मोहन भागवत न्यूयॉर्क में 'Universal Oneness Celebration' क्यों कर रहे हैं? RSS के इतिहास, हिंदुत्व और लोकतंत्र पर गंभीर सवाल

मोहन भागवत न्यूयॉर्क में Universal Oneness Celebration क्यों कर रहे हैं? RSS के इतिहास, हिंदुत्व, लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और वैश्विक राजनीति पर गंभीर सवालों की पड़ताल।;

Update: 2026-08-27 17:50 GMT

Mohan Bhagwat

क्या 'विश्व एकता' के संदेश और RSS के वैचारिक इतिहास के बीच कोई विरोधाभास है?

  • मोहन भागवत का न्यूयॉर्क कार्यक्रम: 'विश्व एकता' या RSS के हिंदुत्व प्रोजेक्ट का वैश्विक विस्तार?
  • Madison Square Garden में मोहन भागवत: RSS के इतिहास और हिंदुत्व की राजनीति पर बड़े सवाल
  • RSS प्रमुख मोहन भागवत न्यूयॉर्क में: 'Universal Oneness' के पीछे क्या है हिंदुत्व का वैश्विक एजेंडा?
  • न्यूयॉर्क में RSS का शक्ति प्रदर्शन? मोहन भागवत, हिंदुत्व और वैश्विक राजनीति की पड़ताल

मोहन भागवत के न्यूयॉर्क दौरे और 29 अगस्त 2026 को Madison Square Garden में प्रस्तावित 'Universal Oneness Celebration' को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक और वैचारिक बहस तेज है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत न्यूयॉर्क में भारतीय-अमेरिकी समुदाय के एक बड़े कार्यक्रम को संबोधित करेंगे। इसके बाद उनके कनाडा और ब्रिटेन के कार्यक्रमों को लेकर भी चर्चा है।

लेकिन इस यात्रा के साथ एक बुनियादी प्रश्न जुड़ा हुआ है कि -

क्या RSS द्वारा प्रस्तुत 'विश्व एकता' (Universal Oneness) का संदेश उसके ऐतिहासिक वैचारिक दस्तावेजों, हिंदुत्व की राजनीति और लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, जाति तथा अल्पसंख्यक अधिकारों पर उठती आलोचनाओं के अनुरूप है?

इस विशेष विश्लेषण में लेखक और सामाजिक-राजनीतिक चिंतक शम्सुल इस्लाम दस्तावेजों, उद्धरणों और ऐतिहासिक संदर्भों के आधार पर RSS की विचारधारा से जुड़े गंभीर आरोपों और आलोचनाओं की समीक्षा कर रहे हैं।

लेख में चर्चा के प्रमुख विषय:

  • मोहन भागवत का न्यूयॉर्क दौरा क्यों महत्वपूर्ण है?
  • Madison Square Garden में 'Universal Oneness Celebration' का राजनीतिक और सामाजिक संदर्भ क्या है?
  • RSS और हिंदुत्व की वैश्विक राजनीति को कैसे समझा जाए?
  • वी.डी. सावरकर और एम.एस. गोलवलकर के विचारों पर विवाद क्यों रहा है?
  • We or Our Nationhood Defined और Bunch of Thoughts में व्यक्त विचारों पर आलोचनाएँ क्या हैं?
  • RSS, राष्ट्रवाद और धार्मिक अल्पसंख्यकों के प्रश्न पर ऐतिहासिक बहस।
  • हिंदुत्व, जाति व्यवस्था और मनुस्मृति के प्रश्न।
  • दलितों और महिलाओं के अधिकारों को लेकर RSS की विचारधारा पर आलोचनाएं।
  • लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्ष भारत के विचार के साथ हिंदू राष्ट्र की अवधारणा का टकराव।
  • अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन में हिंदुत्व संगठनों की बढ़ती राजनीतिक सक्रियता।
  • भारतीय प्रवासी समुदाय और धार्मिक पहचान की राजनीति।
  • नव-फासीवाद (Neo-Fascism), धार्मिक राष्ट्रवाद और वैश्विक दक्षिणपंथ की बहस।

यह प्रस्तुति RSS के समर्थकों और आलोचकों के बीच चल रही व्यापक वैचारिक बहस के संदर्भ में ऐतिहासिक दस्तावेजों और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध स्रोतों पर आधारित प्रश्न उठाती है। गंभीर आरोपों और ऐतिहासिक दावों को स्वतंत्र स्रोतों, मूल दस्तावेजों और संबंधित संगठनों के आधिकारिक पक्ष के साथ पढ़ना और सत्यापित करना आवश्यक है।

