सिर्फ नारा होकर न रह जाये हिंदी-चीनी, भाई-भाई
सिर्फ नारा होकर न रह जाये हिंदी-चीनी, भाई-भाई
अरुण तिवारी
भारत-चीन, एशिया के दो पड़ोसी देश! दुनिया के दो बड़ी अर्थव्यवस्थायें !! यदि ये एकजुट होकर एक-दूसरे के विकास में जुट जायें तो दुनिया की दूसरी ताकतें पानी मांगने लगें। यह कितना सुंदर सपना है। किंतु एक ओर चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के दौरे को दोनो देशों के लिए उत्साह का मौका बताना और दूसरी ओर लद्दाख सीमा पर भारतीय सैनिकों की घेराबंदी ! 1000 सैनिकों की घुसपैठ!! तंबू गाड़ कर भारतीय इलाके को अपना बताना, चुमार सैक्टर सीमा पर खुद सड़क बनाना और भारत की जमीन पर दमचोक में भारतीय नहर का काम रोकने को बाघ्य करना; ये कितनी बुरी बात हैं। 18 सितम्बर, 2014 - चीन-भारत शिखर वार्ता का दिन! एक ओर चीनी सेना का वापस जाने से इंकार करना और दूसरी ओर चीन के विदेश मंत्रालय का कहना कि घटना पर तत्काल और प्रभावी संचार के जरिए, प्रभावी रूप से काबू पा लिया गया है। वर्ष 2014 के दौरान चीनी सेना द्वारा भारतीय सीमा में की गई यह 335 वीं घुसपैठ है। यदि भारत-चीन का यही भाईचारा है, तो शक करने की कोई गुंजाइश नहीं कि हिंदी-चीनी भाई ! भाई!! सिर्फ एक नारा है। यदि कोई एक ओर भारत के प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर चीनी निवेश का उपहार की खबर लेकर आये और दूसरी ओर भारतीय सरहद पर गुर्राये, तो ऐसा व्यापारी भारत को कितना खुश रखेगा ?
मैं यह कोई एक वाक्ये के आधार पर नहीं कह रहा। मुझे पूर्ववर्ती संप्रग सरकार तत्कालीन भारतीय रक्षा मंत्री श्री एंटोनी दौर के ऐन वक्त चीनी मेजर जनरल लुओ युआन के गुर्राना याद है। हमें कई घटनाओं को सिलसिलेवार याद करने की जरूरत है। पिछले साल हेलीकॉप्टरों के जरिए की गई पीपुल्स लिबरेशन आर्मी की घुसपैठ। आई टी बी पी व भारतीय सेना के तंबुओं को उखाड़ा जाना। देपसांग घाटी चीनी घुसपैठ। सीनाजोरी का सबूत लगाया गया बोर्ड - ’’आप चीन की सीमा में है।’’ 21 दिन के गतिरोध के मामला सुलझा; वह भी भारत द्वारा निगरानी टॉवर हटाये जाने के बाद। गत वर्ष 12 जून को इलाके के राजनीतिक नक्शे के साथ सुल्तान चकु के समीप तीन चीनी नागरिकों को पकड़े जाना। चीन द्वारा लद्दाखी जैवसंपदा के पेटेंट की खबर। 17 जून को लद्दाख के चुमार सेक्टर में फिर घुसपैठ। भारतीय बंकरों को ध्वस्त करना और तार काटकर निगरानी कैमरों को उठा ले जाना।
यदि लंबे अरसे से चीन द्वारा की जा रही भारत की घेराबंदी और उकसावे की ऐसी हरकतों के अंतर्संबंधों को देखें, तो कह सकते हैं कि भारत के प्रति चीन की हरकतें कभी पाक साफ नहीं रहीं। एक भाई जैसी तो कतई नहीं। तिस पर गौर करने की बात है कि संघि शर्तों के खिलाफ तिब्बत की स्वायत्ता पर तो उसका कब्जा पहले से है। अरुणाचल प्रदेश पर वह दावा ठोकता ही रहा है और अब लद्दाख पर भी ड्रैगन ने दांत गाड़ने शुरु कर दिए हैं। आप पूछ सकते हैं कि चीन ऐसा क्यों कर रहा है ? क्या भारतीय अर्थव्यवस्था उसे किसी तरह की चुनौती दे रही है ? क्या वह पाकिस्तान के साथ मिल गया है ? क्या वह भारत की अमेरिकापरस्ती से खफा है या कि कारण कुछ और हैं ?
