स्थायी आसरा तलाशती जयपुर बम कांड की विशेष अदालत
स्थायी आसरा तलाशती जयपुर बम कांड की विशेष अदालत
संजय स्वदेश
क्या आपको 13 मई 2008 का दिन याद है। याद नहीं है तो याद करें, इस दिन गुलाबी नगरी जयपुर आतंकवादियों के बम धमकों से लहुलुहान हो गया था।
घटना के करीब तीन साल हो गये। इस बम कांड की की सुनवाई के िलए एक विशेष अदालत का गठन किया गया था। लेकिन यह अदालत अभी भी अपना स्थायी ठिकाने की तलाश में है। विशेष अदालत अपने गठन के बाद अब तक दो जगहों पर स्थानांतरित हो चुकी है। साथ ही अदालत के पीठासीन अधिकारी के स्थानांतरण होने के कारण पिछले डेढ़ माह से अदालत में काम के नाम पर केवल तारीखें ही मिल रही है।
13 मई 2008 को जयपुर में हुए सिलसिलेवार बम धमाके होने के बाद एटीएस ने एक-एक कर करीब आठ आरोपियों को गिरफ्तार किया। इसमें से चार आरोपियों शाहबाज हुसैन, मोहम्मद सैफ, मोहम्मद सरवर आजमी और सैफूर उर्फ सैफुर्रहमान के खिलाफ चालान भी पेश हो चुका है। आरोप पत्र पेश होने के बाद मामले की सुनवाई कुछ दिनों तो एडीजे फास्ट टैÑक क्रम-1 में चली, बाद में राज्य सरकार ने स्पेशल जयपुर बम ब्लास्ट अदालत खोलने के आदेश जारी कर चंद्रशेखर आजाद को पीठासीन अधिकारी के तौर पर नियुक्त किया। आरंभ में अदालत के लिए जगह नहीं होने पर अनुसूचित जाति/जनजाति की खाली चल रही अदालत में बम ब्लास्ट अदालत खोली गई। लेकिन यहां पीठासीन अधिकारी नियुक्त होने के बाद अदालत ‘बेघर’ हो गई। एक बार फिर स्थाई जगह नहीं देखकर अदालत को खाली चल रही साम्प्रदायिक दंगा/मानसिंह हत्याकांड मामलों की विशेष अदालत में शिफ्ट कर दिया गया। कुछ दिनों तक तो मामले की यहां सुनवाई हुई, लेकिन फिर वहीं कहानी दोहराई गई। इसी बीच गत दिसंबर में पीठासीन अधिकारी का स्थानान्तरण हो गया और साम्प्रदायिक दंगा अदालत में भी पीठासीन अधिकारी नियुक्त हो गए, जिससे बम ब्लास्ट अदालत को यहां से हटा दिया गया। वर्तमान में अदालत के पीठासीन अधिकारी नहीं होने के कारण अदालत का चार्ज आवश्यक वस्तु निवारण अधिनियम मामलों की विशेष अदालत को दे दिया गया है। हालांकि बम ब्लास्ट अदालत का कार्यालय तो सांप्रदायिक दंगा अदालत कक्ष में ही एक कोने में चल रहा है। लेकिन यदि इस अदालत के लिए किसी न्यायिक अधिकारी की नियुक्ति होती है तो प्रकरणों की सुनवाई के लिए अभी कोई जगह बम कांड की विशेष अदालत के लिए तय नहीं है।
बम कांड के इस न्याय से अनुमान लग जाता है कि सरकार की न्यायिक व्यवस्था अतंकी घटनाओं में सुनवाई को लेकर कितनी गंभीर है। न्यायालय की लंबी न्यायायिक प्रक्रिया हमेशा चर्चा का विषय रही है। अदातलतों में केसों के अंबार और जजों की कमी के कारण लोगों को समय पर न्याय नहीं मिल जाते हैं। लेकिन जब मामला राष्टÑ से सम्मान से जुड़ा हो तो न्यायिक प्रक्रिया में प्राथमिकता मिलनी चाहिए। मुंबई के 26/11 कांड में कंसाब पर सुनवाई की प्रक्रिया काफी तेज चली। फिर भी मामला लटका हुआ है। अतंकवादी गतिविधियों में देश के लचीले देर न्यायायि प्रणाली के कारण भी आतंकवादियों के हौसले बुंलद रखते हैं।
लेखक दैनिक नवज्योति में समाचार संपादक हैं.


