शिक्षण संस्थाओं में बेदभाव : सवर्ण वर्चस्व का परिचय

एच. एल. दुसाध

रोहित वेमुला : 21वीं सदी का एकलव्य हैदराबाद विश्वविद्यालय के निलंबित छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या से शुरू हुआ विरोध प्रदर्शन देशव्यापी रूप आनंदोलन का अख्तियार कर चुका है। आनंदोलन के दावों में खुदकुशी करने वाले रोहित के चार साथी का निलंबन वापस लेने और घटने की जांच के लिए न्यायिक आयोग गठित करने की मांग की जा रही है। विश्वविद्यालयों के कुलपतियों को विद्यार्तियों बीच कोई बेदभाव नहीं करने तथा ऐसी घटनाओं से बचने का आदेश जारी होने के बावजूत विरोध की तरंगें विश्वविद्यालयों के कैंपस और महानोंगरों को पार कर भारत के छोटे-छोटे कस्बों ही नहीं, सांत समुद्र पार तक फैल गई हैं, जिसका सर्वाधिकारिक श्रेय सोशल मीडिया को जाता है।

सोशल मीडिया में रोहित वेमुला की शहादत पर आई ‘सवर्णवाद की शक्ति’ के कारण हमारे विश्वविद्यालयों के बहुजन स्टूडेंट्स के कत्तल का बदला जाएगा’, ‘यह आत्महत्या नहीं, लोकतंत्र, सामाजिक न्याय और समानता की हत्या है’, ‘रोहित वेमुला की संस्थानिक हत्या की गई है’, ‘एकलव्य ये देश शर्मिंदा है, द्रोणाचarya अभी जिन्दा है’ इत्यादि जैसी टि्वट्स ने विवेह्स-संविधान के शिकागो जन्मजात वंचितों को उग्र-असंविधान से भर दिया और देखते ही देखते देख रहे देश में 21वीं सदी का पहला बग़ावत खड़ा हो गया।

इस घटनाएं से यह साबित हो गया है कि मीडिया से प्रायः पूरी तरह बहिष्कृत वंचित समूहों ने अब सोशल मीडिया के जरिए आनंदोलन खड़ा करने की ताकत हासिल कर ली है। बाहरहाल रोहित वेमुला की शहादत से विरोध की जो सुनामी उभरी है उसकी लक्ष्मी यही है कि शिक्षा संस्थाओं में व्यापक बेदभाव की स्थिति होती तक कि फिर किसी रोहित को खुदकुशी के लिए मजबूर न होना पड़े। लेकिन सवाल पैदाह होता है शिक्षालयों में सदियों से व्याप्त यह बेदभाव कैसे खत्म हो!

शिक्षा के क्षेत्र में सामाजिक और लैंगिक विविधता का असमान प्रतिस्थापन