हार्दिक पटेल को गुस्सा क्यों आता है?
हार्दिक पटेल को गुस्सा क्यों आता है?
हार्दिक पटेल बहुत गुस्से में हैं। वे गुस्से में हैं क्योंकि आरक्षण के चलते उनकी जाति के लोगों को अच्छी नौकरियां नहीं मिल रही हैं। इसीलिए उन्होने घोषणा कर दी है या तो पटेलों को भी आरक्षण मिले या आरक्षण को पूरी तरह खत्म कर दिया जाए। “हमें भी दो नहीं तो किसी को न दो”। “अस्सी-नब्बे प्रतिशत नंबर लाकर भी हमारे लोगों को नौकरियां नहीं मिलती हैं”...”अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति को आरक्षण है मगर उन्हें जनरल कोटा में भी नौकरियां मिल जाती हैं”।
पटेलों का ये गुस्सा नया नहीं है। जानकार बता रहे हैं कि अस्सी के दशक में भी इसी पटेल समुदाय ने आरक्षण के विरोध में गुजरात में बड़े आंदोलन किए थे। लेकिन इस बार इनकी ‘टैक्टिक्स’ थोड़ी अलग है। अब ये अपने लिए भी आरक्षण की मांग कर रहे हैं। खुद हार्दिक पटेल ने भी स्पष्टीकरण दिया है कि वे आरक्षण के खिलाफ़ नहीं हैं बल्कि केवल पटेलों के लिए भी आरक्षण की मांग कर रहे हैं!
गुमराह न हों। बात के सपाट अर्थ पर मत जाइए, उसकी व्यंजना को पकड़िए। असल गुस्सा आरक्षण को लेकर है। असल गुस्सा है कि ‘हमारे’ पास 80-90 प्रतिशत नंबर है, ‘मेरिट’ है – मगर सीट ले जा रहे हैं कोई और! यह गुस्सा पुराना तो है मगर सिर्फ पटेलों का नहीं है। ध्यान से देखिए ये देश की प्रभुत्वशाली जातियों का गुस्सा है।
“हम श्रेष्ठ हैं, मगर नौकरियां और मेडिकल-इंजीनियरिंग-आइ.ए.एस. की सीटें ले जा रहे हैं कोई और...”,”आरक्षण न हो तो प्रतिभा पलायन न हो...”, ”आरक्षण ने जातिवाद को और भी फैलाया है...”, ”चलिए मान लेते हैं ‘उनके’ साथ कुछ ज्यादतियां पहले हुईं, मगर एक अति का जवाब दूसरी अति तो नहीं...” – कुछ सुने-सुनाए तर्क नहीं हैं ये?
इनमें से कुछ समझदार बड़ी गंभीरता से कहते हैं कि साहब आरक्षण से बुराई नहीं है, बुराई यह है कि ये उनको भी मिल जाता है जो पिछड़ों में पैसे वाले हैं और इधर बेचारा गरीब ब्राह्मण-ठाकुर रह जाता है। सो, आरक्षण होना तो चाहिए मगर ‘आर्थिक आधार’ पर न कि जाति के आधार पर। जातिगत आरक्षण से देश में जातिवाद फैल रहा है।
जन्म से लेकर मरने तक आप लोगों के जाति-कुल-गोत्र का हिसाब रखेंगे, शादी के लिए कुंडली से पहले जाति मिलाएंगे, लेकिन कहेंगे आरक्षण आर्थिक आधार पर हो। आर्थिक आधार समान हो तो कितने ब्राहण-ठाकुर अपने बच्चों की शादी...नहीं...नहीं ‘पवित्र विवाह’ किसी दलित के घर करेंगे? करना तो दूर ऐसा सोचने भर से विवाह की ‘पवित्रता’ भंग हो जाती है। खानदान की इज्जत के नाम पर इस देश में कितने युवाओं को अंतर-जातीय शादी करने पर मार डाला जाता है इसका कुछ हिसाब लगाया है आपने? अगर नहीं तो लगाइये।
