आज गांधी कहां हैं? गांधी, कांग्रेस, भाजपा और भारत के जनमानस में महात्मा गांधी की मौजूदगी
आलोक वाजपेयी के लेख के अनुसार गांधी किसी एक राजनीतिक दल या संस्था तक सीमित नहीं हैं। उनकी मौजूदगी भारतीय जनमानस में मानवीय संवेदना, अहिंसा, सामाजिक मेल-जोल, संवाद, क्षमा, नैतिक साहस और अन्याय के विरुद्ध खड़े होने की प्रवृत्तियों में दिखाई देती है।;
Mahatma Gandhi
गांधी आज कहां हैं: राजनीति से दूर, लेकिन भारतीय समाज और जनमानस में अब भी मौजूद
आज गांधी कहां हैं? इतिहासकार आलोक वाजपेयी का यह लेख महात्मा गांधी की वर्तमान प्रासंगिकता, गांधी-नेहरू विचार, कांग्रेस की राजनीतिक विरासत, आरएसएस-भाजपा की गांधी के प्रति दृष्टि और भारतीय जनमानस में अहिंसा, सह-अस्तित्व, मानवीय संवेदना तथा सामाजिक एकता की मौजूदगी का विश्लेषण करता है। लेख यह सवाल उठाता है कि राजनीतिक दल गांधी का नाम तो लेते हैं, लेकिन क्या उनकी राजनीतिक समझ और नैतिक दृष्टि को वास्तव में आत्मसात करते हैं?
आज गांधी कहां हैं?
आलोक वाजपेयी
आज देश में गांधी जी को समझने के लिए कोई राजनीतिक दल दिल से इच्छुक नहीं है।
आरएसएस-भाजपा गांधी से नफ़रत करती है। वह हमेशा से उनके खिलाफ झूठ और नफरत कभी खुले, कभी छुपके प्रचारित करती रही है। यह पूरी तरह स्वाभाविक और समझ में आने वाली बात है। आरएसएस भाजपा की जो राजनीति और विचारधारा है,उसमें गांधी सबसे बड़ा रोड़ा हैं।
अन्य राजनीतिक दल गांधी का नाम अच्छे में लेते हैं, लेकिन गांधी को समझने और उनसे सीखने की उनमें कोई ललक नहीं है। वह केवल गांधी का अपनी सुविधा अनुसार गाहे-बगाहे भाजपा आरएसएस के खिलाफ खुद को दिखाने के लिए नाम ले लेते हैं।
आज की कांग्रेस में गांधी जी को लेकर सबसे दिलचस्प स्थिति है। गांधी की विरासत का सबसे बड़ा हिस्सा कांग्रेस के नाम है जो कि ऐतिहासिक तथ्य है। कांग्रेस के नेताओं, छोटे बड़े सब, में गांधी जी के प्रति एक श्रद्धा भी है और वह उन्हें अपने भी लगते हैं। लेकिन यह बिल्कुल भी पर्याप्त नहीं है। गांधी को समझने और उनकी राजनीतिक समझदारी और अंतर्दृष्टियों को भीतर उतार कर वर्तमान कांग्रेस को खड़ा कर सकने लायक विश्वास का कांग्रेस नेताओं, खासकर शीर्ष नेताओं, में अभाव है।
गांधी जी कांग्रेस के लिए भी एक ऐसे बुजुर्ग हैं जो उनके घर के हैं और इसीलिए उन्हें किसी से अपने बुजुर्ग के बारे में जानने की अलग से इच्छा शक्ति नहीं है। वो तो उनके घर के ही हैं।
एक और दिलचस्प बात कांग्रेस के मामले में है। कांग्रेस में इस बात पर गंभीर मंथन नहीं है कि आखिरकार भारत को आजादी दिलाने वाली, आजाद भारत राष्ट्र का निर्माण करने वाली, देश को दुनिया भर में एक स्वतंत्र संप्रभु राष्ट्र के रूप में एक नेता देश बनाने वाली, देश की जनता की चहेती पार्टी क्यों कमजोर होती चली गई। कुछेक राज्य छोड़ दें,जैसे केरल, कर्नाटक, राजस्थान, मध्य प्रदेश, तो कांग्रेस के राजनीतिक संगठन की जो स्थिति है वह जग जाहिर है। उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, गुजरात, और देश के सभी राज्यों में कांग्रेस एक सबसे बड़ी पार्टी के रूप में स्थापित थी और जनता का खूब प्यार और विश्वास मिलता था। वह कांग्रेस क्यों एक-एक करके हर जगह कमजोर होती गई? वे कौन सी राजनीतिक शक्तियां थीं, जिन्होंने लगातार कांग्रेस पर आक्रमण किए, गैर कांग्रेसवाद का परचम फैलाया, भाजपा आरएसएस किन कारणों से देश के लिए सबसे विनाशकारी पार्टी और सोच होते हुए भी देश भर में छाती चली गई, इस सबका कोई गंभीर विश्लेषण कांग्रेस के पास नहीं है। जब तक मर्ज के कारणों की सटीक पहचान न तब तक इलाज के नाम पर मरीज की छीछालेदर ही तो होती है।
