हिन्दुत्ववादी ´राष्ट्रवाद´ आम जनता के शत्रु के रूप में सामने आया है
हिन्दुत्ववादी ´राष्ट्रवाद´ आम जनता के शत्रु के रूप में सामने आया है
राष्ट्र, राष्ट्रवाद और विचारधारा
पहले ´राष्ट्रवाद´ने कुर्बानी और त्याग की भावना पैदा की लेकिन हिन्दुत्ववादी ´राष्ट्रवाद´तो पूरी तरह अवसरवादी और बर्बर है
जगदीश्वर चतुर्वेदी
आजकल ´राष्ट्रवाद´के सवाल पुनः केन्द्र में आ गए हैं। इस बहस के प्रसंग में पहली बात यह कि ´राष्ट्रवाद´का कोई एक रूप कभी प्रचलन में नहीं रहा। आम जनता में उसके कई रूप प्रचलन में रहे हैं। स्वाधीनता संग्राम के दौरान ´राष्ट्रवाद´के वैविध्यपूर्ण रूपों को समाज में सक्रिय देखते हैं। यही स्थिति स्वतंत्र भारत में भी रही है।
लोकतंत्र के विकास की प्रक्रिया में राष्ट्रवाद सामान्य तौर पर एक समानान्तर विचारधारा के रूप में हमेशा सक्रिय रहा है। मुश्किल उनकी है जो राष्ट्रवाद को लोकतंत्र की स्थापना के साथ हाशिए की विचारधारा मानकर चल रहे थे।
अपने पैर नहीं होते राष्ट्रवाद के, आत्मनिर्भर विचारधारा नहीं है यह
राष्ट्रवाद स्वभावतः निजी अंतर्वस्तु पर निर्भर नहीं होता अपितु हमेशा अन्य विचारधारा के कंधों पर सवार रहता है। राष्ट्रवाद के अपने पैर नहीं होते।यह आत्मनिर्भर विचारधारा नहीं है।
आधुनिक काल आने के साथ ही ´राष्ट्रवाद´के विभिन्न रूप दिखाई देते हैं, उनमें यह समाजवाद, उदारतावाद, अनुदारवाद यहां तक कि अराजकतावादी विचारधारा के कंधों पर सवार होकर आया है। राष्ट्रवाद के लिए कोई भी अछूत नहीं है, वह साम्प्रदायिक, पृथकतावादी, आतंकी विचारधाराओं के साथ भी सामंजस्य बिठाकर चलता रहा है। इसलिए ´राष्ट्रवाद´पर विचार करते समय उसका ´संदर्भ´और ´सांगठनिक-वैचारिक आधार´जरूर देखा जाना चाहिए, क्योंकि वही उसकी भूमिका का निर्धारक तत्व है।
मार्क्सवादी आलोचक ´राष्ट्रवाद´को ´छद्मचेतना´ कहकर खारिज करते रहे हैं, जो कि सही नहीं है। जैसा कि हम सब जानते हैं कि प्रत्येक विचारधारा में ´छद्म´या ´असत्य´भी होता है और ´संभावनाएं´ भी होती हैं। यही स्थिति ´राष्ट्रवाद´की भी है।
´राष्ट्रवाद´की कोई भी इकसार या एक परिभाषा संभव नहीं
हमें देखना चाहिए कि ´राष्ट्रवाद´की जब बातें हो रही हैं तो किस तरह के इतिहास और आख्यान के संदर्भ में हो रही हैं। क्योंकि ´राष्ट्रवाद´कोई ´तथ्य´या ´यथार्थ´का अंश नहीं है, वह तो विचारधारा है, उसका इतिहास और आख्यान भी है। जिस तरह प्रत्येक विचारधारा ´स्व´या सेल्फ के चित्रण या प्रस्तुति के जरिए अपना इतिहास बनाती है, वही काम ´राष्ट्रवाद´भी करता है। इसलिए ´राष्ट्रवाद´की कोई भी इकसार या एक परिभाषा संभव नहीं है। ´राष्ट्रवाद´पर विचार करते समय हम यह देखें कि देश को कैसे देखते हैं ॽ कहाँ से देखते हैंॽ और कौन देख रहा है ॽ
हिटलर के लिए ´राष्ट्रवाद´ का जो मतलब है वही गांधी के लिए नहीं है।