तिब्बत समर्थन का खफा चीन
कारण कई हो सकते हैं, लेकिन चीन द्वारा भारत विरोध का एक बड़ा कारण तिब्बत की स्वघोषित सरकार के प्रधानमंत्री, दलाईलामा व तिब्बती आंदोलनों को भारत द्वारा दिया जा रहा अघोषित समर्थन है। बॉर्डर तो बहाना है। असल नाराजगी तो तिब्बत में चीनी अत्याचार का सच बाहर आने से है। ’’धर्मगुरु दलाई लामा का 78वां जन्मदिन मनाने वालों पर चीनी पुलिस ने तिब्बतियों पर बरसाई गोली। दो घायल, 20 हिरासत में।’’ ऐसी घटनाओं के सच के सूत्र भारत में रह रहे तिब्बती ही हैं; अन्यथा चीन वहां गई मीडिया, व्यापारिक व सामाजिक टोलियों को हमेशा वही दिखाता और सुनाता रहा है, जो उसे दुनिया को दिखाना और सुनाना होता है।
याद कीजिए कि कुछ माह पूर्व तिब्बती सूत्रों के हवाले से यह जानकारी लीक हुई कि चीनी चक्रव्यूह के खिलाफ एक सैकड़ा से अधिक तिब्बती आत्मदाह कर चुके हैं। गौर करने की बात है कि मीडिया में खबर यह नहीं आई। चीनी सूत्रों के हवाले से 23 फरवरी, 2013 को भारतीय मीडिया में खबर आई आत्मदाह के लिए उकसाने वाले पांच तिब्बतियों की गिरफ्तारी की। इसे खास तौर पर प्रचारित किया गया कि आरोपियों मे एक बौद्ध भिक्षु भी है; ताकि उंगली अप्रत्यक्ष रूप से तिब्बतियों के आदरणीय अध्यात्मिक गुरु दलाई लामा पर भी उठाई जा सके। संयुक्त राष्ट्र संघ समेत उन सभी का मुंह खुलने से पहले ही बंद किया जा सके, जो मानवाधिकार के नाम पर चीन पर उंगली उठा सकते हैं। वह नहीं चाहता कि तिब्बत में उसकी दादागीरी के खिलाफ भारत कोई गांधीगीरी दिखाने की हिमाकत करे। चीन समझता है कि भारत अपनी सीमा बचाने की चिंता में तिब्बतियों की चिंता करना बंद कर देगा।
कितनी जायज हमारी चुप्पी ?
