बांग्लादेश के 55 साल: मुक्ति संग्राम से सत्ता संघर्ष तक—इतिहास, तख्तापलट और भू-राजनीति का विश्लेषण

1971 में शेख मुजीबुर्रहमान के नेतृत्व में बने बांग्लादेश के 55 वर्षों का विश्लेषण—नरसंहार, तख्तापलट और वैश्विक राजनीति…

Update: 2026-03-27 16:52 GMT

1971: मुक्ति संग्राम और नए राष्ट्र का जन्म

  • नरसंहार और मानवाधिकार संकट
  • भारत की भूमिका और क्षेत्रीय प्रभाव
  • 1975 का तख्तापलट: लोकतंत्र से सैन्य शासन तक
  • आपातकाल और भारत की आंतरिक राजनीति
  • सत्ता का चक्र: ज़िया, खालिदा और हसीना का दौर
  • 2024 के बाद का परिदृश्य: सत्ता परिवर्तन और वैश्विक हस्तक्षेप
  • सांप्रदायिक राजनीति और समाज पर प्रभाव

इतिहास की विडंबनाएँ और भविष्य की दिशा

1971 में शेख मुजीबुर्रहमान के नेतृत्व में बने बांग्लादेश के 55 वर्षों का विश्लेषण—नरसंहार, तख्तापलट और वैश्विक राजनीति…

साथियों, आज से 55 साल पहले 26 मार्च 1971 को शेख मुजीबुर्रहमान ने पाकिस्तान से अलग होकर बांग्लादेश के निर्माण की घोषणा की थी। उसके बाद नौ महीनों के संघर्ष के दौरान, पाकिस्तानी सेना ने, बांग्लादेश की जमात-ए-इस्लामी की मदद से, जो पाकिस्तान के साथ थी, भयानक कत्लेआम किया और महिलाओं के साथ बलात्कार किए। इस दौरान तीन लाख से 30 लाख के बीच लोग मारे गए और 4 लाख से अधिक महिलाओं के साथ बलात्कार हुए। अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) ने भी इन घटनाओं पर संज्ञान लिया और इसे इतिहास के सबसे भीषण युद्ध अपराधों में से एक बताया।

इसके पांच साल के भीतर ही, 15 अगस्त 1975 को, भारत में आपातकाल की घोषणा के पचास दिनों के भीतर, बांग्लादेश में तख्तापलट हो गया। इसमें सेना के किसी उच्च पदस्थ अधिकारी ने चालाकी से भाग नहीं लिया, बल्कि पांच युवा अधिकारी, मुख्य सूत्रधार कर्नल फारूक और मेजर डालिम, और उनके साथ तीन अन्य मेजर रशीद, शाहरियार और पाशा शामिल थे। इस विद्रोह के कारण श्रीमती इंदिरा गांधी और उनके समर्थक, जिनमें श्रीपाद अमृत डांगे के "अंधभक्त" कुमार केतकर जैसे लोग शामिल थे, ने गैर-जिम्मेदाराना प्रचार किया। उन्होंने दावा किया कि जयप्रकाश नारायण (जेपी) के नेतृत्व में आंदोलन करने वाले लोग इंदिरा गांधी और उनके परिवार को उसी तरह मारने की योजना बना रहे थे। इसका उपयोग जेपी और उनके सहयोगियों को आपातकाल की सेंसरशिप की आड़ में जेल में डालने के लिए किया गया। आज भी ये लोग कभी-कभी जेपी पर इसी तरह के आरोप लगाते हैं।

अंधभक्ति का ठेका सिर्फ आरएसएस के पास नहीं है; यह हर जगह मौजूद है। वास्तविकता यह है कि बांग्लादेश के निर्माण के दौरान इंदिरा गांधी ने जेपी को पूरी दुनिया में भारत का पक्ष रखने की जिम्मेदारी सौंपी थी और उन्हें भारत सरकार के दूत के रूप में विश्व भ्रमण की व्यवस्था कराई थी। उसी जयप्रकाश नारायण के ऊपर ही इंदिरा गांधी को और उनके परिवार को मारने की साजिश का इंदिरा गांधी को पता चल गया था, इसलिए उन्होंने आपातकाल की घोषणा की है, यह अफवाह आपातकाल और सेंसरशिप के समर्थन में डांगेवादी कम्युनिस्ट और उनके अंधभक्त कर रहे थे.