समाजवाद में ´राष्ट्रवाद´का जो अर्थ है वही अर्थ पूंजीवाद के लिए नहीं है।´राष्ट्रवाद´ के नाम पर इन दिनों वैचारिक मतभेद मिटाने की कोशिश की जा रही है,´राष्ट्र´ की आड़ में व्यक्ति ,वर्ग और समुदाय के भेदों को नजरअंदाज करने की कोशिश की जा रही है। असल में ´राष्ट्रवाद´तो भेद की विचारधारा है। फिलहाल देश में जो चल रहा है उसमें इसका तात्कालिकता, विदेश नीति और खासकर पाक केन्द्रित विदेश नीति, मुस्लिम विद्वेष, हिन्दुत्ववादी श्रेष्ठत्व से गहरा संबंध है।
पूरी तरह अवसरवादी और बर्बर है हिन्दुत्ववादी ´राष्ट्रवाद´
´राष्ट्रवाद´में तात्कालिकता इस कदर हावी रहती है कि आपकी सूचनाओं का वैचारिक उन्माद की आड़ में अपहरण कर लिया जाता है। सूचनाओं के अभाव को उन्माद से भरने की कोशिश की जाती है। स्वाधीनता संग्राम के दौरान राष्ट्रवाद की साम्राज्यवादविरोधी धारा आम जनता को सचेत करने, दिमाग खोलने का काम करती थी, लेकिन इन दिनों तो ´राष्ट्रवाद´आम जनता के दिमाग को बंद करने का काम कर रहा है, सूचना विपन्न बनाने का काम कर रहा है। पहले वाला ´राष्ट्रवाद´आम जनता की ´स्मृति´को जगाने, समृद्ध करने का काम करता था, लेकिन सामयिक हिन्दुत्ववादी राष्ट्रवाद ´स्मृति´ पर हमला करने का काम कर रहा है। बुद्धि और विवेक के अपहरण का काम कर रहा है। पहले ´राष्ट्रवाद´ने कुर्बानी और त्याग की भावना पैदा की लेकिन हिन्दुत्ववादी ´राष्ट्रवाद´तो पूरी तरह अवसरवादी और बर्बर है। इसकी सामाजिक धुरी है मुस्लिम विरोध और अंत्यज विरोध। इसका लक्ष्य है अबाध कारपोरेट लूट का शासन स्थापित करना। स्वाधीनता आंदोलन के दौरान ´राष्ट्रवाद´के आंदोलन ´अन्य´को आलोकित करने, प्रकाशित करने का काम करता था,लेकिन मौजूदा हिन्दुत्ववादी राष्ट्रवाद तो ´अन्य´का शत्रु है। यह सिर्फ ´तात्कालिक राजनीति´ केन्द्रित है। जबकि पुराना राष्ट्रवाद अतीत, वर्तमान और भविष्य इन तीनों को सम्बोधित था। साम्राज्यवाद विरोध ´राष्ट्रवाद´ का आख्यान ´रीजन´ यानी तर्क के साथ आया लेकिन नया राष्ट्रवाद सभी किस्म के ´रीजन´का निषेध करते हुए आया, इसका मानना है कि आरएसएस जो कह रहा है उसे मानो, वरना ´देशद्रोही´ कहलाओगे। पुराने ´राष्ट्रवाद´के पास साम्राज्यवाद विरोध का महाख्यान था, लेकिन नए राष्ट्रवाद के पास तो कोई आख्यान नहीं है, बिना आख्यान के, सिर्फ रद्दी किस्म के नारों और डिजिटल मेनीपुलेशन के आधार पर यह अपना विस्तार करना चाहता है। जो उससे असहमत हैं उनको कानूनी आतंक के जरिए नियंत्रित करना चाहता है या फिर मीडिया आतंकवाद के जरिए मुँह बंद करना चाहता है। पुराने वाले राष्ट्रवाद के सामने मुकाबले के लिए यूरोपीय राष्ट्रवाद था, लेकिन हिन्दुत्ववादी राष्ट्रवाद के सामने तो आम जनता ही है। यह आम जनता के शत्रु के रूप में सामने आया है।


