सुनील दत्ता

आम आदमी अपने को वोट की भागीदारी या इससे ज्यादा पार्टियों के नेताओं के समर्थन या विरोध की चर्चा तक ही अपने आप को सीमित रखता है। आम आदमी स्वयं राजनीति करने व्यवस्था में शासक- संचालक बनने के लिये आगे नही आ रहा है। ऐसा करने में अक्षम समझता है आम आदमी समाज राष्ट्र व समाज का बहुसंख्यक हिस्सा है। इनके जीवन का प्रमुख उद्देश्य शारीरिक एवम् मानसिक मेहनत के जरिये अपने परिवार का भरण- पोषण ही उसका लक्ष्य होता है। इसको वह अपना कर्तव्य समझता है और जीवन पर्यन्त इसी में संघर्षरत रहता है। आम समाज अपने में एक जैसा यूँ कह सकते हैं कि एक रूपता का समाज नहीं है बल्कि वह विभिन्न धर्म, सम्प्रदाय, जाति इलाके व नस्ल भाषा की पहचान के साथ- साथ भिन्न- भिन्न आर्थिक, सामाजिक स्तरों पर विभाजित समाज है। इस समाज में सीमान्त लघु एवम् मध्यम जोत वाले किसानों, तिहाड़ी मजदूर, बुनकरों दस्तकारो के साथ ही छोटे ठेले-गुमटी वालों के साथ साधारण शिक्षा पाये कामगारों से लेकर चिकित्सा, शिक्षा न्याय से जुड़े बहुत से पेशों में बहुसंख्यक लोग जुड़े हुये हैं। इनके दरम्यान अंतर-भेदों के वावजूद ये लोग आम समाज के हिस्से हैं। आम समाज के सभी हिस्से आमतौर पर अपने जीवन में नैतिक मूल्यों का वहन करने में लगे रहते हैं। इनमें से एक बहुत छोटा हिस्सा ही उच्च मध्यम उच्च हिस्सा बन पाने में सफल रहता है। उसके बाद वह इस समाज का हिस्सा नहीं रह जाता है। धनाढ्य वर्गो व कम्पनियों की तरह ये न तो देश के संसाधनों के बड़े मालिक हैं और न ही देश की अर्थव्यवस्था- अर्थात् उत्पादन व्यापार और उपभोग को प्रभावित करने या उसे बदल देने की क्षमता ही रखते है। अगर हम देखें तो पायेंगे कि सैकड़ो की संख्या में अरबपति व खरबपति ही इस देश के संसाधनों के 75 % हिस्से पर प्रत्यक्ष- परोक्ष रूप से मालिकाना हक़ रखते हैं और संचालन करते हैं। 75 % आबादी वाले देश के बाकी के 25 % संसाधनों की अत्यन्त छोटे व मझोले मालिक हैं। अपने इस छोटे-मझोले मालिकाने के या कमाई के अवसरों के संचालक नियंत्रक भी नहीं हैं। खासकर पिछले 25 वर्षो में व्यापक जनसाधारण के इन छोटे-मोटे संसाधनों को जमीन, काम धंधो व रोजगार के भिन्न-भिन्न साधनों के अवसरों को उनसे लगातार छीना जा रहा है। जिसके चलते आम समाज के हिस्से महँगाई, बेरोजगारी की गम्भीर समस्या सामने खड़ी होती जा रही है। आम समाज इस माने में भी एक जैसा है कि वह राष्ट्र- समाज का शासक नियन्त्रक हिस्सा नहीं है अपितु वह राष्ट्र का शासित संचालित हिस्सा है। सत्ता सरकारों की योजनायें नीतियों कानूनों को बनाने व लागू करने में आम समाज की कोई भूमिका नहीं होती है- जब कि इन नीतियों कानूनों के सभी प्रकार के दुष्परिणाम समाज के इसी तबके पर असर डालते हैं। इसके सभी सुपरिणाम- समाज के धनाढ्य व उच्च वर्ग को ही मिलते हैं। इसका प्रत्यक्ष लाभ सामने देखने को मिल रहा है। पिछले 25 सालों से अमलीजामा पहनाकर लागू की गयी आर्थिक, कूटनीतिक, सांस्कृतिक नीतियों के