हार्पर-मोदी दोनों के हाथ खून से रंगे हैं- लिज़ रोले
हार्पर-मोदी दोनों के हाथ खून से रंगे हैं- लिज़ रोले
हार्पर-मोदी एक ही थैली के चट्टे-बट्टे- लिज़ रोले, कनेडियन कम्युनिस्ट नेत्री
अब यूनियन के वर्गीय चरित्र को भी जांचने का वक्त आ गया है - हरबंस सिंह
टोरंटो से - शमशाद इलाही शम्स
हार्पर और मोदी की राजनीतिक पृष्ठभूमियाँ भले ही भिन्न हों, लेकिन इन दोनों नेताओं के मकसद एक हैं. दोनों बहुराष्ट्रीय कार्पोरेट के मुनाफे में उत्तरोउत्तर वृद्धि के लिए कार्यरत हैं, दोनों के हाथ खून से रंगे है, मोदी ने अपने देश में कत्लेआम किया जबकि हार्पर के हाथ इराक, सीरिया, अफगानिस्तान में आम नागरिको के खून से सने हैं.
ये शब्द ओंटेरियो कनेडा कम्युनिस्ट नेता लिज़ रोले ने मई दिवस के मौके पर आयोजित एक समारोह में कहे. ब्रेम्पटन मई दिवस समीति के तत्वावधान में करीब एक दर्जन जन संगठनों की अगुवाई में मई दिवस का प्रथम कार्यक्रम लोफर्स लेक रिक्रेएशन सेंटर ब्रेम्पटन में किया गया था. उक्त मंच कम्युनिस्ट पार्टी कनेडा, जी टी ए वेस्ट कल्ब द्वारा बनाया गया जन संगठन है.
कामरेड लिज़ ने हार्पर सरकार पर हमला करते हुए कहा कि यह सरकार भय दिखा कर शासन करना चाहती है, बचत के नाम पर जनता के जायज़ हक़ों का गला घोंट कर हथियार खरीद रही है और अमेरिका की गंदी युद्ध नीति में हिस्सेदारी लेकर करदाताओं के धन का गलत इस्तेमाल कर रही है. जनता को नौकरी, शिक्षा, स्वास्थ्य, बुजुर्गों के लिए सस्ते घर, पेंशन चाहिए, लेकिन हार्पर सरकार इराक, सीरिया में युद्ध लड़ रही है और जनता के संसाधनों का दुरुपयोग कर रही है. कनाडा हुकूमत की दुनिया भर में शांति स्थापना के कार्यो की प्रशंसा होती थी, आज उसी कनाडा को हार्पर सरकार ने आक्रमणकारी हुकूमत बना दिया है. हार्पर सरकार द्वारा यूक्रेन की दक्षिणपंथी सरकार के साथ चल रहे जनविरोधी सहयोग की उन्होंने कड़े शब्दों में भर्त्सना करते हुए उपस्थित जनता से आह्वान किया कि आने वाले चुनाव में हार्पर सरकार को हरा कर कड़ा सबक सिखाना चाहिए. हार्पर सरकार बिल सी-५१ के जरिये देश में एक पुलिस राज कायम करना चाहती है जिसके तहत पुलिस को किसी भी नागरिक को गिरफ्तार करने का अधिकार मिल जायेगा जो कनेडियन संविधान में प्रदत्त मूल अधिकारों की अवहेलना करता है.
मई दिवस के मौके पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि कामगार तबके के सामने यह सबसे कठिन समय है जब एक तरफ उसे अपनी आर्थिक दिक्कतों के ज़बरदस्त सामना है दूसरी तरफ सरकार ऐसे क़ानून लाना चाहती है जिससे उनके संगठित होने पर ही खतरा पैदा होगा. वर्तमान शासन के इस जनविरोधी स्वरूप का खात्मा इसी कामगार तबके को करना होगा. उन्होंने कहा कि यह संभव है, ठीक चालीस साल पहले छोटे से वियतनाम ने दुनिया के सर्वाधिक शक्तिशाली देश अमेरिका को परास्त किया था. कामरेड लिज़ ने कामगार तबके की एकता पर बल देते हुए अपील की कि यह लड़ाई कठिन जरूर दिखती है, लेकिन हमारी एकता और दृढ निर्णय शक्ति इसे अवश्य हरा सकती है.
