अंशुमाली रस्तोगी

हम इंसान बात-बात पर चिंता जताने के अतिरिक्त कुछ और भी करते हैं! जब दिल करता है और जहां सुविधा महसूस होती है, बस चिंता जताने चल देते हैं। गजब यह है कि चिंता को कभी चिंता नहीं रहने देते। चिंता को इस भाव के साथ प्रकट करते हैं कि चिंता स्वयं चिंतन में डूब जाती है। जब भी मैं किसी चिंतित व्यक्ति को चिंता जतलाते देखता-सुनता हूं दूर से ही कट लेता हूं। क्या पता उसकी चिंता के कीटाणु कहीं मेरी चिंता में न फैल जाएं! यहां मैं अपनी ही चिंताओं से मुक्ति नहीं पा पाता ऐसे में किसी दूसरे की चिंता पर चिंतित होना मेरे लिए वाकई बड़ा कठिन है। इसीलिए मैंने अपने घर-परिवार व रिश्तेदारों को इस बात के सख्त आदेश दे रखे हैं कि कृपया वे अपनी ऐसी-वैसी चिंताएं मुझसे न बांटे। मैं चिंताओं के बीच खुद को बेहद असहज-सा महसूस करता हूं। चिकित्सकों की भी यह राय है कि चिंता दिमाग व सोच की दीवारों को कुंद करती है।

असल में, मैं बेहद चिंता-मुक्त जीवन जीने का हिमायती हूं। हर पल इस कोशिश में लगा-बंधा रहता हूं कि चिंता का चिंतन मुझे न घेरे। यह बात गौर-तलब है कि लेखक को चिंता पर चिंतन नहीं केवल 'चिंतन' करना चाहिए। चूंकि लेखक मैं भी हूं इसलिए यह बात मुझ पर भी साफ लागू होती है। अगर मैं ही चिंता के चिंतन में डूब गया तो फिर मेरे लेखन का क्या होगा? लेखन पर आ रही कमाई का क्या होगा? मेरे पाठक मेरे बारे में क्या सोचेंगे? यहां तो सबकुछ गड़बड़ा जाएगा। और, मैं नहीं चाहता कि मेरे चिंतित होने से मेरा लेखन, मेरी कमाई या मेरे पाठक जरा भी प्रभावित हों। मैं इनमें से किसी को भी निराश नहीं करना चाहता।

इधर, मैं लगातार देख-पढ़ रहा हूं कि यहां कोई महंगाई से चिंतित है तो कोई चीनी-दूध के दामों से। महंगाई पर चिंता जताने के लिए प्रदर्शन-आंदोलन किए-करवाए जा रहे हैं। नेताओं-मंत्रियों पर तमाम तरह के आरोप-प्रत्यारोप लगाए जा रहे हैं। जबकि सरकार का कहना है कि अगले माह महंगाई निश्चित कम हो जाएगी। पर, जनता को सरकार की चिंता से क्या मतलब। उसे तो बस अपनी ही चिंता का ख्याल रहता है। क्या एक लोकतांत्रिक देश के लिए यह शर्म की बात नहीं कि सरकार की चिंता का सबब जनता का प्रतिकार बने? अगर सरकार ही चिंता में डूब जाएगी तो फिर देश को कौन चलाएगा-संभालेगा?

अब मुझे ही देख लीजिए। मैं महंगाई या चीनी के मुद्दे पर रत्तीभर भी चिंतत नहीं हूं। बेफिक्री से खा-पी रहा हूं। अरे, महंगाई पर यूं मुंह बनाने या चिंतत होने से महंगाई कोई कम तो हो नहीं जाएगी? फिर हमें सरकार की चिंता को जानते-समझते हुए जरा-बहुत अभावों में भी चिंता-मुक्त रहने की आदत डालनी चाहिए।

एक महंगाई ही क्या मैं तो ठाकरे-शाहरुख की मुंहजोरी पर भी जरा भी चिंतित नहीं हुआ। कभी-कभार तो बेचारों के हाथ ऐसे मौके आते हैं, उन्हें भी वे हाथ से जाने दें, यह कैसे संभव है! हम यह क्यों भूलते हैं कि प्रसिद्धि पाने का हमारे पास बस एक ही तरीका है, किसी भी तरह से विवादास्पद हो-बन जाओ। जहां विवादास्पद हुए समझो हीरो बने।

इधर, हम एक और बड़ी चिंता पालने जा रहे हैं। हर ओर से चिंता प्रकट की जा रही है कि मात्र 1411 बाघ ही हमारे बीच बचे हैं। कृपया बाघों को बचाएं। टीवी पर विज्ञापन आ रहा है कि बाघों को बचाने के लिए ब्लॉग लिखें या एसएमएस करें। बताइए यह भी कोई चिंता का विषय है! पहले खुद ही बाघों को मारो फिर यहां-वहां चिंता जताते फिरो। जो बाघ खुद अपनी घटती संख्या पर चिंतत नहीं हैं, हम इंसान उस पर चिंता जता रहे हैं। क्या मजाक है भाई।

बधुं, यूं हर वक्त चिंता, चिंता और चिंता ठीक नहीं है। चिंता जीने का मजा छीन लेती है। आखिर महंगाई, चीनी या बाघ पर चिंता जताने से होगा क्या? दरअसल, यहां होगा वही जो मंजूरे-खुदा होगा। गुजारिश है कि चिंता-मुक्त रहना-जीना सीखो; ठीक मेरी तरह।