अंशुमाली रस्तोगी

वामपंथियों के लिए यह समय गहन आत्म-मंथन का है। अब वे कुछ और नहीं माथे के सहारे केवल अपने मंथन को मथने में लगे हैं। सुना है कि मंथन करने में बहुत अधिक माथे का इस्तेमाल करना पड़ता है। इस कारण माथे पर बोझ भी काफी बढ़ जाता है। फिर इस माथे का प्रयोग वामपंथियों द्वारा हो तो कहना ही क्या। तमाम दिमागवालों के माथे के मुकाबले वामपंथियों का माथा ज्यादा प्रगतिशील होता है। उनमें विचार की ताकत होती हैं। चिंतन-मनन का हौसला होता है। अगर मंथन हार के कारणों पर किया जाए, फिर तो माथे का दही होने में ज्यादा समय नहीं लगता।

वैसे इस समय वामपंथियों को आत्म-मंथन की अवश्यकता है भी बहुत। हाल-फिलहाल कोई काम भी उनके पास नहीं है। आगे पूरे पांच साल पास हैं ढेर सारा आत्म-मंथन और चिंतन करने के लिए। मंथन कहीं भी किया जा सकता है। कभी दिल्ली में बैठकर, कभी कोलकाता में तो कभी-कभार केरल में भी। जहां मंथन करने में ज्यादा लुत्फ आता हो, वहां मंथन करो। वैसे भी हमारे यहां के राजनीति दलों के पास हार के बाद के कारणों की खोजबीन करने की पुरानी मंथन-परंपरा रही है। फिर भला वामपंथी इस परंपरा से कैसे खुद को अलग रख सकते हैं।

लगता है गहन किस्म के आत्म-मंथन की कला वामपंथियों ने अपने गुरू मार्क्स से सीखी है। मार्क्स ने जो लिखा अपने माथे को खूब मथके लिखा। मार्क्स ने अपने चिंतन को इस हद तक मथ दिया कि औने-पौने माथेवालों के उनका मंथन पल्ले ही नहीं पड़ता। खुद मैं भी मार्क्स को पढ़ते वक्त अपना माथा पीट लेता हूं। क्या गजब किस्म का मंथन था मार्क्स का। लेकिन हमारे वामपंथी भाई लोग मार्क्स के मंथन पर इस कदर आत्ममुग्ध हैं कि अपने जन के प्रति फर्ज को ही भूल बैठे हैं। तभी तो पश्चिम बंगाल की जनता ने उन्हें चुपके से हराकर बाहर का रास्ता दिखा दिया। मुक्त कर दिया स्वतंत्र आत्म-मंथन के लिए।

फिलहाल, अभी यह देखना बाकी है कि वामपंथियों का यह आत्म-मंथन जनता के बीच उन्हें कितनी जगह और सम्मान दिलवा पाएगा।