महत्वपूर्ण सवाल

  • मोहन भागवत न्यूयॉर्क क्यों गए हैं?
  • क्या Universal Oneness Celebration केवल धार्मिक-सांस्कृतिक कार्यक्रम है या इसका राजनीतिक संदर्भ भी है?
  • क्या RSS की वर्तमान वैश्विक छवि और उसके ऐतिहासिक वैचारिक दस्तावेजों के बीच विरोधाभास मौजूद है?
  • अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन में हिंदुत्व की राजनीति का विस्तार भारतीय लोकतंत्र और प्रवासी समुदायों के लिए क्या अर्थ रखता है?

प्रोफेसर शमसुल इस्लाम का यह विश्लेषण इन्हीं प्रश्नों की पड़ताल करता है.... यह लेख कॉपीराइट फ्री है, हस्तक्षेप को लिंक के साथ क्रेडिट देंगे तो खुशी होगी...

आरएसएस प्रमुख, मोहन भागवत न्यूयॉर्क में 'यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेशन' (विश्व एकता उत्सव) का नेतृत्व करेंगे!

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत 29 अगस्त, 2026 को न्यूयॉर्क शहर के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में 5,000 से ज़्यादा भारतीय-अमेरिकियों को संबोधित करेंगे। अमेरिका में लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और समतावादी मूल्यों के जाने-माने पैरोकार और मशहूर पत्रकार, पीटर फ़्रेडरिक ने सही याद दिलाया है कि 1939 में नाज़ियों ने 'अमेरिकीपन’ के नाम पर इसी मैडिसन स्क्वायर गार्डन को खचाखच भर दिया था। 29 अगस्त को, दुनिया के सबसे बड़े आतंकी संगठन आरएसएस के 'शताब्दी वैश्विक जनसम्पर्क' कार्यक्रम के तहत, 'यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेशन' के नाम से उसी मैदान को भरा जाएगा। इसके बाद भागवत कनाडा और इंग्लैंड में भी हिंदुत्व पर प्रवचन देंगे।

न्यूयॉर्क शहर के लिए यह एक दुखद दिन होगा कि एक ऐसे संगठन को बिना किसी सवाल-जवाब के अपनी बात रखने की इजाज़त दी जाए, जो लोकतंत्र, मानवतावाद, समानता, बहु-संस्कृतिवाद, हिंदू धर्म के भीतर समानता और विश्व शांति का पुरज़ोर विरोध करता है।

आरएसएस दुनिया के लिए सबसे बड़ा ख़तरा है, यह बात आलोचक नहीं, बल्कि खुद उसके अपने आधिकारिक रिकॉर्ड बताते। सैकड़ों सबूतों में से, आरएसएस के आर्काइव और आधिकारिक गतिविधियों के रिकॉर्ड में से कुछ अहम तथ्य 3 हिस्सों में पेश हैं:

1. मानवता-विरोधी

2. हिंदू-विरोधी

3. लोकतांत्रिक-धर्मनिरपेक्ष भारत-विरोधी

1. इंसानियत-विरोधी

आरएसएस : दुनिया पर हिंदुओं राज करेंगे

यह खतरनाक संगठन दुनिया भर में 'हिंदुओं' का दबदबा कायम करने के लिए दिन-रात काम कर रहा है। इसके दो सबसे अहम विचारक, विनायक दामोदर सावरकर (1883-1966) और माधव सदाशिव गोलवलकर (1906-1973) - जिन्हें आरएसएस पूरी निष्ठा से मानता है, ने 20वीं सदी की शुरुआत में ही यह योजना तैयार कर ली थी। सावरकर ने अपनी कट्टरपंथी किताब 'हिंदुत्व' (1923) का समापन इस चेतावनी के साथ किया था:

“22 करोड़ लोग [उस समय भारत की आबादी], जिनका आधार भारत है, जो इसे अपनी पितृभूमि और पवित्र भूमि मानते हैं, जिनका इतिहास इतना गौरवशाली है, जो एक ही खून और एक ही संस्कृति के बंधन से बंधे हैं, वे पूरी दुनिया को अपनी शर्तें मनवा सकते हैं। एक दिन ऐसा आएगा जब इंसानियत को इस ताकत का सामना करना पड़ेगा।

[सावरकर, हिंदुत्व, वी के केलकर, पूना, 1923, पेज 128]