भारत को लेकर चीन की नीयत कभी ठीक नहीं रही। यह दूसरा ऐसा सच है, जिसे झुठलाया नहीं जा सकता। हां ! कुछ समय के लिए आंखें मूंदी जरूर जा सकती हैं। यह आंखें मूंदे रखने का ही नतीजा है कि भारत की 43,800 वर्ग किलोमीटर जमीन हथियाये बैठे चीन के एक सैन्य अधिकारी ने उलटे भारत पर चीन के 90 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल कब्जाने का झूठा आरोप लगाने की जुर्रत की। इस खबर से न भारत बेचैन हुआ और न हमारा धैर्य टूटा। पूर्व भारतीय रक्षा मंत्री भी सैन्य अधिकारी के बयान को अनाधिकारिक टिप्पणी मानकर चुप रहे। मुझे ख्याल है कि ब्रह्मपुत्र पर चीन द्वारा तीन नये बांधों की मंजूरी की खबर आने पर वर्तमान केन्द्रीय मंत्री नजमा हेपतुल्ला ने तब बतौर विदेश मामला समिेति सदस्य रही इसे गंभीर मसला बताते हुए समिति में उठाने की बात जरूर कही थी, लेकिन रक्षा मंत्री श्री एंटोनी का रवैया तब भी यही था - ’’अभी प्रतिक्रिया देना जल्दबाजी होगी।’’
पिछले आधी सदी में आई पूर्ववर्ती सभी भारतीय सरकारों को दाद देनी होगी कि चीन कुछ भी करे, उसने तो जैसे चुप्पी न तोड़ने की कसम खा रखी है। विरोध भी बस! औपचारिक आपत्ति दर्ज कराने तक ही सीमित रहता है। कभी-कभी तो सरकार यह दिखाने की भी कोशिश करती है कि चीन के साथ हमारे संबंध काफी ठीक-ठाक हैं। पाकिस्तान और चीन... विरोध के दो-दो मोर्चे एक साथ खोलने से बचने के लिए चुप्पी रणनीतिक हो सकती है। उकसावे में न आने को कोई समझदारी कह सकता है। लेकिन यह कोई पहली बार नहीं है। भारत पर चीन अपना दखल और दबाव.. दोनों लगातार बढ़ा रहा है।
बढ़ता दखल और दबाव
दलाई लामा को लेकर वह आये दिन भारत से अपना विरोध दर्ज कराता ही रहता है। भारत यह कैसे भूल सकता है कि संयुक्त राष्ट्र सभा की सुरक्षा समिति के शेष चारों सदस्य भारत को सदस्यता दिए जाने के पक्ष में है; बावजूद इसके चीन भारत की सदस्यता का कट्टर विरोध से कभी पीछे नहीं हटा। चीन आज भी अरुणाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और दक्षिण चीन सागर के कुछ विवादित द्वीपों को अपने नक्शे का हिस्सा बनाकर पेश कर रहा है। चीनी नागरिकों के ताजा पासपोर्ट पर छपा नक्शा इसका प्रमाण है। अरूणाचल प्रदेश को वह ’दक्षिणी तिब्बत’ कहता ही है। ’’हिंदी-चीनी! भाई-भाई!!’’ के नारे के बाद से लेकर अब तक चीन ने भारत के साथ यही सब किया है। चीन एक ओर भारत के पड़ोसी मालदीव, नेपाल भूटान और श्रीलंका के साथ अपने संबंध मजबूत कर रहा है और दूसरी ओर भारत की समुद्री सीमा में अपनी मौजूदगी बढ़ा रहा है। भूटान में फिलहाल सत्ता बदल गई है। लेकिन पूर्ववर्ती सरकार द्वारा की जा रही भारत की अनदेखी क्या भुलाने लायक है ? क्या भारत सरकार के आंख मूंद लेने से लद्दाख से लेकर उत्तर-पूर्व पर आसन्न चीनी खतरा टल जायेगा ? ...या भारत अभी इतना कमजोर है कि चुप्पी साधने में ही भलाई है ? आजकल ये सभी सवाल भारतीय नागरिकों के मन में उठ रहे हैं ? इन सवालों का जवाब विशेषज्ञ तलाशें और स्वयं प्रधानमंत्री जी भी।
महात्मा बुद्ध और जातक कथायें इस बाबत् क्या कहते हैं ? मालूम नहीं। किंतु विशेषज्ञों का मानना है कि चीन की चाल पर भारत की चुप्पी आगे चलकर चीन के प्रति भारतीय विदेश नीति की दूसरी बड़ी गलती साबित होगी। पहली बड़ी गलती पंचशील समझौता था। इस समझौते के तहत् 1954 में ही भारत ने तिब्बत पर से अपना दावा छोड़ दिया था; जिसका नतीजा तिब्बत और भारत दोनों आज तक भुगत रहे हैं। चीन तिब्बत की धरती का इस्तेमाल लगातार भारत के खिलाफ तैयारी में करता रहा है। कांटे से ही कांटा निकलता है। चीन के भारत पर बढ़ते दबाव व दखल का समाधान भी तिब्बत और तिब्बत शरणार्थियों के मसले के समाधान से ही निकलेगा। भारत सरकार जागेगी या चीन की नई चाल के बावजूद सोती रहेगी ? संसद तय करे।
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