यह मैं निराशाजनक स्थिति इसलिए नहीं कह रहा रहा कि मुझे कुछ सकारात्मक दिख नहीं रहा। आज भी देश की जनता की सोच में कांग्रेस विचार काफी गहराई से मौजूद है और देश को कांग्रेस से उम्मीदें हैं। इसका कारण यह है कि ये पार्टी महात्मा गांधी द्वारा खड़ी की गई पार्टी है, जिसमें नेहरू उनके सबसे विश्वस्त सिपहसालार और वारिस थे। यह गांधी-नेहरू विचार की पार्टी है और इसीलिए अभी तक चल रही है। आखिरकार इस पार्टी के आज सबसे बड़े नेता राहुल गांधी के नाम में भी गांधी लगा है। आरएसएस भाजपा के खिलाफ बोलने वाले और एक निडरता दिखाने वाले सबसे बड़े नेता भी वही हैं। संघर्ष की सबसे बड़ी मिसाल भी वही है। लेकिन वह अपनी राजनीति में गांधी नेहरू की राजनीतिक समझ और स्टाइल की परंपरा के कितने वाहक हैं यह आगे का वक्त ही बताएगा। क्या वह गांधी नेहरू विचार के सच्चे और पारदर्शी वाहक बनने के लिए सबसे उपयुक्त उपकरण हैं,यह भी आगे का वक्त ही बताएगा।
मैं भारत राष्ट्र के विचार और गांधी नेहरू के विचार को समानार्थी समझता हूं। कम से कम राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से। जिस दिन भारत नामक यह Indian State अपनी वैचारिकी में गांधी नेहरू से विमुख हो जाएगा यह देश टुकड़े-टुकड़े हो जाएगा।
एक बात यहां और कहना जरूरी है।
इस देश को औपनिवेशिक शासन ने दो राजनीतिक दांव उपहार में दिए। एक सांप्रदायिकता और दूसरी जातिवादी विभाजन की राजनीति। हिंदुस्तान की एकता को तोड़ने के लिए ये दो मुख्य औजार ब्रिटिश राज ने गढ़े। सांप्रदायिकता ने हिंदू मुस्लिम द्वेष और नफरत फैलाई जिससे देश का बंटवारा हुआ और आज आरएसएस भाजपा के रूप में एक सांप्रदायिक पार्टी शासन कर रही है जिसने देश को बर्बादी के रास्ते पर झोंक दिया है। वे यही कर ही सकते हैं। भाजपा आरएसएस की नीयत जो हो लेकिन नियति यही है कि ये भारत को बर्बाद करने के टूल भर हैं। देश के लोग इस कटु सत्य को थोड़ा बहुत महसूस भी करने लगे हैं लेकिन देश का कब सांप्रदायिकता की राजनीति से मोह भंग होगा और कहीं तब तक बहुत देर तो नहीं हो चुकी,ये भी आगे का वक्त बताएगा।
ब्रिटिश राज का दूसरा राजनीतिक उपहार जातिवाद की राजनीति का रहा। उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और राष्ट्रीय आंदोलन को कमजोर करने के लिए भारतीय समाज को जातियों में बांटकर दिखाया, लोगों में जातीय राजनीति की चेतनाएं डालीं, उन्हें समर्थन किया। वे देश को जातीय विभाजन की आग में भी झोंकना चाहते थे लेकिन गांधी ने उनके दांव फेल कर दिए। नेहरू भी राजनीति में जातिवाद की मिलावट के खतरे को समझते थे। कुल मिलाकर भारत में जातिवाद उस तरह से खतरनाक नहीं बन सका जैसा सांप्रदायिकता थी।लेकिन जातिवाद कब सांप्रदायिकता की तरह भारत की बर्बादी का एक टूल बन जाए, इसकी संभावना बनी हुई है।
खैर। जो सवाल था कि गांधी आज कहां हैं।
मुझे हिंदुस्तान के जनमानस में एक गांधी छिपा हुआ दिखता है। अपने दैनिक जीवन में, घर परिवार दोस्तों में, किसी अनजान की भी मदद के लिए उन्मुख होने में, एक दूसरे से सुख दुख में खड़े होने में, किसी का दर्द महसूस कर सकने में, गुस्से लड़ाई झगड़े की बजाय आपस में बात करके मुद्दों को सुलटा लेने में, गलती पर माफी मांग लेने में, उसूल के मुद्दे पर न झुकने में, 14 साल के भाजपा शासन के बाद भी आरएसएस भाजपा के झांसे में न आने में, जाति के आधार पर तमाम उकसावों के बाद भी एक दूसरे को मारने काटने न लग जाने में, मुसलमानों के खिलाफ सारी नफ़रतों के बावजूद सामाजिक मेल जोल और ताना बाना बनाए रखने की कोशिशों में - ये सब और भी दूसरी बातें इस बात का सबूत हैं कि गांधी हिंदुस्तानी सभ्यता और संस्कृति के एक सबसे शानदार नुमाइंदे के रूप में हिंदुस्तानी जनता के चित्त में अपनी जगह बनाए हुए हैं। और हां हिंदुस्तान की कुछ युवा पीढ़ी में भी गांधी एक सतत हाज़िरी हैं।
भले ही कांग्रेस सहित राजनीतिक दल गांधी की उपयोगिता को लेकर दो चित्ता हों और आरएसएस-भाजपा गांधी को जन मानस के चित्त से मिटाने पर आमादा हो लेकिन गांधी तो हैं और रहने वाले भी हैं। केवल हिंदुस्तान में नहीं, सारी दुनिया में एक आशा की किरण लिए जो कि मनुष्यता, अहिंसा और प्रेम की भाषा बोलती है और साथ ही समाज के खल से लड़ती है और हराती भी है।
(लेखक इतिहासकार और गांधीवादी कार्यकर्ता हैं)
FAQs
1. आज गांधी कहां हैं?