सरोकारों दी आवाज़, समाचार पत्र समूह के संस्थापक हरबंस सिंह ने इस अवसर पर कनाडा के बदलते मजदूर आन्दोलन का ब्यौरा देते हुए कहा कि २०११ में कुल २७ प्रतिशत कामगार यूनियनबद्ध था, जो आश्चर्यजनक रूप से कनाडा के सर्वाधिक आय वाला कामगार तबका भी है जिसे गैर युनियनबद्ध मजदूर से १.७५ गुना अधिक वेतन मिलता है, निजी क्षेत्र में यूनियन का प्रतिनिधित्व १९९७ -२०११ में गिरकर २१ से मात्र १४ प्रतिशत रह गया है. मजदूर यूनियन के इस बदलते वर्ग चरित्र पर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि अब यूनियन के वर्गीय चरित्र को भी जांचने का वक्त आ गया है.
कलमा दा काफिला संगठन के प्रतिनिधी के रूप में बोलते हुए पंजाबी साहित्यकार कुलविंदर खेडा ने कहा कि आज बड़े बड़े कार्पोरेट समूह अपनी एक छत के नीचे दुरंगी नीतियाँ लागू कर रहे है. फोर्ड अपने वरिष्ठ कर्मियों को जहाँ ३५ डालर प्रति घंटा वेतन दे रहा है, उसी छत के नीचे नए कामगारों को उसी कार्य के मात्र २० डालर प्रतिघंटा वेतन दे रहा है। इस दोहरी नीति का विरोध करने पर वह सरेआम धमकी देता है कि यदि उक्त शर्तों पर काम नहीं किया गया तो वह अपना कारखाना मैक्सिको में स्थानांतरित कर देगा. उन्होंने कहा कि बड़े-बड़े बैंक हर साल भारी मुनाफा कमाने के बावजूद अपने ग्राहकों पर नए-नए मनचाहे सर्विस चार्ज लगा रहे हैं, जिन पर काबू रखने के लिए कोई सरकारी संस्था ही नहीं है. सरकार, मुनिस्पल्टी आये दिन करों में, सर्विस चार्ज में वृद्धि कर रही है जिनके खिलाफ कोई आवाज़ नहीं उठ रही। ऐसी स्थिति में आवाम के पास सिर्फ जेब कटवाने के आलावा कोई चारा नहीं बचा. उन्होंने वर्किग क्लास के एकजुट होने और इन शासकीय हमलों के प्रति एकताबद्ध होकर लड़ने का आह्वान किया.
इंडो कनेडियन वर्कर्स असोसिएशन के सचिव सुरजीत सहोटा ने इस अवसर पर बोलते हुए १३० साल पहले शुरू हुए संघर्ष, और शहीद हुए अमेरिकी मजदूरों को भावभीनी श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि उनकी संस्था प्रवासी भारतीयों और उनके सामने उत्पन्न हो रही समस्याओं के प्रति संघर्ष करने में हमेशा आगे रही है. कामगार तबके की हर समस्या के लिए वह अपना संघर्ष अभियान हमेशा जारी रखेगी.
उत्तर अमेरिकी तर्कशील सोसाइटी के प्रतिनिधि बलदेव रहपा ने मजदूर दिवस के इतिहास और वर्तमान में उसकी प्रासंगिकता को परिभाषित करते हुए कहा कि समस्या की असली जड़ सरमायेदारी है, एक सजग और मार्क्सवादी दर्शन से लैस मजदूर आन्दोलन ही सरमायेदारी का खात्मा कर सकता है, उन्होंने कहा कि यह बात सही है कि सोवियत विखंडन के बाद पूरी दुनिया में मजदूर आन्दोलनों को भारी नुकसान हुआ है जिसके चलते सरमायेदार आज पूरी शक्ति से हमलावर बना हुआ है, इन परिस्थितियों में मजदूर आंदोलनों की एकजुटता ही इसका सामना कर सकती है. तर्कशील सोसाईटी अपने ढंग से इस समस्या पर काम कर रही है खासकर, सभी धर्मो में बढ़ रही धार्मिक कट्टरता मजदूर आन्दोलनों के विकास में प्रमुख बाधा उत्पन्न कर रहा है, इसी समस्या को तर्क, विवेक, वैज्ञानिक शिक्षा के माध्यम से सुलझाने में तर्कशीलों का कार्यभार और बढ़ गया है जिसे वह समान विचारधारा के संगठनों को साथ लेकर सतत संघर्षरत हैं.
