हाशिमपुरा नरसंहार - सीआईडी की लचर तफ्तीश से हुए अभियुक्त बरी – बोले तत्कालीन एसपी वीएन राय
हाशिमपुरा नरसंहार - सीआईडी की लचर तफ्तीश से हुए अभियुक्त बरी – बोले तत्कालीन एसपी वीएन राय
नई दिल्ली। हाशिमपुरा नरसंहार में मारे गए 42 लोगों के मामले में अदालत ने सभी अभियुक्तों को बरी कर दिया है। यह सीआईडी की लचर तफ्तीश का बड़ा उदाहरण है। यह टिप्पणी गाजियाबाद के तत्कालीन एसपी वीएन राय की है, जिन्होंने इस मामले का मुकदमा दर्ज कराया था। हाशिमपुरा नरसंहार को लेकर उनकी पुस्तक भी आ रही है।
1987 में मेरठ के हाशिमपुरा में हुए नरसंहार में 42 निर्दोष लोगों को मार दिया गया था और उन्हें गाजियाबाद में फेंक दिया गया था। उस समय गाजियाबाद के पुलिस अधीक्षक विभूति नारायण राय थे, जिन्होंने इस मामले में मुकदमा दर्ज कराया था और जांच के बाद 16 पीएसी के जवान अभियुक्त बने थे, जिन्हें अदालत ने सबूतों के अभाव में छोड़ दिया।
राय का कहना है कि सीआईडी ने जिस तरह इस मामले में लचर ढंग से तफ्तीश की थी, उससे यही होना था। यह फैसला एक बार फिर सत्ता के निरंकुश चरित्र को बेनकाब करने वाला है। किसी भी ऐसे बड़े मामले में अभियुक्तों के खिलाफ न ढंग से पैरवी होती है और न ही तफ्तीश। जिसकी वजह से अदालत साक्ष्य के अभाव में अभियुक्तों को बरी कर देती है।
गौरतलब है कि लक्ष्मनपुर बाथे और शंकर बिगहा के सामूहिक दलित नर संहार की तरह हाशिमपुरा नरसंहार के अभियुक्त भी बरी हो गए। दलित चिन्तक लालजी निर्मल के मुताबिक लक्ष्मनपुर बाथे और शंकर बिगहा के नरसंहार के आरोपियों को सजा दिलाने के लिए कोई आवाज ही नहीं बन पाई। काश हाशिमपुरा से न्याय के इस चेहरे पर संवाद हो सके।
उत्तर प्रदेश में मेरठ के हाशिमपुरा में 22 मई, 1987 को बड़ी संख्या में पीएसी के जवानों ने पहुंचकर मस्जिद के सामने चल रही धार्मिक सभा से मुस्लिम समुदाय के करीब 50 लोगों को हिरासत में ले लिया था। पीएसी के जवानों पर इनमें से 42 लोगों की गोली मारकर हत्या करने के बाद शव नहर में फेंकने का आरोप था। उत्तर प्रदेश पुलिस ने वर्ष 1996 में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, गाजियाबाद की अदालत में आरोपपत्र दायर किया था। आरोपपत्र में 19 लोगों को हत्या, हत्या का प्रयास, साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ और साजिश रचने की धाराओं में आरोपी बनाया गया था। वर्ष 2002 में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट में स्थानांतरित कर दिया था।