इस लेख के अनुसार गांधी आज किसी राजनीतिक संस्था में नहीं, बल्कि भारतीय समाज के उन व्यवहारों में दिखाई देते हैं जहां लोग एक-दूसरे की मदद करते हैं, संवाद से विवाद सुलझाते हैं, मानवीय पीड़ा को समझते हैं और अन्याय के सामने सिद्धांतों से समझौता नहीं करते।
2. क्या गांधी आज भी भारतीय राजनीति में प्रासंगिक हैं?
गांधी के विचार भारतीय राजनीति में राष्ट्रवाद, अहिंसा, सामाजिक एकता, धर्मनिरपेक्षता और जनभागीदारी जैसे प्रश्नों के संदर्भ में आज भी चर्चा का विषय हैं। गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस एक व्यापक जन-आंदोलन में परिवर्तित हुई थी।
3. गांधी और कांग्रेस का क्या संबंध था?
महात्मा गांधी ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को व्यापक जनाधार वाले स्वतंत्रता आंदोलन के रूप में विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जवाहरलाल नेहरू ने भी गांधी के नेतृत्व को कांग्रेस के जन-आधार के विस्तार से जोड़ा है।
4. गांधी और नेहरू के विचारों में क्या संबंध था?
गांधी और नेहरू के बीच कई मुद्दों पर वैचारिक मतभेद थे, लेकिन स्वतंत्रता आंदोलन और कांग्रेस के भीतर दोनों का महत्वपूर्ण राजनीतिक संबंध था। नेहरू के अभिलेखों में गांधी के साथ उनके निरंतर राजनीतिक संवाद के अनेक प्रमाण मिलते हैं।
5. गांधी की राजनीति का मूल आधार क्या था?
गांधी की राजनीति में अहिंसा, सत्याग्रह, जनभागीदारी, नैतिक राजनीति और सामाजिक सुधार महत्वपूर्ण तत्व थे। कांग्रेस के गांधी-कालीन स्वरूप का वर्णन करते हुए नेहरू ने शांतिपूर्ण राजनीतिक कार्रवाई और व्यापक जनसंगठन को विशेष महत्व दिया था।
6. क्या गांधी केवल कांग्रेस की विरासत हैं?
ऐतिहासिक रूप से गांधी का कांग्रेस और राष्ट्रीय आंदोलन से गहरा संबंध रहा, लेकिन उनकी विरासत को केवल किसी एक राजनीतिक संगठन तक सीमित नहीं किया जा सकता। अहिंसा, सत्याग्रह और सामाजिक न्याय से जुड़े उनके विचार भारत और विश्व में व्यापक रूप से प्रभावशाली रहे हैं।
7. गांधी आज के भारत में क्यों महत्वपूर्ण हैं?
सांप्रदायिक तनाव, सामाजिक विभाजन, असमानता और राजनीतिक ध्रुवीकरण के बीच गांधी के अहिंसा, संवाद, सह-अस्तित्व और मानवीय गरिमा से जुड़े विचार समकालीन बहसों में प्रासंगिक बने हुए हैं।
8. क्या गांधी जाति व्यवस्था के समर्थक थे?
गांधी के जाति और वर्ण संबंधी विचार समय के साथ बदले और उनके विचारों में महत्वपूर्ण जटिलताएं थीं। इसलिए उन्हें केवल एक सरल समर्थक या विरोधी के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय उनके विभिन्न कालखंडों के लेखन और वक्तव्यों के संदर्भ में समझना अधिक उचित है। गांधी के संकलित लेखन में जाति और वर्ण पर उनके विचारों के विभिन्न रूप मिलते हैं।
9. गांधी की सबसे बड़ी राजनीतिक विरासत क्या है?
इस लेख के संदर्भ में गांधी की सबसे महत्वपूर्ण विरासत राजनीति को केवल सत्ता प्राप्ति का माध्यम न मानकर जनभागीदारी, नैतिकता, अहिंसा और सामाजिक संबंधों से जोड़ने की दृष्टि है।
10. क्या गांधी केवल भारत के नेता थे?
नहीं। गांधी की अहिंसा और सत्याग्रह की अवधारणाओं का प्रभाव भारत से बाहर भी पड़ा। उनका राजनीतिक और नैतिक चिंतन विश्वभर में नागरिक अधिकारों और अहिंसक आंदोलनों की चर्चाओं का हिस्सा बना।