दुष्परिणाम- बढ़ते सामाजिक सांस्कृतिक समस्याओं संकटों के रूप में आम जनसाधारण के व्यापक हिस्सों पर पड़ते जा रहे हैं बल्कि इसका एक छोटा पार्ट इन्हीं नीतियों कानूनों योजनाओं के चलते उच्च माध्यम से उच्च वर्ग बनता जा रहा है। शासन- प्रशासन व राजनितिक पार्टियों के नेतृत्व में पहुँचकर सत्ता सरकार में भागीदारी निभा रहा है और शासक वर्ग बनता जा रहा है। आम समाज अपने चुनावी मताधिकार के जरिये शासक पार्टियों को शासन का अधिकार प्रदान करते रहने का ही एक माध्यम बना हुआ है ठीक उसी तरह से जैसे वह अपने श्रम-शक्ति से अपनी रोजी-रोटी कमाने के साथ धनाढ्य मालिको के उत्पादन बाजार को उनके लाभ- मुनाफे को बढाते जाने का साधन मात्र बना हुआ है। भिन्न- भिन्न समुदाओं व विभिन्न आर्थिक, सामाजिक स्तरों में रह रहे शिक्षित- अशिक्षित आम आदमी में इन बातो में भी एक रूपता है कि वह जनसाधारण के हित में समाज का शासक संचालक बनने की इच्छा तक नहीं रखता है। उनके बारे में चिन्तन नहीं करता। उसकी अपनी सोच- विचार व क्रिया कलाप आम तौर पर अपने व्यक्तिगत जीवन को बेहतर बनाने के लिये प्रयत्नशील रहता है। वह मात्र जीविकोपार्जन के बेहतर साधनों के अवसरों को पाने के बारे में सोचता है। उसके लिये वह धन- सत्ता के मालिकों का सेवक बनने तक ही वह अपने विचारों व्यवहारों को सीमित रखना चाहता है। निजी जीवन की मजबूरियों और अपने स्वार्थ में भी सत्ता सरकारों के प्रति उसमें गुलामों की भावना रहती है। वह सत्ता सरकार तथा शासन- प्रशासन के विरोध में अपना स्वर तभी निकालता है जब कोई प्रभावशाली व्यक्ति व पार्टी उसे अपने साथ जोड़ लेती है। अपने स्वार्थी सत्ता राजनीति को आगे बढ़ाने की खातिर आम जनसाधारण या उसके किसी हिस्से को आन्दोलित करने के लिये लग जाती है। इसी का परिणाम कि जनसाधारण लोग अपने को वोट की भागीदारी तक या उससे ज्यादा से ज्यादा पार्टियों के नेताओं के समर्थन या उसके विरोध की चर्चा या बक-बक तक ही सीमित रहते हैं। उसके आगे स्वयम् राजनीति करने समाज का शासक संचालक बनने के लिये आगे नहीं बढ़ते हैं। वैसा करने में वह अपने को अक्षम मानते हैं। यही उनकी बुनियादी कमजोरी है जो वर्तमान युग में भी बनी हुयी है। जबकि वह स्वयं वोट देते हैं और वोट के जरिये सरकार बनाने में सहयोग देते हैं। साठ वर्ष से उपर बीत चुका है सत्ता शासन के खेल को देखते हुये ये सत्ता और शासन मिलकर इनके हर हक़ और हिस्से को काट रहा है पर अब भी वो लोग खामोश है। वर्तमान दौर के राजनीतिक पार्टियाँ उसकी केन्द्रीय व प्रांतीय सत्ता सरकारे शासन प्रशासन के उच्च स्तरीय लोभी लोग उसके साथ प्रचार माध्यम विद्वान् व समाज के धनाढ्य के साथ उच्च हिस्से आम आदमी में बढ़ती महँगाई बेकारी रोजी रोजगार में आ रही टूटन तथा शिक्षा स्वास्थ्य व सामाजिक सुरक्षा आदि जैसी बढती जन समस्याओं के प्रति गम्भीर नहीं है न ही इसको कोई महत्व दे रही है। उसे घटाने का कोई प्रयास भी नहीं कर रही है उल्टे उसे बढ़ाने में लगी है। देश दुनिया