हाय – हाय – हाय
अवसर होता किसी प्रकाशक की पुस्तक का लोकर्पण की सरकार करेगी तो पुस्तक की सरकारी बिक्री तो हो ही जाएगी। सरकारी संवाद में शुद्ध व्यापारिक उपक्रम को बढ़ावा देना सरकार का तरीका है मान लेना कि जनता के साथ पत्रकार - साहित्यकार दरबार भी होना चाहिए – हाय रे जमाना !
हाय रे जमाना या 21 वीं सदी। कैसा युग आया है। अगर होता देश में असली प्रधानमंत्री तो कभी पत्र नहीं लिखता।
देश भी बड़ा विचित्र प्रधानमंत्री का पत्र न हुआ टेलीविजन का रियलिटी शो हो गया। रियलिटी शो की यही खासियत होती है कि उसमें सब कुछ होता है रियलिटी नहीं होती है। हमारे ज्योतिषाचार्य़ मुरली मनोहर जोशी ने सपनों में देखा कि जबसे रियल प्रधानमंत्री की परंपरा समाप्त हो गई है तब से रियलिटी शो में रियलिटी खत्म हो गई है। प्रधानमंत्री वहीं होता है जहां सरकार होती है।
बहस बहुत पुरानी है कि भारत में सरकार कॉरपोरेट सेक्टर की है या कांग्रेस की है या यूनाइटेड पैथेटिक एलांयस की है। यह यूपीए-2 या यूपीए-1 भी उतना ही पैथेटिक है जितना देश के विदेश बिहार में गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोग। बिहार में चुनाव 2010 के बाद राष्ट्रीय जनता दल और लोकजनशक्ति वाले भी गरीबी रेखा में शामिल हो गए हैं।
बिहार को कॉरपोरेट सेक्टर से बचाने के लिए निर्वहन कुमार ने दरबार सेक्टर को बढ़ावा देना शुरू किया है। यह और बात है कि कॉरपोरेट सेक्टर को निर्वहन कुमार के बिहार ने सांसद में भेज रखा है। आम तौर पर संसद में कॉरपोरेट सेक्टर के प्रतिनिधि सभी दलों में होते हैं। पुरानी संसद की परंपरा में वह लॉबीवादी नहीं होते थे।
गुजरे जमाने में उन्हें पैरवीकार कहा जाता था। लेकिन जब से देश में नकली प्रधानमंत्री की शुरुआत हुई है, तब से समस्त संसद लॉबी में बदल गया।
संसद में हमेशा से एक सत्ता पक्ष की लॉबी होती है, एक प्रतिपक्ष की लॉबी होती है। यह सारी लॉबीवादी ध्वस्त हैं कि देश को मोबाइल बनाने के लिए पौने दो लाख करोड़ का हरजाना हुआ है। इस हरजाना की पड़ताल करती है संसद की लोकलेखा समिति। नकली प्रधानमंत्री वहां हाजिर हो कर सफाई देना चाहते हैं कि नुकसान के लिए वह जिम्मेदार नहीं हैं- हाय रे जमाना !
हाय रे जमाना कि देश के विदेश बिहार के दरबार सेक्टर में पहले जनता होती थी। निर्वहन कुमार को लगा कि जनता और कार्यकर्ता में अंतर होता है। सच भी है कि जनता जनता होती है और कार्यकर्ता कार्य़कर्ता होता है।
बिहार में तीन प्रकार की जनता होती है। एक जनता जिसके वोट से सरकार बन जाती है। दूसरी जनता वह होती है जिसके वोट न देने से भी सरकार बन जाती है। तीसरी जनता वह होती जिसके वोट से अब्दुल बारी सिद्दीकी बिहार विधान सभा में नेता, प्रतिपक्ष हो जाते हैं। तीसरी जनता के पास दरबार नहीं दलील होती है कि 61 प्रतिशत लोगों ने वोट नहीं दिया सरकार के लिए। अपनी ही
दलील का वह फरियादी होता है। उसका कोई पैरवीकार नहीं होता। जनता फिर भीजनता है। जनता से ऊपरी दर्जा का कार्यकर्ता होता है। बिहार के दरबार सेक्टर में कार्यकर्ता को भी शामिल कर लिया गया है। पता नहीं निर्वहन कुमार की सरकार के लिए कौन जिम्मेदार है जनता या कार्यकर्ता। यह कह सकते हैं कि जनता दरबार में फरियादी होता है और कार्य़कर्ता दरबारी होता है।
देश के विदेश बिहार में एक साथ लोग फरियादी भी होते हैं और दरबारी भी - हाय रे जमाना !
हाय रे जमाना कि हमेशा से राजा साहित्यकारों – पत्रकारों को प्रोत्साहित करता है। इन बेचारे जीवों के लिए कोई दरबार नहीं लगाता कि मुख्य मंत्री साहित्यकार दरबार में। जैसे अभी तक साहित्यकार की परिभाषा तय नहीं हुई
है बिहार में। आम तौर पर जिसे पुरस्कृत किया जाता है वह साहित्यकार होता है। हम जैसे वरिष्ठ पत्रकार भी होते हैं जिनका मतलब यह होता है कि इनके पास कोई अखबार नहीं है। इन पर चाय –पानी – खाना – पीना( पीना श्रद्धा की वस्तु है ) बरबाद न करें। ऐसी स्थिति में समझदार साहित्यकारों ने दर्शक और वेतनभोगी नकलची पत्रकारों ने भी दरबार लगाने की शुरुआत कर दी है।
अवसर होता किसी प्रकाशक की पुस्तक का लोकर्पण की सरकार करेगी तो पुस्तक की सरकारी बिक्री तो हो ही जाएगी। सरकारी संवाद में शुद्ध व्यापारिक उपक्रम को बढ़ावा देना सरकार का तरीका है मान लेना कि जनता के साथ पत्रकार - साहित्यकार दरबार भी होना चाहिए – हाय रे जमाना !
जुगनू शारदेय