गोलवलकर, जिनकी देखरेख में मोहन भागवत और प्रधान मंत्री मोदी आरएसएस के बड़े नेता बने, उन्होंने अपनी विवादित किताब 'वी ऑर अवर नेशनहुड डिफाइंड' (1939) में हिंदुओं की ओर से दुनिया को यही चेतावनी इन शब्दों में दी थी:

“जाति-चेतना जाग रही है। शेर मरा नहीं था, बस सो रहा था। वह फिर से जाग रहा है और दुनिया देखेगी कि कैसे पुनर्जीवित हिंदू राष्ट्र अपनी ताकतवर भुजाओं से दुश्मन की सेनाओं को कुचल देता है। वह सितारा उदय हो चुका है और लगातार आसमान में ऊपर चढ़ रहा है। जल्द ही दुनिया इसे देखेगी और या तो डर से कांप उठेगी या खुशी से झूम उठेगी... और जब जाति-चेतना पुकारती है और राष्ट्रीय चेतना की ज्वाला भड़कती है, तो हम हिंदू अपने हिंदू ध्वज—भगवा ध्वज—के नीचे एकजुट होते हैं और विरोधी ताकतों को खत्म करने के पक्के इरादे के साथ डट जाते हैं।”

[Golwalkar, MS, We or Our Nationhood Defines, Bharat Publications, Nagpur, 1939, pp. 12-13]

धार्मिक आधार पर दुनिया भर में भारतीय समुदाय का बंटवारा

हैरानी की बात है कि भागवत ‘विश्व एकता' का उपदेश देंगे, जबकि उनके संगठन ने विश्व में बसे भारतीय समुदाय (जिसमें हिंदू, सिख, मुस्लिम, जैन, बौद्ध, पारसी, एनिमिस्ट और किसी भी धर्म को न मानने वाले लोग शामिल हैं) के बीच खतरनाक दरार पैदा कर दी है। इसके अंतरराष्ट्रीय विंग का नाम 'हिंदू स्वयंसेवक संघ' है, जिससे पता चलता है कि उन्हें भारतीय मूल के उन लोगों की कोई परवाह नहीं है जो हिंदू नहीं हैं। भारत-विरोधी इस रवैये ने अमेरिका और अन्य देशों में, जहां आरएसएस सक्रिय है, भारतीय समुदाय के बीच गहरे धार्मिक मतभेद पैदा कर दिए हैं। विदेशों में केवल हिंदुओं को संगठित करने की आरएसएस की योजना के कारण धर्म के आधार पर गंभीर दरारें पड़ रही हैं, जिससे दुनिया के कई शहरों में भारतीय समुदाय के बीच हिंसा हो रही है। असल में, आरएसएस की इस बेवकूफी भरी हरकत से भारतीय समुदाय के दूसरे धर्मों के मानने वालों को यह बढ़ावा मिलता है कि वे भारतीयता से नाता तोड़ लें और धार्मिक आधार पर खुद को संगठित करें।

आरएसएस ने होलोकॉस्ट (यहूदियों का हिटलर और मुससोलिनी द्वारा जनसंहार 1933-45) पर जश्न मनाया और भारतीय मुसलमानों और ईसाइयों को खत्म करने के लिए इसे अंजाम देने की योजना बनाई

आरएसएस के सबसे प्रमुख विचारक, गोलवलकर (जिन्हें आरएसएस में 'गुरु गोलवलकर' के नाम से जाना जाता है), जो 1940 में आरएसएस प्रमुख बने और जिन्हें प्रधानमंत्री मोदी ख़ुद को एक राजनीतिक नेता के तौर पर परवान चढ़ाने का श्रेय देते हैं, ने एक सवाल उठाया :

"अगर यह बात बिना किसी शक के साबित हो चुकी है कि हिंदुस्तान हिंदुओं की ज़मीन है और यह हिंदू राष्ट्र के फलने-फूलने के लिए ही बनी है, तो उन सभी लोगों का क्या होगा जो आज इस ज़मीन पर तो रहते हैं, लेकिन हिंदू नस्ल, धर्म और संस्कृति से ताल्लुक नहीं रखते?"

[Golwalkar, MS, We Or Our Nationhood Defined, Nagpur, 1939, p. 45.]

