"हिन्दुस्तान" बदल देता है बड़े साहित्यकारों के लेख की भाषा भी
"हिन्दुस्तान" बदल देता है बड़े साहित्यकारों के लेख की भाषा भी
हिंदुस्तान में 4 जून को छपे लेख के विरोध में पत्र
गोविंद जी,
धन्यवाद 4 जून 2011 के हिंदुस्तान ने मेरे नाम से लेख छापा। मुझे उसे पढ़कर लगा कि हिंदुस्तान बाबा रामदेव के समर्थन में है। जनतंत्र में हर किसी को अपनी राय रखने की स्वतंत्रता है। लेकिन अखबार को यह स्वतंत्रतता नहीं कि वह किसी लेखक के मूल विचार को बदल कर एक नया लेख तैयार कर दे। मैंने स्पष्ट रूप से उनके आंदोलन के बारे मे तल्ख टिप्पणी की थी जिसको संभवतः संबधित व्यक्ति ने निकाल दिया। संपादक का यह अधिकार है कि वह लेख न छापे पर उस लेख की आत्मा ही को नष्ट कर दे यह अधिकार संभवतः नहीं है। इस उम्र में छपने की इतनी लालसा नहीं कि अपनी मान्यता के मूल्य पर छपने के सुख का उपभोग करूं। मैंने लिखा था न छापें तो सूचित कर दें। मैं उसका एक अंश देना चाहता हूं –‘सरकार क्या नहीं समझती थी कि बाबा रामदेव जो देश भर में अपने सत्याग्रह का प्रचार करते घूम रहे हैं और लोगों से विदेश मे जमा धन को देश में लाने के लिए नारे लगा रहे हैं, वह देश के हित की बात तो है ही लेकिन उनके अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए भी है, सरकार को धमकाने के लिए भी है कि उनके साथ एक करोड़ लोग हैं। वे सरकार के चार मंत्रियों के, बक़ौल समाचार पत्रों के घुटनें टेकने से, अपना अनशन वापिस ले लेंगे? कदापि नहीं। राजनीति में तो यह होता ही नहीं, व्यवसाय में तो बिल्कुल नहीं। उनसे बात करना ज़रूरी था भले ही सरकार उनकी सब शर्तें मान लेती। बाबा से, बकौल उनके जब सरकारी अमला संपर्क में था तो क्या उन्हें नहीं मालूम था भारत सरकार के चार मंत्री उनके स्वागत और बातचीत के लिए एयर पोर्ट पर आ रहे हैं। लगभग पूरी भारत सरकार। उन्हें क्या यह नहीं कहना चाहिए था कि नहीं, मैं स्वयं उनसे मिलूंगा।‘
यह भी लिखा था ‘बाबा रामदेव ने योग मार्केंटिंग में जो ऊंचाई छुई है उससे यह स्पष्ट है कि वे अनशन पर बैंठेगे चाहे सारी कैबिनेट साष्टांग लेट जाए। हां बाद में कुछ मुद्दों पर रज़ामंदी के बाद अनशन भले ही खत्म हो जाए। एक करोड़ लोग दो महीने तक अनशन पर नहीं रहेंगे। वे सब बाबा नहीं हैं। सरकार को समझना चाहिए उनने देश गरिमा बचाने पक्ष में शपथ ली है, सरकार बचाने के पक्ष में नहीं।’ सरकार को भी नहीं छोड़ा।
मैं क्षमा चाहता हूं कि मैंने यह लेख भेजकर आपको धर्म संकट मे डाला। आप लोगों के साथ अपनत्व के कारण मैं अपने लेखों की काटपीट का खेल सहता रहा हूं। कृपया आप इसका पारश्रमिक न भेंजें यह मेरा लेख नहीं रहा। आशा है आप और संपादक जी अन्यथा न लेंगे।
भवदीय
गिरिराज किशोर


