पांच छात्राओं पर गर्भवती महिला से मार-पीट का आरोप

स्त्री-अधिकार क्या सिर्फ पढ़ी-लिखी लड़कियों के लिए है

.सीत मिश्रा

हरियाणा की सोनिया चेतन सिंह का आरोप है कि हिंदी विश्वविद्यालय में पढ़ने वाली पांच छात्राओं ने उनके साथ मार-पीट की जिससे उनके पेट में पल रहे लगभग दो महीने के बच्चे की मौत हो गई.

पूरा मामला क्या है ?—

सोनिया सिंह से बातचीत के क्रम में उन्होंने बताया कि —

“ मेरी शादी के कुछ दिनों बाद मेरे पति पर वर्धा हिंदी विश्वविद्यालय में पढ़ने वाली छात्रा ने जबरन शारीरिक संबंध बनाने का आरोप लगाया. उनके वर्धा लौटने पर वर्धा पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया. मामले को जानने-समझने के लिए जब मैं वर्धा पहुंची तब मुझे बहुत ही मुश्किलों का सामना करना पड़ा. मैंने मेरे पति के सभी मित्रों को फ़ोन किया कि रात में कहीं ठहरने की व्यवस्था करवा दें लेकिन सभी ने भी सहायता करने से इनकार कर दिया. मैं जैसे-तैसे रेलवे प्लेटफार्म पर रही और अपने पति की बेल करवायी.

मैंने इस मामले में अपने पति का साथ इसलिए भी दिया क्योंकि आरोप लगाने वाली छात्रा ने एक ख़त में इस बात का विस्तार से जिक्र किया था कि ‘चेतन सिंह कहीं भी शादी करने के लिए स्वतंत्र है’. और भी कुछ ऐसे सबूत मिले जिससे यह साबित हो रहा था कि मेरे पति को जबरन फंसाया जा रहा है. जैसे कि छात्रा का आरोप था कि चेतन मुझसे जबरदस्ती शारीरिक संबंध बनाता था. जबकि मेरी शादी से पूर्व दोनों के बीच के शारीरिक संबंध के अनुभवों का विस्तार से रजामंदी का जिक्र भी छात्रा ने किया है. जिसे जल्द ही मैं कोर्ट में पेश करुँगी.”

“जब मैं अपने पति की बेल के लिए भाग-दौड़ कर रही थी तब मुझे कुछ लड़कियों ने बुलाया था जिसमें आरोप लगाने वाली छात्रा के साथ उनकी सहेलियां भी थी. बातचीत के क्रम में जब मैंने कहा कि मैं आपके आगे हाथ जोड़ती हूँ उन्हें झूठे केस में मत फंसाइए तो उसमें से एक लड़की कहा कि ‘पैर पकड़ो और अपने पति को तलाक़ दो’. मैं डरी हुई थी मुझसे उन लोगों ने पैर भी पकड़वाए.

“खैर बेल पर रिहा होने के बाद हर हफ्ते मेरे पति को थाने में हाजिरी लगानी पड़ती थी इसलिए हम लोग वर्धा के पंजाब कॉलोनी में रहने लगे.

03.05.2018 की शाम मैं अपने पति के साथ किराना दुकान से सामान लेकर जा रही थी तभी अचानक 5 लड़कियों ने हमारे साथ मार-पीट की. मैंने कई बार हाथ जोड़े कि मुझसे दूर रहिये, मैं एक प्रेग्नेंट महिला हूँ लेकिन उन्होंने मुझे भी धक्का दिया. इस घटना के कारण मैंने अपना बच्चा खो दिया.

“पुलिस में शिकायत और मेडिकल रिपोर्ट के बाद हमने विश्वविद्यालय प्रशासन को शिकायत की जिसका कोई परिणाम नहीं निकला. और तो और फेसबुक पर मेरे पति को बलात्कारी और मुझे धोखेबाज तक लिखा गया. इसकी शिकायत भी हमने विश्वविद्यालय के अधिकारी से की लेकिन उन्होंने कोई भूमिका नहीं निभाई.”

पीड़िता ने यह भी स्पष्ट किया कि जब कुछ दिनों बाद विश्वविद्यालय के छात्रों ने उनके पक्ष में उस घटना का जिक्र (लड़कियों का बिना नाम लिए) किया तब उन्होंने एक महिला अधिकारी से मिलकर सहयोग करने वाले छात्रों पर कारवाई करवाने की कोशिश की.

पीड़िता का स्पष्ट आरोप है कि विश्वविद्यालय के कुछ अधिकारी उन लड़कियों को संरक्षण दे रहे हैं. इतना ही नहीं विश्वविद्यालय के अन्दर कार्यरत दलित संगठनों को भी दवाब बनाकर अपने पक्ष में खड़ा करने की कोशिश की जा रही है, जबकि मैं (पीड़िता) स्वयं एक दलित हूँ.

इस पूरे प्रकरण पर पीड़िता बताती हैं कि –

“मैं बेहद दुखी महसूस कर रही हूँ. जिस समाज में लड़कियों को आज भी उतनी आजादी नहीं मिल रही है उसी समाज में ये लड़कियाँ कैसा माहौल बना रही हैं. स्त्री-अधिकार क्या सिर्फ इन पढ़ी-लिखी लड़कियों के लिए है. इस केस के दौरान मैंने यह जाना कि जो भी लड़के इनकी बात नहीं मानते हैं ये उसे स्त्री-अधिकारों का दुरूपयोग कर निकलवा देती हैं. दुःख की बात है कि इनकी पढ़ाई-लिखाई सिर्फ अलगाव को पैदा कर रही हैं. मैं इस बात के लिए भारत सरकार से भी अपील करुँगी कि इनके अधिकारों की समीक्षा की जाए.”

कहते कहते पीड़िता रोने लग जाती है.”

पीड़िता के सवाल और जवाब बेहद गंभीर हैं क्योंकि इस तरह की घटनाएँ निश्चित रूप से स्त्रियों की छवि को धूमिल करती हैं. हालांकि दूसरे पक्ष से बातचीत करने की कोशिश की गई लेकिन बातचीत हो नहीं पाई.

(सीत मिश्रा

स्वतंत्र पत्रकार

अंधेरी वेस्ट

महाराष्ट्र )