स्वैप मशीन का मालिक भिखारी ही बना रहेगा यानी बड़ी मंदी आने वाली है
स्वैप मशीन का मालिक भिखारी ही बना रहेगा यानी बड़ी मंदी आने वाली है
स्वैप मशीन का मालिक भिखारी ही बना रहेगा यानी बड़ी मंदी आने वाली है
महेंद्र मिश्र
मुरादाबाद में प्रधानमंत्री ने कहा कि आजकल भीख मांगने वाले भी स्वैप मशीन रख रहे हैं।
उनके इस वक्तव्य के गहरे निहितार्थ हैं।
ऐसा नहीं है कि मोदी जी किसी दूसरी दुनिया से आए हैं। उन्हें भारत के बारे में नहीं पता है। या फिर अगले कुछ सालों में देश की कितनी आबादी कैशलेस हो जाएगी। और सबको कैशलेस करने के लिए कितना समय लग सकता है। या फिर तत्काल के लिए ये कितना कारगर होगा, इसका उन्हें अंदाजा नहीं है।
सच यही है कि हमसे 250 साल आगे रहने वाले अमेरिका की आधी आबादी ही कैशलेस हो पायी है।
दरअसल इसके जरिये मोदी जी ने आबादी के एक बड़े हिस्से को कम से कम तत्काल के लिए संतुष्ट कर दिया। उसके मन में ये सवाल पैदा कर दिया कि अगर भिखारी कैशलेस हो सकता है तो वो क्यों नहीं। और अगर ऐसा नहीं हो पा रहा है तो ये उसकी अपनी गलती है।
प्रधानमंत्री का इस समय कैशलेस पर जोर इसलिए है क्योंकि उन्हें पता है कि अगले 6-9 महीनों तक ये समस्या खत्म नहीं होने जा रही है। यह लोगों को मनोवैज्ञानिक स्तर पर रक्षात्मक बनाने की कोशिश है।
नोट छपने की गति धीमी होने और लोगों को कैशलेस करने के पीछे एक और ठोस वजह है।
दरअसल नोटबंदी की मूल वजह लिक्विडिटी यानी पैसे के संकट से जूझ रहे बैंकों को उससे उबारना था।
सरकार अपने इस मकसद में कामयाब रही है। लेकिन कारपोरेट को उसे लोन के तौर पर देने या फिर सरकार के किसी और खर्चे के लिए उनका बैंकों में बने रहना पहली शर्त बन जाता है।
बैंकों के पास पैसा होने पर उसके तत्काल बंट जाने या फिर उन्हीं जगहों पर पहुंच जाने की आशंका थी जहां से पैसे आये थे। ऐसे में कम से कम 9 महीनों तक उनके बैंकों में बने रहने की गारंटी है। फिर उनकी निकासी में भी कई महीने लग जाएंगे।
इस बीच कैशलेस होने से उन पैसों के एक बड़े हिस्से के हमेशा-हमेशा के लिए बैंकों में बने रहने की गुंजाइश पैदा हो जाएगी।
सच यही है कि कालेधन के खिलाफ चलाए गए इस कथित अभियान में सरकार को लाभ की बजाय घाटा ज्यादा होने जा रहा है।
अर्थशास्त्रियों का तो यहां तक मानना है कि पूरी कवायद में हुआ खर्च भी निकल आए तो बड़ी बात होगी। जिसमें यातायात से लेकर संसाधनों पर खर्च हुए 1 लाख करोड़ और नोट की छपाई के 18 हजार करोड़ रुपये शामिल हैं।
इस पूरी प्रक्रिया में मोदी जी ने खुद को एक ऐसे नेता के तौर पर पेश करने की कोशिश की है जो कालेधन के खिलाफ लड़ रहा है। भ्रष्टाचारियों को जेल भेजेगा और अमीरों का छीन कर गरीबों में बांटेगा।
पूरे अभियान को राष्ट्रवाद से जोड़ दिया गया है। माहौल यह बनाया जा रहा है कि राष्ट्रवाद के इस यज्ञ में सबको आहुति देनी पड़ेगी।
