अंशुमाली रस्तोगी

नेता कभी गलत नहीं होता। नेता कभी गलत नहीं बोलता। नेता कभी कुछ नहीं छिपाता। नेता कभी बुरा नहीं मानता। नेता नेता होता है। नेता से बड़ा कोई नहीं हो सकता।
बंधु, आप बेशक मेरे उपरोक्त कथन से सहमत न हों मगर मेरी निगाह में नेता की 'बहुत इज्जत' है। मैं नेता की कही हर बात को पत्थर की लकीर से भी बढ़कर मानता हूं। नेता ने जो कहा, जैसा कहा उस पर आंख-नाक-कान-मुंह बंदकर तुरंत विश्वास कर लेता हूं। सच में, मुझे अपनी पत्नी से कहीं ज्यादा विश्वास नेता की जुबान पर है। कम से कम इस बात की तो राहत है कि पत्नी की जुबान की तरह नेता की जुबान लंबी नहीं होती! नेता बेहद अल्प शब्दों में क्रिया पर अपनी प्रतिक्रिया जाहिर करता है। उसका दिल देखिए, वो बेचारा कभी यह खुशफहमी भी नहीं पालता कि जनता उसकी बात को कितना और कहां तक मानती है। उसने जो कह दिया, सो कह दिया। मानना या (ना)मानना आप पर।

नेता के भीतर मुझे सबसे उम्दा बात यही लगती है कि वो हमारी तरह न जिद्दी होता है न ही गुस्सैल। बेहद शांत, बेहद सौम्य और बेहद खुशदिल पसंद इंसान होता है। कम से कम मैंने तो अपनी जिंदगी में किसी नेता को जनता पर नाराज होते नहीं देखा। अब नेता की इससे बढ़कर दरियादिली और क्या होगी कि जूता खाकर भी वो हंसता रहता है। और जूता चलाने वाले को माफ भी कर देता है। आप चौराहे पर नेता का पुतला जलाएं या बीच बाजार उसकी अर्थी निकालें, बेचारा हर बेइज्जती को बिन कुछ कहे सरलता से सहन कर जाता है। बावजूद इसके जनता से यही अपील करता रहता है कि बस एक मौका और दें। क्या देखा नहीं है आपने वोट मांगते नेता के करबद्ध हाथों और चेहरे की सौम्य बनावट को।
जनहित की भलाई से नेता का पुराना नाता है। नेता का हर फैसला जन के हित में जाता है। जन के हित के अतिरिक्त खुद के हित के बारे में बेचारे नेता के पास समय ही नहीं होता सोचने का। अरे, आप यकीन तो करें नेता अगर निज-हित में भी लगा होगा, तो पहला ध्यान उसका जनहित पर ही केद्रित होगा। ए। राजा व कलमाडी जैसे नेता निजहित के साथ-साथ जनहित के भी स्तंभ-पुरुष रहे हैं। अब जनहित में से अगर उन्होंने कुछ अपना-अपना निजहित साध भी लिया, तो क्या गलत किया? आखिर इच्छाएं किसकी नहीं होतीं!

न न ऐसा कतई नहीं है कि नेता काम नहीं करते बस मौज ही करते रहते हैं। नेता पर देश और जन का भारी बोझ होता है। सिर्फ जनहित की खातिर हमारे कुछ नेताओं को संसद तक में उपस्थित रहने का समय नहीं मिल पाता। कभी-कभी तो जनता के लिए उन्हें सड़क तक पर उतरना पड़ता है। अभी हाल लाल चौक पर तिरंगा लहराने के बहाने कितने ही नेता सड़कों पर उतर आए। नेता का एकमात्र उद्देश्य यही होता कि बस जनता को हर कीमत पर न्याय मिलना चाहिए। अपने देश का लोकतंत्र अगर आज बचा हुआ है, तो यह सिर्फ और सिर्फ हमारे नेता के कारण ही है!
हमें हर पल यह कोशिश करते रहना चाहिए कि हम नेताओं की भावनाओं, उनके प्रगतिशील उद्देश्यों को समझें व गुनें। बेवजह किसी नेता को न गरियाएं। इधर मैं काफी दिनों से देख व पढ़ रहा हूं कि कुछ 'शरारती लोग' देश के नेताओं को महंगाई, भ्रष्टाचार, काले धन, घपलों-घोटालों आदि-इत्यादि के लिए जमकर बुरा-भला कह रहे हैं। ऐसा आचरण ठीक नहीं है। आप लोगों के इस 'घातक आचरण' से बेचारे नेताओं को कितनी तकलीफ पहुंचती होगी, क्या कभी सोचा है? अब इसमें बेचारे नेताओं की कहां और क्या गलती है कि महंगाई बढ़ रही है और भ्रष्टाचार कायम है। सीधा सा गणित है, जब जनसंख्या में वृद्धि होगी, तो खाने-पीने के दाम स्वतः ही बढेंगे। हमारे उन प्रिय नेताजी ने भी यही कहा था कि महंगाई सिर्फ इसलिए बढ़ रही है, क्योंकि लोग खाने ज्यादा लगे हैं। मैं उनकी बात का तहे-दिल से समर्थन करता हूं। हम अपने खाने पर कंट्रोल कर नहीं पा रहे और दोष रहे हैं बेचारे नेताओं और सरकार को। फिर महंगाई को अगर हम अपनी आदत में शामिल कर लेंगे, तो यह दिक्कत सामने आएगी ही नहीं।
यह देश बहुत अच्छा चल सकता है, बशर्ते हम नेताओं और सरकार के कामों में टांग न अड़ाएं। वे जो कर रहे हैं, उन्हें करने दें। उनकी बात का पालन करें। महंगाई, काला धन, भ्रष्टाचार जैसे 'हलके मुद्दों' पर उन्हें न घेरें। सब आपस में ही मिल-जुलकर सुलटा लें। नेताओं को देश चलाने दें, सिर्फ देश। साठ साल से ऊपर हो गए हमें आजादी हासिल किए हुए कम से कम अब तो हम अपनी-अपनी जिम्मेदारियों को समझें। आखिर कब तक छोटी-छोटी बातों के लिए कभी नेता तो कभी सरकार को यूंही परेशान करते रहेंगे!