निराला की कविता में आम जन की पीड़ा व्‍यक्‍त होती है-कात्यायनी
लखनऊ, 24 जनवरी। निराला जयंती के अवसर पर आज 'अनुराग ट्रस्ट' और ‘बातचीत' की ओर से आयोजित कार्यक्रम में उन्‍हें याद किया गया।
आज सुबह सबसे पहले आईटी कालेज चौराहे पर स्थित निराला की प्रतिमा को कार्यकर्ताओं तथा संस्‍कृतिकर्मियों ने साफ करके उस पर माल्‍यार्पण किया और प्रतिमास्‍थल पर 'जागो फिर एक बार' तथा निराला की अन्‍य काव्‍यपंक्तियों से सज्जित पोस्‍टर लगाये।‍ इसके बाद अनुराग पुस्‍तकालय के हॉल में आयोजित कार्यक्रम में निराला को याद करते हुए कवयित्री कात्‍यायनी ने कहा कि रूप और अंतर्वस्तु दोनों की दृष्टि से आज की हिन्‍दी कविता अपने पूर्वज कवियों में किसी की ऋणी है तो निस्‍सन्‍देह वे निराला ही हैं।
'आज के दौर में निराला की याद' पर बातचीत के साथ ही इस अवसर पर आयोजित कवि गोष्‍ठी में कात्यायनी, चन्द्रेश्वर, अनिल श्रीवास्तव, राहुल देव और इन्‍दु पांडेय ने अपनी कविताओं का पाठ किया। अपने वक्‍तव्‍य में कात्यायनी ने क‍हा कि निराला की सर्जना की बहुआयामिता में उस युग के विभिन्‍न अंतर्विरोधों का प्रतिबिंबन होता है। यदि निराला का संतुलित मूल्‍यांकन किया जाये तो कहा जा सकता है कि वे द्विवेदी युग और छायावाद का सभी उत्‍कृष्‍ट लेते हुए छायावाद का अतिक्रमण करते हैं और प्रयोगवाद, प्रगतिवाद को अनुप्राणित करते हुए नई कविता के सीमान्‍तों को छूते हैं। निराला की कविता में आम जन की पीड़ा व्‍यक्‍त होती है। आज निराला को याद करने का मतलब है अपनी परंपरा से प्रेरणा लेकर वर्तमान की चुनौतियों से जूझना तथा भविष्‍य के रास्‍तों के संधान के लिए उनसे मदद लेना।
आशीष ने निराला की कुछ कविताओं के माध्‍यम से उनके व्‍यक्तित्‍व और कृतित्‍व की जनपक्षधरता को उजागर किया और कहा कि आज जब साहित्‍यकारों में सत्ता से पद-पुरस्‍कार-प्रतिष्‍ठा पाने की होड़ लगी है तो निराला की समझौताविहीनता प्रेरणादायी है। कवि व आलोचक चन्‍द्रेश्‍वर ने कहा कि तमाम लेखक संगठनों के होने के बावजूद आज शहर में निराला को लेकर सन्‍नाटा है। निराला की पंक्ति 'गहन है ये अन्‍धकारा' का उल्‍लेख करते हुए उन्‍होंने कहा कि आज के अंधेरे समय में सृजनकर्मियों को आगे आकर भूमिका निभानी होगी।
कवि गोष्‍ठी में युवा कवि राहुल देव ने 'खेल', 'विकासयात्रा', 'व्‍यापार', 'नये साल पर' आदि 5 कविताएं पढ़ीं। 'दरअसल हमारी आज़ादी की कीमत एक सुनहरा पिंजरा है' जैसी पंक्तियों से उन्‍होंने मौजूदा दौर पर करारी चोट की। अनिल श्रीवास्‍तव ने 'बाज़' और 'ऊपर नाच' कविताएं तथा कुछ गज़लें पढ़ीं। चन्‍द्रेश्‍वर ने 'अफ़वाहें', 'शब्‍दों का सफर' आदि कविताओं के अलावा संघ परिवार की राजनीति और सत्ता के साथ लेखकों के समझौतों पर तीखे व्‍यंग्‍य की मार वाली कविताएं पढ़ीं। हाल ही में हुए रायपुर प्रसंग में लिखी ताज़ा कविता की ये पंक्तियां दृष्‍टव्‍य हैं, 'मैं लेखक हूं एक, देखना चाहता हूं अन्‍याय, दिख जाता है मुझे न्‍याय, मैं घृणा करताहूं दुश्‍मन से, और कर बैठता हूं प्‍यार। ' कात्‍यायनी ने कुछ छोटी कविताओं के अलावा ‘गुजरात 2002’ और 'आह मेरे लोगो' जैसी कविताएं सुनाईं। इसके अलावा उन्‍होंने आज के साहित्यिक परिदृश्‍य में व्‍याप्‍त अवसरवाद पर व्‍यंग्‍य करती कविता 'एक दिन शेषजी के घर' कविता पढ़ी।
आशीष और सत्‍यम ने निराला की कुछ कविताओं का पाठ किया। इस अवसर पर निराला तथा अन्‍य कवियों-लेखकों की कविताओं व उद्धरणों की पोस्टर प्रदर्शनी भी लगायी गयी थी। कार्यक्रम में उपस्थि‍त श्रोताओं ने कहा कि ऐसे कार्यक्रमों की निरन्‍तरता बनी रहनी चाहिए।