अंशुमाली रस्तोगी

महंगाई के बढ़ने में सरकार का कोई दोष नहीं है। महंगाई इसलिए बढ़ रही है क्योंकि यह उसका काम है। अगर वो बढ़ेगी नहीं तो उसे कोई पहचानेगा और पूछेगा नहीं। सोसाइटी के बीच रहने वाला हर व्यक्ति अपनी पहचान के मायने चाहता है। महंगाई भी इन दिनों इसी राह पर है। महंगाई हमें कम में जीने व रहने का सलीका बताती है। सेहत के लिए योग व जिम से कहीं बेहतर है, महंगाई के प्रति पाबंद होना।
हम भारतीय तो बचत के मामले में देश से लेकर विदेश तक में मशहूर हैं। हमें कम में जुगाड़ से काम चलाने का तरीका आता हैं। आपको मालूम होना चाहिए कि कैसे हमारे मां-पिताओं ने पानी के साथ रोटी खाकर हमें पाला-पोसा है। अपना पेट काटकर हमारा पेट भरा है। जहां काम सिर्फ काम चलने भर से चल जाता है, वहां उसे हमें निभा ले जाना चाहिए। बावजूद इस सच के हम महंगाई पर हो-हल्ला काट रहे हैं। अंदोलित हो रहे हैं। सरकार व मंत्रियों के पुतले फूंक रहे हैं। यह सब सरासर गलत है। जो है उसे स्वीकार करें। उसी में गुजारा करें।
अब बेचारी सरकार भी क्या करे। कीमतें बढ़ना उसकी मजबूरी है। उसके हाथ अंतरराष्ट्रीय दवाब के आगे बंधे हुए हैं। अगर पेट्रोल और डीजल के दामों के वृद्धि हो भी गई तो इसमें आसमान सर पर उठा लेने की जिद क्या है? आखिर हम एडजेस्टमेंट का फार्मूला क्यों नहीं अपनाते? हफ्ते में दो न जाएं अपने निजी वाहनों से। वाहनों के वजाए साइकिल का इस्तेमाल करें। थोड़ा-बहुत पैदल भी चलें। दरअसल है क्या अपनी आदतों को खराब तो हमने खुद ही किया है। यहां बंदे को अगर 'जोर की लगी' भी होती है, तो वो चाहेगा कि पखाने तक अपने निजी वाहन से ही जाए। पैदल चलने को हम लोग अब अपनी तौहीन समझते हैं। जबकि चीन में पैदल चलना और साइकिल चलाना शान समझा जाता है। हकीकत यह है कि सड़कों पर इंसान से कहीं ज्यादा तो मोटरगाड़ियां नजर आती हैं। क्या बच्चा, क्या बूढ़ा हर कोई 'आराम की सवारी' चाहता है। अब जब आदत 'आराम की सवारी' की डाल ही ली है, तो फिर पेट्रोल-डीजल की कीमतों के बढ़ने का रोना न राइए।
बात-बेबात हम सरकार के पुतले में आग लगाने के लिए तो तैयार हो जाते हैं लेकिन अपनी असीम इच्छाओं पर जरा भी पाबंदी नहीं लगाते। अरे, क्या जरूरी है दो वक्त की रोटी खाना। एक वक्त खाएं। अगर कर सकते हैं तो हफ्ते में एक-दो दिन उपवास भी कर लें। इससे पेट और हाजमा ठीक रहेगा। जितना वक्त हम पुतला जलाने या खरी-खोटी सुनाने में बर्बाद करते हैं, उतना वक्त हम महंगाई-चिंतन में लाएं। तरह-तरह के तरीके निकालें महंगाई के दर्द को साधने के। दरअसल, यह महंगाई-वहंगाई है कुछ नहीं सब हमारे अंदर का वहम है। हमने महंगाई पर प्रलाप को अपनी आदत बना लिया है।
मैं अपना निजी सच आपसे बयां कर रहा हूं कि आज तक मुझे महंगाई में कोई दर्द नजर नहीं आया। मैंने हर स्तर पर महंगाई का स्वागत किया; अब भी कर रहा हूं। मैं सरकार की मजबूरी को समझता हूं। सरकार के पास सिर्फ महंगाई कम करने का ही अकेला काम नहीं है। उसे देश चलाना होता है। देश व समाज की तमाम तरह की समस्याओं से दो-चार होना होता है। हर रोज कोई न कोई परेशानी सरकार के सर पर आकर खड़ी हो जाती है। मैं तो कहता हूं महंगाई के मुद्दे पर हमें सरकार का साथ देना चाहिए। हमें चाहिए कि हम अपने हिसाब से इस समस्या से निपटें। पेट और इच्छाएं तो हमारी ही हैं, इस पर लगाम कसें।
देखिए, इधर-उधर सरकार के पुतले जालने से कुछ नहीं होगा। इससे देश-समाज के भीतर पुतला-संप्रदायिकता का माहौल बनेगा, जोकि हमारे लोकतंत्र के लिए गलत है। वैसे भी पुतला जला लेने भर से आप कोई क्रांतिकारी तो हो नहीं जाएंगे। इसलिए हमें चाहिए कि हम इस प्रकार की अलोकतांत्रिक परपंराओं से बचने का प्रयास करें। महंगाई हमारे समय का सच है। हालांकि सच कढ़वा होता है। लेकिन इस सच को चुपचाप पी जाने का प्रयास करें। सरकार को अपना काम करने दें। महंगाई को अपना। और आप अपना काम करें।