अगर इस दौरान कतार में खड़े कुछ लोगों या फिर अस्पताल में उनके परिजनों की मौत हो जाए। तो भी कोई बात नहीं है। ये एक तरह का बलिदान है। चूंकि ये सब कुछ मोदी जी की अगुवाई में हो रहा है इसलिए उनके प्रति आस्था और विश्वास की इस कड़ी को कमजोर नहीं होने देना है।
मोदी के प्रति ये भक्ति और जुनून बना रहे इसकी दो शर्तें हैं। सरहद और समाज दोनों के पारे को गरम रखना। सरहद के लिए भारत-पाक संघर्ष हथियार है। जबकि समाज में राष्ट्रवाद इसका मजबूत हथकंडा साबित हो रहा है। इन दोनों के होने पर न तो कोई तर्क चलेगा न ही विवेक की बात होगी। क्योंकि सब कुछ आस्था और विश्वास के भरोसे है।
अनायास नहीं किसी तांत्रिक के कहने पर कुछ लोग अपने बेटे-बेटी तक की बलि के लिए तैयार हो जाते हैं।
राष्ट्रवाद और मोदी भक्ति को कुछ उसी पैमाने पर ले जाने की कोशिश है। जिसमें कतार में खड़ा होना और मौत तक को बहुत छोटी चीज मान ली गई है। बल्कि एक दूसरे तरीके से इसे योगदान के तौर पर पेश किया जा रहा है।
राममंदिर आंदोलन के दौरान कुछ इसी तरह की स्थितियां थीं। जब लोग उन्माद में थे और किसी भी तरह की कुर्बानी देने के लिए तैयार थे। अब जब मामला शांत हो गया है तो लोग कितने ठगे महसूस करते हैं।
अनायास नहीं बार-बार की कोशिश के बाद भी बीजेपी उसे मुद्दा नहीं बना पा रही है।
ये कुछ और नहीं बल्कि कालेधन के खात्मे के नाम पर जनता के धन की खुली लूट है। जनता से लेकर उसे अदानी और अंबानी को सौंपने की तैयारी है। इससे बड़ी विडंबना क्या हो सकती है कि कोई अदानी और अंबानी की जेब में बैठकर अमीरों के खिलाफ लड़ाई की बात करे।
यह बात सही है कि स्थानीय स्तर पर कुछ पैसे वालों को परेशान होता हुआ देख कर जनता एक पल के लिए भले खुश हो जाए। लेकिन इससे उसका कोई दीर्घकालीन हित नहीं सधने जा रहा है। बल्कि शोषण पर खड़ी इस पूरी व्यवस्था के लिए जिम्मेदार कारपोरेट के खिलाफ गुस्से को एक सेफ्टी वाल्व जरूर मिल जाएगा। जिसका प्रधाननमंत्री स्थानीय स्तर पर बखूबी इस्तेमाल कर रहे हैं। ये उनके कारपोरेट संगी-साथियों को बचाने के लिए सबसे बड़ी ढाल का काम कर रहा है।
प्रधानमंत्री की नीयत में यहीं खोट दिखती है। जब वो अडानी और अंबानी के लिए धनबटोरो अभियान को कालाधन के खिलाफ लड़ाई का नाम दे देते हैं।
पनामाधारियों के गिरेबान पर हाथ रखने की जगह आम जनता को कतार में खड़ा कर देते हैं। और पूरी कवायद का नतीजा शून्य निकलता है।
इन सब प्रकरणों से एक बात साफ होती जा रही है कि मोदी जी का पैमाना गड़बड़ा गया है। उनकी निगाह में नौ लाख का सूट पहनने वाला फकीर होता है। और स्वैप मशीन भिखारियों का अभिन्न हिस्सा बन गयी है।
बस अब कुछ ही दिनों में शेर बकरी की रखवाली करने लगेगा। फिर उसी के साथ राम राज्य आ जाएगा। लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि दसियों हजार के खर्चे के बाद आने वाली स्वैप मशीन का मालिक भिखारी ही बना रहेगा। यानी बड़ी मंदी आने वाली है।