मैं यह बात इसलिए लिख रहा हूँ, क्योंकि आपातकाल के दौरान, अक्टूबर 1976 के पहले सप्ताह में, जब मैं भूमिगत था, पुलिस ने अचानक अमरावती के सर्वोदय कार्यालय पर छापा मारा और मुझे गिरफ्तार कर लिया। मुझे राजापेठ पुलिस थाने में पंद्रह दिनों तक हथकड़ी लगाकर रखा गया। बीच-बीच में अनजान लोगों को मेरी कोठरी के सामने लाकर झूठी पुष्टि करवाई जाती थी कि "क्या यह वही आदमी है?"

मुझे तभी संदेह हो गया था कि वे मुझे किसी झूठे मामले में फंसाने की कोशिश कर रहे हैं। मुझे देर रात में नींद से उठाकर पूछताछ के लिए जगाया जाता और बार-बार पूछा जाता, "इंदिरा गांधी की हत्या की साजिश में तुम्हारे साथ और कौन - कौन लोग शामिल है?"

एक बार तो मेरी कनपटी पर पिस्तौल रखकर मुझसे पहले से लिखे हुए कबूलनामे पर हस्ताक्षर करने की धमकी दी गई। मैंने शांति से जवाब दिया, "अगर इस झूठे कबूलनामे पर दस्तखत करने के बाद मुझे फांसी ही दी जानी है, तो आप अभी गोली मार सकते हैं। लेकिन मैं आपके लिखे झूठे कबुलनामे पर दस्तखत नहीं करूँगा।"

इस अनुभव के बाद, मैं हैरान होता हूँ कि इंदिरा गांधी परिवार की हत्या की साजिश रचने के आरोपों में कितनी सच्चाई रही होगी।

पुलिस ने कोर्ट में यह साबित करने के लिए कि मैं भारत सरकार को उखाड़ फेंकने की "गुप्त साजिश" का हिस्सा था, मेरे पास से साधना, दिनमान, तरुण मन और धर्मयुग जैसी पत्रिकाओं की प्रतियां और "हर जोर जुल्म की टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है" और "सिंहासन खाली करो कि जनता आती है" जैसे नारों वाले बैनर जब्त किए थे।

आपातकाल के दौरान भी अदालतें कुछ साहसिक और संवैधानिक निर्णय ले रही थीं। अदालत ने मेरे खिलाफ सभी आरोपों को खारिज कर दिया और पुलिस को फटकार लगाते हुए कहा, "अगर ऐसे साहित्य से सरकारें नष्ट हो जातीं, तो आपातकाल से पहले ही वे कई बार नष्ट हो चुकी होतीं।"

मुझे बस इस बात पर आश्चर्य होता है कि कुमार केतकर जैसे जिम्मेदार पत्रकार आज भी ऐसे गैर-जिम्मेदाराना बयान क्यों देते रहते हैं।

बांग्लादेश के जन्म के पांच साल बाद ही सेना के कुछ तत्वों ने विद्रोह किया और बंगबंधु शेख मुजीबुर्रहमान और उनके परिवार के अधिकांश सदस्यों की हत्या कर दी। सेना ने सत्ता हथिया ली और बाद में जनरल इरशाद ने कमान संभाली। उनके बाद जनरल जियाउर्रहमान सत्ता में थे। उनकी मृत्यु के बाद उनकी पत्नी बेगम खालिदा जिया तीन बार प्रधानमंत्री रहीं (1991 से 2006 के बीच, कुल मिलाकर कम से कम दस साल)। और आज उनके सुपुत्र को प्रधानमंत्री बनाया गया है, जो बारह साल से ज्यादा समय अमेरिका में थे.

विदेश से लौटने के बाद, शेख हसीना वाजेद ने जून 1996 से 2001 तक और फिर जनवरी 2009 से 5 अगस्त 2024 तक, कुल बीस वर्षों तक प्रधानमंत्री के रूप में कार्य किया। हालांकि, 5 अगस्त 2024 को उन्हें "जेन-जी" (Gen-Z) आंदोलन के नाम पर हुए उत्पात के कारण पद छोड़ना पड़ा। मेरी राय में, यह बंगाल की खाड़ी में अमेरिकी नौसैनिक अड्डा बनाने की अनुमति न देने की कीमत थी।

मेरा मानना है कि अमेरिका ने बांग्लादेश में "सत्ता परिवर्तन" (Regime Change) के लिए एक साजिश रची और शेख हसीना को हटाने के लिए छात्र आंदोलन को सामने रखा, ताकि अपनी पसंद की खालिदा जिया को स्थापित कर नौसैनिक अड्डे का रास्ता साफ किया जा सके। लेकिन उनकी मृत्यु होने के अंदेशा देखते हुए अमेरिका में बारह साल से अधिक समय से रह रहे उनके सुपुत्र को खास बंगला देश की बागडोर सम्हालने के लिए भेजा गया है.