के धनाढ्य वर्गों और कम्पनियों के साथ विभिन्न क्षेत्र के उच्च मध्यम तथा मध्यम वर्ग के एक सुविधा प्राप्त छोटे से हिस्से की सेवा में लगी हुयी है। धनाढ्य वर्ग को समस्त छूटे प्रोत्साहन और अधिकार प्रदान किये जा रहे हैं। उसके लिये नई अन्तर्राष्ट्रीय नीतियों कानूनों को एक के बाद एक लागू करते जा रहे हैं उसे और भी आगे बढ़ाते जा रहे हैं। आम आदमी के आधुनिक युग के कम व पेशों को पहचान को धुँधला करके उसे धर्म, जाति इलाका भाषा के पहचानों पर बाँटने तोड़ने में व एक दूसरे के विरोध में खड़ा किया जा रहा है। उसके ट्रेड यूनियनों को या किसानों, मजदूरों आदि के जन संगठनों को भी धर्म जाति के नाम पर बाँटते जा रहे। ताकि जनसाधारण अपनी समस्याओं व हितों के लिये कहीं एक जुट न हो जाएं। कहीं एक जुट होकर विद्रोह की भाषा न बोलने लग जाएं। यह सारी परस्थितियाँ आम आदमी को यह चेतावनी भी दे रहा है कि उसकी समस्याओं के लिये समाज का ऊपरी हिस्सा उनके व्यापक हितो के लिये संघर्ष नही करने वाला है। कारण कि वर्तमान में अन्तर्राष्ट्रीय एवम् राष्ट्रीय परिस्थितियो में यह बात निश्चित हो चुकी है कि धनाढ्य एवम् उच्च हिस्सों की निरन्तर विकास आम आदमी के समाज को संकटग्रस्त किये बिना उनका विकास और समृद्द होना मुमकिन नहीं है। देश की सत्ता- सरकारें देश की आम आदमी की साथ प्रतिशत जनसाधारण आबादी के सफाए की सुनिश्चित रणनीती अपनायी हुयी है। उसे गरीबी, अभाव, टूटन व असुरक्षा आपदा आदि के संकटों में फँसकर मरने के लिये छोड़ती जा रही है। अब ऐसा वक्त है कि इस देश की आवाम जो आम आदमी के लिये आवश्यक हो गया है कि विभिन्न समुदायों जनसाधारण तथा विभिन्न आर्थिक जनसमुदाय के व्यापक हितों के लिये उसके रोजी रोजगार काम काज शिक्षा सुरक्षा जैसे आवश्यक जरुरतों के लिये स्वयम् चिन्तन करे और संगठित हो। इस देश में पिछले बीस सालों से लागू की जा रही जन विरोधी ही नहीं अपितु जनसंहारक नीतियों के विरोध में संगठित होकर विद्रोह के स्वर फूँकने होंगे। अमेरिका ब्रिटेन जैसे विदेशी साम्राज्यी ताकतों व इस देश के धनाढ्य एवम् उच्च वर्गो को दी जा रही छूटों अधिकारों के खिलाफ संगठित होना है इसके लिये स्वयम् ही आम आदमी को सता शासन में भागीदारी के लिये तैयार होना पड़ेगा। लेकिन एक बात को ध्यान में रखना होगा जनहित के लिये शासक वर्ग बनने के लिये आवश्यक है कि वह धर्म, जाति, क्षेत्र के आपसी अन्तरविरोध को कमतर करने का प्रयास करना होगा और यह कार्य हिन्दू, मुसलमान, सिक्ख, ईसाई व् बड़ी- छोटी दलित जाति के पहचान को भुलाना होगा। इन सबसे ऊपर उठाना होगा/ तभी हम ऐसे वक्त में इनसे मुकाबला कर सकते हैं। तुम्हें तो राज हमारे सरों से मिलता है, हमारे वोट हमारे जरों से मिलता है। किसान कहके हिकारत से देखने वाले, तुम्हें अनाज हमारे घरों से मिलता है।। ——
तुम्हारे अज़्म में नफरत की बू आती है

नज़्म व नसक से दूर वहशत की बू आती है।

हाकिमे शहर तेरी तलवार की फलयों से,

किसी मज़लूम के खून की बू आती है।।