" आप " ये तो होना ही था
ये तो होना ही था, लेकिन आज इस तरह से होगा इस तरह की उम्मीद न थी। अब पार्टी से निकाले जाने की औपचारिकता ही शेष है या यूँ कहें कि मात्र तकनीकी रूप से ही अभी भी प्रशांत, योगेन्द्र आदि पार्टी में कहे जा सकते हैं। दिल्ली चुनाव के वक़्त ही केजरीवाल व प्रशांत-योगेन्द्र के बीच दूरियाँ बढ़ीं व उद्देश्य भी अलग-अलग हो चुके थे। चुनाव की वजह से केजरीवाल ने इन लोगों को मैनेज किया और चुनाव परिणाम आते ही फैसला कर लिया कि इनसे मुक्त होना है।
अब सवाल उठता है कि आखिर ऐसी क्या बात हो गयी कि बीच का कोई रास्ता ही शेष न बचा, जबकि पार्टी की शुरुआत से ही ये सभी लोग साथ रहे हैं। योगेन्द्र व प्रशांत शुद्धतावादियों की तरह हर वक़्त पार्टी की उन बातों को अपने ऊपर लागू करने को लेकर आग्रह कर रहे थे, जिन सिद्धांतों को लेकर पार्टी खड़ी की गयी थी। उनका मानना था कि पार्टी को उन मुद्दों व सिद्धांतों पर दृढ़तापूर्वक पालन करना चाहिए जिसको न करने को लेकर वे अन्य पार्टियों की आलोचना करते थे। जबकि केजरीवाल अपने उद्देश्य के बारे में निश्चिन्त थे और उसे पाने के लिए ये इधर-उधर थोड़ा बहुत आने-जाने को बुरा नहीं समझते, बल्कि आवश्यक भी मानते थे।
वैसे भी केजरीवाल को कभी ये पसंद नहीं, कि उन्हें बताया जाए कि ये करना है। वो कभी किसी के कहने से नहीं चलते बल्कि दूसरों को चलाते रहे हैं। यदि आप उनके कहने से नहीं चलते तो आप उनके कमरे से बाहर निकलें। अब दिल्ली चुनाव जितना जहां केजरीवाल का ध्येय था और वो इसके लिए इधर-उधर भी कर रहे थे तो योगेन्द्र व प्रशांत नीतियों व सिद्धांतों को लेकर इनको घेर लेते कि ऐसा नहीं होना चाहिए।
चुनाव की मजबूरी की वजह से केजरीवाल को इनकी कई बातें मनानी भी पड़ीं परन्तु मन में इनके प्रति खीज व गुस्सा बढ़ता गया। और केजरीवाल इसको लेकर निश्चित हो गए कि इनके रहते वो जैसा चाहते हैं वैसे खुलकर काम नहीं कर सकेंगे और ये लोग हर बार उन्हें घेर देंगे व पार्टी के सिद्धांतों से भटकने न देंगे। दूसरे केजरीवाल चाहते थे कि अब दिल्ली को जीत गए हैं तो अब बस दिल्ली में राज करें व यहाँ वो जनता के लिए बिना किसी बाधा के कुछ करें। जबकि प्रशांत इस आन्दोलन को अखिल भारतीय बनाना चाहते थे। वैसे भी दिल्ली जीतने के बाद प्रशांत-योगेन्द्र व आनंद कुमार की जरूरत व प्रासंगिकता खत्म हो गयी थी। अब इनका रोल या प्रासंगिकता तभी थी जब पार्टी दिल्ली के बाहर अपने को फैलाती। मगर इसमें न तो केजरीवाल चाहते थे न उनका इसमें दिलचस्पी ही थी। और फिर केजरीवाल को ये भी पता था कि यदि राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी का विकास होता है तो ये काम प्रशांत व योगेन्द्र आदि ही करेंगे। और धीरे-धीरे राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी से केजरीवाल की पकड़ ढीली हो सकती है। जिसे केजरीवाल कभी होने देना नहीं चाहते। ये ऐसा टकराव था कि इसमें समझौता होना ही नहीं था।
यदि प्रशांत व योगेन्द्र पार्टी को दिल्ली तक ही सीमित स्वीकार कर लेते तो फिर उन्हें आडवाणी की तरह ही इस पार्टी में अपने को बीत चुका मान लेना पड़ता जो इन्हें पसंद न था। अब सबसे बेहतर तो यही था कि ये लोग दिल्ली को केजरीवाल के लिए छोड़ शेष भारत के लिए एक अलग पार्टी बना अपना काम करते। खैर ये अब भी कर सकते हैं।
उन (आप) के पास न राजनीतिक विचारधारा थी न देश को चलाने की कोई नीति... ले-देकर बस एक लोकपाल का विचार था और उसे लागू करने का जुनून... भ्रष्टाचार से त्रस्त जनता ने भरोसा कर उस लोकपाल से उम्मीद लगा ली और दिल्ली की गद्दी भी सौंप दी... पर हाय रे किस्मत ! यहाँ भी ठगी गयी... उनने अपनी पार्टी में एक मानक की तरह स्थापित किए गए लोकपाल की भ्रूण हत्या कर दी... अब इनके पास लोकपाल का शव ही शेष है, जो दुर्गन्ध दे रहा है... सो मेरे लिए एक राजनीतिक दल के तौर पर इनका अस्तित्व फिलहाल खत्म हो चुका है.... RIP
मसऊद अख्तर
मसऊद अख्तर, लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।