही कुछ अपमानजनक हो लेकिन एक पिता के रूप में बड़ी जीत है। क्योंकि पिता खुद को खत्म कर भी अपने बेटे को स्थापित करना चाहता है। ऐतिहासिक बाबर से लेकर पौराणिक दशरथ तक यही कहानी है।