ऐसा भी नहीं है कि आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग करने वालों को गरीबों से बड़ा प्रेम है। ऐसा होता तो वे देश के संसाधनों और संपत्ति के बराबर वितरण की मांग पहले करते। मगर यह मांग उठाने पर तो संपत्ति उनके हाथों में पहुंच जाएगी जिनको अभी तक उससे वंचित रखा है और ये तो बहुसंख्यक दलित-आदिवासी-पिछड़े ही हैं! भई, इस देश में जाति ‘आर्थिक आधार’ से स्वतंत्र नहीं है। आर्थिक आधार पर आरक्षण ही क्यों? संसाधनों का समान बंटवारा क्यों नहीं? हमारे समाज की मूलभूत विसंगति तो संसाधनों के बंटवारे की है, लेकिन आर्थिक आधार पर आरक्षण की बात करने वाले इस पर चुप्पी साधे ही देखे जाते हैं। असल बात यह है कि आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग का असल मकसद आरक्षण व्यवस्था को ही खत्म करना है गैर-बराबरी को नहीं ताकि अच्छी नौकरियों और बेहतर शिक्षा पर उच्च वर्णों-वर्गों का वर्चस्व कायम रहे।
जहां तक रही आरक्षण से जातिवाद फैलने की बात तो जब तक सवर्णों का वर्चस्व था तब तक किसी को देश में जातिवाद नहीं दिखाई दे रहा था। घर में दलितों और मुसलमानों के कप-गिलास अलग से रखे जाते थे, तब जातिवाद नहीं था। विश्वविद्यालय से लेकर सचिवालय तक पंडित जी पंडितों को नौकरियां दे रहे थे और ठाकुर साहब ठाकुरों को तब भी देश में जातिवाद नहीं था। जातिवाद तब पैदा हुआ जब इस सवर्ण वर्चस्व को चुनौती मिली।
एक अति का जवाब दूसरी अति नहीं है – यह बड़ा पवित्र विचार है। मुझे भी अच्छा लगता है, मगर क्या करें समाज में बदलाव तो अति की स्थितियों से होकर ही संभव हुए हैं। यह इतिहास है। और किसने कह दिया कि पहली वाली अति अब खत्म हो चुकी है? क्या प्रथम श्रेणी की नौकरियों में सभी दलितों-आदिवासियों-पिछड़ों का प्रतिनिधित्व उनकी जनसंख्या के अनुरूप हो गया है? क्या आय के साधनों और देश के संसाधनों पर मालिकाना हक समतापूर्ण हो गया है? जमीन पर मालिकाना हक क्या उनका है जो उस पर मेहनत करते हैं? क्या निजी क्षेत्र में दलितों की भागीदारी बराबरी की हो गई है? क्या मीडिया में दलितों दखल बराबरी का हो चुका है? क्या सवर्णों ने शादियों में जाति की शर्त को खत्म कर दिया है? ऐसा कुछ नही हुआ है!
यानी सवर्णों की अति तो खत्म हुई ही नहीं और आप चाहते हैं कि ये ‘दूसरी वाली अति’ खत्म हो जाए! असल में ऐसे पवित्र विचारों का चरित्र दोगला होता है जो ‘अति’ के मूल को खत्म किए बिना ‘अति’ को खत्म करने की बात करते हैं। पहले जाति खत्म कीजिए फिर आरक्षण खत्म करने की बात कीजिएगा।
लेकिन ये सब एक तरफ और हार्दिक पटेल का गुस्सा एक तरफ! सड़कों से लेकर सोशल मीडिया तक यह गुस्सा बजबजा रहा है। श्रेष्ठता की ग्रंथि जहर बन कर फैल चुकी है। कब तक खैर मनाएंगे?
- लोकेश मालती प्रकाश