प्रोग्रेसिव पाकिस्तानी कनेडियन कमेटी के नेता उमर लतीफ़ ने मई दिवस की उपयोगिता को चिन्हित करते हुए कहा कि १३० साल पहले आठ घंटे काम करने की लड़ाई आज दोबारा शुरू करनी होगी, क्योंकि हालात ऐसे बना दिए गए हैं कि मजदूर आज भी १०-१२ घंटे काम करने के लिए मजबूर है. इस लडाई में हमें कामगारों की एकता पर बल देना होगा. हमें कामगारों को धर्म, नस्ल, देश के नाम पर बांटने वाली शासकवर्गीय नीतियों का पर्दाफाश करते हुए मजदूर वर्ग की एकता पर ध्यान केन्द्रित करना होगा. बांटने वाली नीतियों को भारत-पाकिस्तान के नागरिकों से बेहतर और कोई नहीं जानता, क्योंकि उन्होंने धर्म के नाम पर नफरतें फैलाईं और मुल्क बांटा जिससे जनता का ही नुकसान हुआ और फायदा सिर्फ सरमायेदारों और सियासतदानों का हुआ.
पंजाबी साहित्य सभा के प्रतिनिधि मलूक काहलो ने इस अवसर पर ब्राम्पटन मई दिवस समिति का धन्यवाद करते हुए कहा कि आज कामगार समाज को एक मंच पर लाने की हमारी सबसे बड़ी जरुरत है. जो लडाई अमेरिका के मजदूरों ने १३० साल पहले शुरू की थी उसे मौजूदा परिस्थिति में आज के सवालों के साथ खड़ा करके एक बार फिर संघर्ष में उतरने की जरुरत है, क्योकि सरमायेदार आज पूरी शक्ति से मजदूर वर्ग को कुचलने में लगा है. मजदूर आन्दोलन की एकता पर बल देते हुए उन्होंने आह्वान किया कि वतर्मान चुनौतियों को एक मज़बूत मेहनतकशो का आन्दोलन ही परास्त कर सकता है.
कंसर्न नेपाल कनाडा के प्रतिनिधि गोविन्द शिवाकोटी नेपाल में आये भूकंप के चलते उत्पन्न हुई स्थिति में आयोजन में शामिल न हो सके। उनका लिखित सद्भावना सन्देश सभा को संचालित कर रहे विल्फ्रेड श्रेंस्की ने पढ़ कर सुनाया। जिसका लिखित जवाब उन्होंने सभा के सम्मुख भी रखा. सभा के प्रारंभ में नेपाल में आये भूकंप के कारण हुई अपार जनक्षति और मरने वालों के सम्मान में एक मिनट का मौन रखा गया. सिंधी अदबी संगत-टोरंटो के प्रतिनिधि खैर मोहम्मद कोलाची किन्हीं कारणवश सभा में सम्मिलित न हो सके.
कार्यक्रम में युवा गायक नवतेज सिंह ने सुरजीत पातर का गीत शानदार गाया, प्रसिद्द गायक बंधु बलजीत बेंस-सुमीत बैंस ने अपने क्रांतिकारी गीतों से सभी का मन मोह लिया. इस मौके पर टोरंटो से आये वालेस ब्रुक्स ने दक्षिण अमेरिकी, रूसी, जर्मनी और अफ्रीकी जनवादी संगीत की प्रस्तुति सेक्साफोन पर की और अंत में मजदूरों का विश्व्गान ‘इंटरनेशनल’ भी गाया गया.