यह कितनी बड़ी विडंबना है कि जिस जमात-ए-इस्लामी ने धर्म के आधार पर बांग्लादेश के निर्माण का विरोध किया था, और 1971 में पाकिस्तानी सेना के साथ मिलकर मानवता के खिलाफ अपराध किए थे, वह आज भी वहां मौजूद है। किसकी मदद से? इसी समूह ने शेख हसीना को सत्ता से बाहर करने के लिए युवाओं का इस्तेमाल किया। वह वर्तमान में भारत में राजनीतिक शरण ले रही हैं। और मैं इसके लिए नरेंद्र मोदी सरकार का अभिनंदन करता हूँ कि उन्होंने उदारता दिखाते हुए उन्हें आश्रय दिया है।

आजादी के 55 साल बाद जमात-ए-इस्लामी जैसे सांप्रदायिक संगठनों का यह वर्चस्व दुनिया भर के धर्मनिरपेक्ष लोगों के लिए एक गंभीर प्रश्न है। भारत में आरएसएस के साथ भी यही पैटर्न है; स्वतंत्रता संग्राम में शामिल होने के बजाय वे ब्रिटिश पुलिस की मदद कर रहे थे, फिर भी आज वे भारत पर शासन कर रहे हैं। पिछले बारह वर्षों से हम सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का "नग्न नाच" देख रहे हैं। इसीलिए मैं हमेशा कहता और लिखता हूँ कि भारतीय जमात-ए-इस्लामी भारतीय मुसलमानों की आरएसएस है, और आरएसएस हिंदुत्ववादी भारतीयों की जमात है।

पड़ोसी पाकिस्तान और बांग्लादेश में सत्ता का परिवर्तन दुखद है। अब भारत के लगभग सभी पड़ोसी देश—पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, म्यांमार—अमेरिकी समर्थक सैन्य हितों के प्रभाव में हैं। इस बीच, भारत की वर्तमान राष्ट्रवादी सरकार स्वयं अमेरिकी खेमे में घुसने की कोशिश कर रही है। यह ईरान के साथ सात हजार साल पुरानी दोस्ती को छोड़कर अमेरिका-इजराइल के रुख का समर्थन करने वाले व्यवहार से स्पष्ट होता है।

2015 में मुझे एशियाई सामाजिक मंच (Asian Social Forum) के लिए ढाका जाने का मौका मिला। वहां मैंने हिंदुओं की स्थिति समझने के लिए धनमंडी इलाके का दौरा किया। वहां बड़ी संख्या में हिंदू रहते हैं। मैंने रामकृष्ण मिशन और ढाकेश्वरी देवी मंदिर के दर्शन किए। चटर्जी, बनर्जी, गांगुली, घोष और दास जैसे नाम की नेमप्लेट धनमंडी इलाकों के घरों के गेट पर देखकर मुझे वहां हिंदू समाज की प्रमुखता का एहसास हुआ।

मैं बांग्लादेश हिंदू संगठन के पदाधिकारियों से मिला, जिनमें अधिकांश वकील, बैरिस्टर और सरकारी अधिकारी थे। उन्होंने मुझसे स्पष्ट कहा, "जब तक शेख हसीना वाजेद सत्ता में हैं, हम बहुत सुरक्षित महसूस करते हैं। हमारे लोग सरकार, न्यायपालिका, पुलिस और प्रशासन में उच्च पदों पर हैं।"

जिन्ना और सावरकर के "द्वि-राष्ट्र सिद्धांत" की विफलता (जो मात्र 25 वर्षों में ही उर्दू थोपने और संवैधानिक अधिकारों के हनन के कारण उजागर हो गई थी) के बाद बांग्लादेश के निर्माण को आज 55 वर्ष हो गए हैं। हालांकि अभी खालिदा जिया की पार्टी के पास बहुमत हो सकता है, लेकिन जमात-ए-इस्लामी को पहले से कहीं अधिक वोट मिलना अच्छा संकेत नहीं है।

