२०१४ के बाद भाजपा सरकार प्रायोजित साम्प्रदायिकता
मंज़ूर अली

स्वातंत्र्योत्तर भारत में साम्प्रदायिकता को तीन चरणों में बांटा जा सकता है (मंजूर अली: २०१६). १९४७ से १९९२ प्रथम चरण, १९९२-२०१४ द्वितीय चरण तथा २०१४ के बाद तृतीय चरण में शुमार होता है।
हर चरण में साम्प्रदायिकता के अपने कुछ विशिष्ट लक्षण हैं।
यह लेख २०१४ के बाद की साम्प्रदायिकता का जिक्र करता है।
भाजपा ने कांग्रेस के खामियों को २०१४ के संसदीय चुनाव में खूब उजागर किया और विकास का मुखौटा ओढ़े हुए मोदी जी ने भाजपा को ऐतिहासिक जीत दर्ज़ करायी.
मगर, ऐसा नहीं था कि सांप्रदायिक ध्रुवीकरण नहीं हुआ. "पिंक क्रांति", बंगलादेशी घुसपैठी, पाकिस्तान और चीन के ख़िलाफ़ ५६ इंच का सीना, मुस्लिम तुष्टीकरण, इस्लाम को आतंवाद से जोड़ने जैसे मुद्दे खूब भुनाए गए.
यहाँ तह कहाँ गया कि जो भाजपा को वोट नहीं दे रहा है, वो पाकिस्तान जाने की तैयारी करे.
किसे पता था कि जीत के बाद यह जुमला इतना इस्तेमाल में लाया जायेगा.

मगर, सोचने की बात यह है कि देश के मात्र ३१ फीसदी वोटर ने भाजपा को वोट दिया है, बाकी ६९ प्रतिशत अन्य पार्टियों को मिला.
इस दौर की विशेषता यह है कि : १) साम्प्रदायिकता अपने चरम पर आ गयी और दक्षिणपंथी ताकतों ने हिन्दू ह्रदय सम्राट नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार को अघोषित हिन्दू राष्ट्र में तब्दील करना शुरू कर दिया है;
२) इस दौर में विरोध की कोई गुंजाईश नहीं रहती है - विरोधियों को राष्ट्रद्रोही करार किया जा रहा है;
३) साम्प्रदायिकता के ख़िलाफ़ संगठित राजनितिक विरोध न के बराबर हो गया है- ज्यादातर विरोध सिविल सोसाइटी की गतिविधियों में शामिल हो रहा है.
शायद इसीलिए विख्यात अर्थशास्त्री और दर्शनशास्त्री अमर्त्य सेन ने कहा कि

"आज का भारत तार्किक रूप से कमजोर दिखाई पड़ता हैl”

हाल में ऐसी कई घटनाएं हुईं, जिससे देश का लोकतंत्र, समाज में सहिष्णुता और इंसान का इंसान से भरोसा ही खतरे में पड़ गया है.

हम क्या खाएंगे, हम क्या पहनेंगे, हम क्या सोचें, हम क्या बोलें, यानि कि ज़िंदगी के हर पहलु पर भगवा सरकार और दक्षिणपंथी ताक़तों का नियंत्रण होता जा रहा है.
लोकतंत्र को भीड़ में बदल कर घरों में, सड़को पर, स्कूलों में, दफ्तरों में, सिनेमा घरों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ लोगों अन्धराष्ट्रभक्ति की तरफ धकेलने के प्रयास में लगी हुआ है.
हर बात को धर्म से जोड़ने का काम चलाया जा रहा है. शाकाहारी- मांसाहारी को हिन्दू बनाम मुसलमान का चोला पहनाया जा रहा है. मुसलमानो को जबरन हिन्दू धर्म में वापसी (‘घर वापसी') कराया जा रहा है. मुसलमानो के ऊपर यह भी इल्ज़ाम लगाया जा रहा है कि यह समुदाय साज़िश के तहत हिन्दू लड़कियों को प्यार के ज़ाल में फांस कर मुस्लिम बनाते हैं. इसके बदले हर हिन्दू का काम है कि १०० मुस्लिम लड़कियों को हिन्दू बनाये.
जाति-प्रथा का चलन भी मुसलमानों के मत्थे ही जड़ा जा रहा है.
असहिष्णुता का आलम यह है कि इस्लाम और पैगम्बर को भी नहीं बख्शा जा रहा है.

असम की घटना ने दूर पूर्वोत्तर में सांप्रदायिक सोच को उजागर किया हैl
काँग्रेस शासित प्रदेश में उसके एक विधायक, जो एक मुस्लिम से शादी करती हैं, तो भीड़ उन पर हमला कर के उन्हें चोटिल कर देती है और प्रदेश सरकार मूक दर्शक बनी रहती हैl
इन सबसे अनभिज्ञ हो कर हिन्दू ह्रदय सम्राट नरेंद्र मोदी राष्ट्र की भूमिका, जो कि हर नागरिक को सुरक्षा और सम्पन्ता प्रदान करना है, को संकुचित कर चुके है. वे ऐसे वर्ताव करते हैं, जैसे वे देश के प्रधानमंत्री नहीं बल्कि इस देश में हिन्दुओं के प्रधानमंत्री है.

क्या करना है
आज़ादी के ६८ सालों के राजनीतिक इतिहास को खंगालने से एक प्रवृत्ति स्पष्ट होती है कि मुसलमानों को पहचान और सुरक्षा के मुद्दों पर इतना उलझाये रखो कि विकास की बात हमेशा पिछड़ी रहे. और, जो विकास की बात करे उसे तुष्टिकरण के आरोप में घेर दो या अल्पसंख्यक सांप्रदायिकता का नाम दे दो.
जिस तरह से दलितों एवं आदिवासियों के लिए नीतियों से लेकर उनके वज़ूद के हर हिस्से को ब्राह्मणवादी सोच तय करना चाहती है उसी तरह मुसलमानों का विकास, छवि, स्थिति-परिस्थिति को इस देश का ब्राह्मणवादी सोच तय करना चाहती है. ये चाहती है की ये बताएं कि सच्चा देशभक्त ए. पी. जे. अब्दुल कलाम जैसा मुसलमान ही हो सकता है जो मुस्लिम बहुल देश के खिलाफ़ लड़ने के लिए हथियार बनाकर दे; एक सच्चा मुस्लमान सलमान खान जैसा ही हो सकता है जो गणेश की मूर्ति हाथों में लिए अखबार के पहले पन्नों पर नज़र आये और मोदी जी को चुनाव जीतने में मदद करे.

अगर कभी विकास करने की बात आये तो सबको समान समझने के नाम पर जरुरी विशेष मदद को नकार दिया जाय और फिर विकास में पिछड़ने की जिम्मेदारी समुदाय के ऊपर डाल दी जाय.
मेरा मानना है कि धर्मनिरपेक्षता सिर्फ मुसलमानों की जिम्मेदारी नहीं है. यह हर एक नागरिक, हर एक राजनीतिक एजेंट्स/एक्टर्स का फ़र्ज़ है कि वह सुनिश्चित करे कि धर्म, जाति, लिंग, क्षेत्र, भाषा इत्यादि, के नाम पर किसी व्यक्ति को भेदभाव न सहना पड़े.
भेदभाव से अशांति और रोष फैलता है जो मुल्क की तरक्की में मुश्किलें पैदा करती है. और अगर इससे लड़ना है तो ब्राह्मणवाद तथा पूंजीवाद से लड़ना जरूरी है.