हम मुरगन और संथन को फांसी दिए जाने के लिए सड़क पर क्यों नहीं उतरते?
हम मुरगन और संथन को फांसी दिए जाने के लिए सड़क पर क्यों नहीं उतरते?
एक दिन बहस याकूब मेमन को फांसी दिए जाने या न दिए जाने पर चली थी। मैंने कहा था कि याकूब मेमन को माफ कर देना चाहिए जिस पर मेरे कई मित्रों की बड़ी अजीबोगरीब प्रतिक्रियाएं आईं।
मेरे प्रश्न का उत्तर किसी ने दिया। मैंने तो सिर्फ इतना ही कहा था कि राजीव गांधी के हत्यारों को फांसी दिए जाने पर शोर क्यों नहीं मचाया जा रहा क्योंकि वे हिन्दू हैं, इसलिए ?
हां, इस देश अब ऐसा होने लगा है। जब-जब अफजल गुरु या याकूब मेमन को माफ करने की बात होती है, तो यकायक हमारे अंदर की देशभक्ति उछाले मारने लगती है। मैं आज और कई दिन ऐसे हिंदू देशभक्तों को आयना दिखाना चाहूंगा। पहले मैं अपने बारे मे स्पष्ट कर दूं कि मेरी किसी धर्म में कोई आस्था नहीं है। जर्मन दार्शनिक नीत्शे ने कहा था कि God is dead. मेरा मानना है कि जो जन्मा ही नहीं उसकी मृत्यु कैसे ? ये मेरे व्यक्तिगत विचार हैं, जो मुझ पर ही लागू होते हैं, मैं दूसरों की भावनाओं का पूरा सम्मान करता हूं।
मेरा फिर वही प्रश्न है कि हम मुरगन और संथन को फांसी दिए जाने के लिए सड़क पर क्यों नहीं उतरते? इसलिए क्योंकि हमने मान लिया है कि मुस्लिम देशभक्त हो ही नहीं सकते। यदि कोई मुस्लिम है तो वह अवश्य ही पाकिस्तान परस्त होगा। कुछ वर्षों से हमारी राष्ट्रीयता हिन्दुत्व के इर्र्द॔ गिर्र्द॔ सिमट कर रह गयी है। हमने मुसलमानों को ऐसे मुकाम पर लाकर खड़ा कर दिया है कि वे हिन्दुस्तान में अपने को अजनबी महसूस करने लगे हैं। हमने संविधान में लिखा कि हम सेकुलर हैं। फिर सरकारी आयोजनों आदि की शुरूआत भूमिपूजन मंत्रोच्चार से क्यों की की जाती है ? क्या इससे मुस्लिमों की भावनाएं आहत नहीं होती होंगी, क्या हमने इस बारे में कभी सोचा ? यदि किसी सरकारी आयोजन में अल्लाह ओ अकबर होने लगे तो शायद आसमान फट पड़े।
मुस्लिमों को बात-बात पर देशद्रोह का तमगा पहना दिया जाता है और हम हिन्दुओं के सौ खून माफ...
कबिरा खड़ा बजार मे सबकी मांगे खैर।
न काहू से दोस्ती न काहू से बैर।
बात याकूब मेमन से शुरू हुई है किंतु यहीं पर खत्म हो जाए यह कैसे संभव है। मुरगन, संथन और पेरिरवेलम को फांसी के फंदे पर अब तक क्यों नहीं लटकाया गया ? देश का संविधान और न्याय व्यवस्था इतना लाचार क्यों? क्या हम अपने देश के एक प्रधानमंत्री को न्याय नहीं दिला सकते? ऐसे में किस गटर में छुप जाती है RSS और VHP पोषित राष्ट्रीयता? आओ सबसे पहले इन दोनो की कैफियत पता कर लें।
पहले RSS। इस संगठन को कुछ कुंठित मराठियों ने खड़ा किया। गांधी के राष्ट्रीय आन्दोलन की आंधी के सामने जब इनके पैर नहीं टिक रहे थे, तब इस संगठन ने मुस्लिम लीग की तर्ज॔ पर काम कर देश के विभाजन में बहुत बड़ी भूमिका निभाई। विडंबना यह कि इस संगठन के सदस्य अब यह तय करने लगे हैं कि कौन राष्ट्रवादी है कौन राष्ट्रवादी नहीं। VHP और चार कदम आगे है यह संगठन सिर्फ और सिर्फ धार्मिक उन्माद फैलाने का कार्य करता है हिंदू धर्म की बेहतरी के लिए कोई भी काम इनके द्वारा नहीं किया गया। देश के विभाजन और युगपुरुष गांधी की मौत के लिए जिम्मेदार है यह संगठन। इन संगठनों पर आजीवन प्रतिबंध क्यों नहीं लगाया जाता? इससे भी मुस्लिमों की धार्मिक भावनाएं आहत होती हैं कभी हमने विचार किया है इन तथ्यों पर ?