अगर बांग्लादेश इस्लामी सांप्रदायिक ताकतों के नियंत्रण में आ जाए तो मुझे आश्चर्य नहीं होगा, क्योंकि इस बारे में काफी जानकारी उपलब्ध है कि कैसे सीआईए पाकिस्तानी जमात-ए-इस्लामी की मदद करती है। और अल - कायदा तालिबानी संगठनों के निर्माण में सीआईए की भूमिका ओपन सीक्रेट हैं.

इतिहास की विडंबना देखिए: जिस ढाका में अंग्रेजों ने 1906 में मुस्लिम लीग की स्थापना ढाका के नवाब के अगुवाई में करवाई थी, उसी ढाका में 1949 में शहीद सुहरावर्दी और मौलाना भासानी ने अलग होकर अवामी मुस्लिम लीग बनाई। यह पाकिस्तानी इस्लामी धार्मिक परियोजना की विफलता की शुरुआत थी।

शेख मुजीबुर्रहमान ने, जिनका जन्म 1920 में हुआ था, सुहरावर्दी की मृत्यु के बाद नेतृत्व संभाला। उन्होंने लोकतंत्र और स्वायत्तता के लिए बड़ा आंदोलन किया। इसके जवाब में पाकिस्तानी सेना और जमात-ए-इस्लामी ने बंगाल की सांस्कृतिक और बौद्धिक पीढ़ी को खत्म करने की कोशिश की।

1970 में अवामी लीग ने बहुमत जीता, लेकिन सत्ता देने से इनकार कर दिया गया। मुजीब को जेल भेज दिया गया। 26 मार्च 1971 को उन्होंने स्वतंत्रता की घोषणा की। भारत को हस्तक्षेप करना पड़ा क्योंकि करोड़ों शरणार्थी भारत आ गए थे।

10 जनवरी 1972 को मुजीब ने इंदिरा गांधी की उपस्थिति में प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। दुखद रूप से, 15 अगस्त 1975 को सैनिकों ने उनके आवास में घुसकर उनकी, उनकी पत्नी और तीन बेटों की नृशंस हत्या कर दी। उनकी बेटियां हसीना और रेहाना केवल इसलिए बच गईं, क्योंकि वे उस समय विदेश में थीं।

जब मैं 2015 में बांग्लादेशी हिंदू नेताओं से ढाका के धनमंडी के ढाकेश्वरी मंदिर के कार्यालय में मिला था, तो उन्होंने हाथ जोड़कर मुझसे कहा था: "जब आप भारत लौटें, तो वहां के हिंदुत्ववादी संगठनों से कहें कि जब भी वे भारत में मुसलमानों को परेशान करते हैं (भागलपुर, बाबरी मस्जिद, मुजफ्फरनगर और गुजरात का जिक्र करते हुए), तो यहां के कट्टरपंथी मुसलमान जवाबी कार्रवाई में हम पर हमला करते हैं। अगर भारत में मुसलमानों को सम्मान से जीने दिया जाए, तो हम भी यहां शांति से रह सकेंगे।"

आश्चर्य की बात यह है कि मेरी बंगला देश से वापसी के बाद, नागपुर के हेडगेवार विचार मंच (आरएसएस से जुड़ा) ने मुझे अपने अनुभव साझा करने के लिए आमंत्रित किया। वहां 1971 के युद्ध में भाग लेने वाले सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी मौजूद थे। मैंने वहां पूरी रिपोर्ट पेश की और बांग्लादेशी हिंदुओं का वह संदेश दिया। मैंने उनसे कहा, "मैंने आपका निमंत्रण विशेष रूप से यह संदेश देने के लिए ही स्वीकार किया है।"

वहां उपस्थित किसी भी अधिकारी या आरएसएस पदाधिकारी ने एक शब्द भी नहीं पूछा। उन्होंने बस मुझे धन्यवाद दिया और विदा कर दिया।

मैं यह महसूस करते हुए घर लौटा कि हिंदुओं की रक्षा का इन संगठनों का दावा कितना खोखला और हृदयहीन है।

'जोय बांग्ला'

डॉ. सुरेश खैरनार,

26 मार्च 2026, नागपुर।

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