हाशिमपुरा के पीड़ितों को न्याय नहीं
सुरक्षाकर्मियों की हिरासत में हत्या की सबसे बड़ी घटना के रूप में हाशिमपुरा भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में दर्ज हो चुका है। 22 मई 1987 को जब 19 पीएसी (प्राविंसियल आर्म्ड कांसटेबुलरी) के जवानों ने मेरठ के हाशिमपुरा मोहल्ले से 42 मुसलमानों को उठाकर गाजियाबाद के पास नहर के किनारे खड़ा कर गोलियों से भून दिया, उस समय गाजियाबाद के पुलिस अधीक्षक के रूप में विभूति नारायण राय कार्यरत थे। उन्हें इस घटना की जानकारी घटना के डेढ़ घंटे बाद रात में तकरीबन 10.30 बजे मिली और उस समय से ही इस मुद्दे पर शुरू हुई उनकी सक्रियता आज तक बरकरार है। उन्होंने पीएसी के उन हत्यारों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया, 28 वर्ष तक यह मुकदमा चला लेकिन 21 मार्च 2015 को जब अदालत का फैसला आया तो सभी लोग हतप्रभ रह गए।
भारतीय लोकतंत्र के इतिहास के इस सबसे जघन्य हत्याकांड में किसी को सजा नहीं हुई और सभी आरोपी बाइज्जत बरी कर दिए गए।
वी.एन.राय का मानना है कि इस घटना ने भारतीय राज्य की साख को खतरे में डाल दिया। हैरानी होती है कि एक मामूली सी फोरेंसिक जांच से भी यह पता लगाया जा सकता था कि जो लोग मारे गए थे उनके शरीर में लगी गोलियां सरकारी रायफलों से चली गोलियां थीं और फिर भी अदालत सबूत तलाशती रही कि इन्हें किसने मारा है।
हाशिमपुरा की घटना से यह भी पता चलता है कि किस तरह उत्तर भारत में चले रामजन्म भूमि आंदोलन ने सांप्रदायिक आधार पर समाज को ही नहीं बल्कि सुरक्षा एजेंसियों को भी बांट दिया था। वी.एन.राय का मानना है कि इस आंदोलन ने ‘खास तौर से हिंदू मध्यवर्ग को अविश्वसनीय हद तक सांप्रदायिक बना दिया’। इस घटना ने भारतीय राज्य के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को भी बेपरदा कर दिया है।
अफसोस की बात है कि जिस मानसिकता ने इस तरह की घटना को जन्म दिया उसी मानसिकता को और भी ज्यादा गहराई के साथ भारतीय समाज में स्थायी रूप देने के लिए आज भरपूर कोशिशें की जा रही हैं क्योंकि सत्ता पर वही लोग पूरी तरह काबिज हो गए हैं जो हिन्दू राष्ट्र के हिमायती हैं और जिनकी निगाह में देश का अल्पसंख्यक समुदाय राष्ट्र विरोधी है। हिंदुत्व की विचारधारा से लैस इन महारथियों के आदर्श मुसोलिनी और हिटलर हैं जो नस्ली शुद्धता की बात करते हैं। हाशिमपुरा की घटना पर आए फैसले ने एक बार फिर अल्पसंख्यकों के अंदर भारतीय राज्य के प्रति अविश्वास की भावना को और भी ज्यादा मजबूत कर दिया है। यह फैसला एक बड़ी चुनौती बन कर धर्मनिरपेक्ष और जनतांत्रिक तत्वों के सामने खड़ा है जो यह मानते हैं कि राष्ट्र महज एक भौगोलिक ईकाई नहीं होता बल्कि विभिन्न वर्गों और समुदायों की आकांक्षा का प्रतीक होता है। 21 मार्च के फैसले के बाद देश के विभिन्न हिस्सों में गुस्सा है और यह गुस्सा केवल अल्पसंख्यकों के अंदर नहीं है। यह गुस्सा केवल उन परिवारों के अंदर नहीं है जिनके जवान बेटे और पति 22 मई 1987 की रात में बेरहमी से मार दिए गए… हाशिमपुरा के इस दर्दनाक हादसे पर विभूति नारायण राय की पुस्तक पेंग्विन इंडिया से प्रकाशित होकर आ रही है
आनंद स्वरूप वर्मा
(समकालीन तीसरी दुनिया के अप्रैल 2015 का संपादकीय)
आनंद स्वरूप वर्मा, वरिष्ठ पत्रकर हैं। समकालीन तीसरी दुनिया के संपादक हैं।