जिस प्रकार हमारे हमारे देश के कट्टरपंथी लोग मुसलमानों को पाकिस्तान चले जाने की धमकी देते रहते हैं उसी प्रकार यदि वे नेपाल चले जाने की धमकी देने लगें तो बेजा क्या कहेंगे? किंतु अफसोस कि नेपाल भी हिंदू राष्ट्र नहीं रहा।
मैं केवल उन जख्मों को कुरेद रहा हूं, जिन्हें हम हिंदू कभी जाने में तो कभी अनजाने में मुस्लिमों को देते रहते हैं। सहिष्णुता हिन्दू धर्म की एक खासियत थी, जो उससे छीनी जा रही है। दलील यह दी जाती है कि उन्हें मुस्लिमों से मुकाबला करना है इसलिए हिन्दुओं को उनका जैसा बनना होगा।
..............सुनो यह भी दास्तान।
मैं इस समय वक्त की दरिया के किनारे खड़ा हूं, जिसमें इतिहास के खंडकाल बहे जा रहे हैं। मेरी नज़र मध्ययुगीन खंडकाल पर टिकी हुई है। उस काल के कथित राष्ट्रभक्त राणा प्रताप मेरी नज़रों के सामने हैं। हाल में ही देश के गृहमंत्री ने एक बड़ा बयान दे डाला, उन्होंने राणा प्रताप को अकबर के समकक्ष महान बता डाला। जिस पर मुझे आपत्ति है। अकबर और राणा प्रताप की तुलना नहीं की जा सकती है। कहां अकबर का साम्राज्य सम्पूर्ण उत्तर भारत से लेकर काबुल कंधार तक फैला हुआ था, जब कि राणा प्रताप केवल मेवाड़ के किले तक ही सीमित थे।
राणा प्रताप को महान क्यों मान लिया जाए ? कौन राणा प्रताप ने विशाल साम्राज्य की स्थापना की।और तो और उन्हे देशभक्त भी क्यों कहा जाए? किस देश की भक्ति उन्होंने की जिस प्रकार अन्य राजपूत राजा झूठी शान को लेकर एक दूसरे को काटते कटते रहे, उसी प्रकार राणा प्रताप मेवाड़ के लिए संघर्ष जीवन भर करते रहे। जब उन्हें घास की रोटियां खानी पड़ीं, तो उनके छोटे से राज्य की प्रजा का क्या हाल हुआ होगा। जो राजा झूठी शान के लिए पूरी प्रजा को संकट में डाले रहा, उसे महान कैसे कहा जा सकता है। और देशभक्त तो कतई नहीं, क्योंकि उन्होंने सभी हिन्दू राजाओं को एकत्र कर अकबर के मुकाबले खड़े होने का कोई प्रयास नहीं किया। उन्हें केवल मेवाड़ भक्त ही कहना विवेक सम्यक होगा।
और संक्षेप में बता दूं कि हल्दी घाटी का युद्ध राणा प्रताप और अकबर के बीच नहीं लड़ा गया था, बल्कि यह युद्ध राणा प्रताप और अकबर के एक मनसबदार राजा मान सिंह के मध्य लडा गया था, जिसमें राणा प्रताप बुरी तरह पराजित हुए थे।
हममें इतिहास की सही ढंग से विवेचना करने की हिम्मत होनी चाहिए। और सच स्वीकार करने की सामर्थ्य॔ भी। अकबर बेशक महान था जिसकी समीक्षा किये जाने का कोई औचित्य नहीं है, सभी भिज्ञ हैं। इसलिए इस प्रकार की तुलनाएं होने से भी अल्पसंख्यकों के मन खराब होते हैं। हमें एक दूसरे की भावनाओं की कद्र करनी चाहिए, यही एक सभ्य समाज से अपेक्षा की जाती है।
—————-अभी और भी बहुत कुछ है।...
अनाम दास