उन्हों ने ख़ुद ही जवाब दिया कि उन के साथ वही किया जाएगा, जो हिटलर और मुसोलिनी के राज में यहूदियों के साथ किया गया था। इसी संदर्भ में, गोलवलकर ने यहूदियों के जनसंहार की इन शब्दों में तारीफ़ की:

"जर्मन नस्ल का गर्व आजकल चर्चा का विषय बन गया है। अपनी नस्ल और संस्कृति की शुद्धता बनाए रखने के लिए, जर्मनी ने सेमिटिक नस्लों, यानी यहूदियों, को देश से बाहर निकालकर दुनिया को चौंका दिया। यहाँ नस्लीय गर्व अपने चरम पर दिखाई दिया। जर्मनी ने यह भी दिखाया है कि जिन नस्लों और संस्कृतियों में बुनियादी अंतर हों, उन्हें एक साथ मिलाकर एक इकाई बनाना लगभग असंभव है; यह हिंदुस्तान के लिए एक अच्छा सबक है जिससे हम सीख सकते हैं और फ़ायदा उठा सकते हैं।" [वही – पृष्ठ 34-35]

आख़िरकार, हिटलर के नक्शेकदम पर चलते हुए, गोलवलकर ने भारत में मुसलमान और ईसाई (जिन्हें विदेशी नस्ल का घोषित कर दिया गया था) की "समस्या" के निवारण के लिए ये रास्ता सुझाया :

"समझदार और पुरानी सभ्यताओं के अनुभव के आधार पर, हिंदुस्तान में रहने वाली विदेशी नस्लों को या तो हिंदू संस्कृति और भाषा अपनानी होगी, हिंदू धर्म का सम्मान और आदर करना होगा, हिंदू नस्ल और संस्कृति यानी हिंदू राष्ट्र की महिमा के अलावा कोई और विचार नहीं रखना होगा और हिंदू नस्ल में घुल-मिलकर अपनी अलग पहचान छोड़नी होगी; या फिर उन्हें हिंदू राष्ट्र के पूरी तरह अधीन रहकर देश में रहना होगा, जहाँ वे किसी चीज़ का दावा नहीं कर सकते, किसी विशेषाधिकार या खास बर्ताव के हकदार नहीं होंगे, यहाँ तक कि उन्हें नागरिक अधिकार भी नहीं मिलेंगे। उनके पास अपनाने के लिए कोई दूसरा रास्ता नहीं है, या कम से कम नहीं होना चाहिए। हम एक पुरानी सभ्यता हैं: आइए, हम उन विदेशी नस्लों के साथ वैसा ही व्यवहार करें जैसा पुरानी सभ्यताओं को करना चाहिए और करती हैं, जिन्होंने हमारे देश में रहने का फ़ैसला किया है।" [वही, पृष्ठ 47-48]

आरएसएस ने भारत में 'आर्यन' बच्चे पैदा करने का नस्लवादी प्रोजेक्ट शुरू किया

आरएसएस के अनुसार, नाज़ीवाद का पालन न केवल मुसलमानों और ईसाइयों को खत्म करने के लिए किया जाना चाहिए, बल्कि 'आर्यन' बच्चे पैदा करने के लिए भी किया जाना चाहिए, जैसा कि हिटलर के समय जर्मनी में हुआ था। आरएसएस ने आधिकारिक तौर पर जानकारी दी है कि उसकी एक शाखा, 'गर्भ विज्ञान संस्कार', वैदिक शिक्षाओं और जर्मनी में हुए प्रयोगों का पालन करते हुए, भारत के कई हिस्सों में 'गोरे', 'लंबे' और 'मनचाहे' (कस्टमाइज़्ड) बेहतरीन बच्चे पैदा करने के लिए लाइव ट्रायल कर रही है। इस प्रोजेक्ट का हिस्सा रहे आरएसएस के एक और संगठन 'आरोग्य भारती' (स्वास्थ्य शाखा) के संयोजक डॉ. हितेश जानी के अनुसार,

"माता-पिता के बच्चे अक्सर छोटे और सांवले रंग के होते हैं क्योंकि वे अशुद्ध होते हैं, लेकिन अच्छी बात यह है कि शुद्धिकरण एक आसान और तय नियमों (प्रोटोकॉल) वाली प्रक्रिया है जो चंद्र कैलेंडर से जुड़ी है। होने वाले माता-पिता को ज्योतिषीय समय-सारणी के अनुसार संबंध बनाना चाहिए और इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वे क्या खाते-पीते हैं, क्या सुनते हैं और क्या सोचते हैं।"

[‘Ayurvedic eugenics: The RSS health wing promises designer babies like Germanic heroes. The fairness cream industry must be quaking.’ The Indian Express, Delhi, May 9, 2017. Link: ]

नॉर्वे के नियो-नाज़ी सामूहिक हत्यारे ब्रेविक के आरएसएस से संबंध

नॉर्वे के नियो-नाज़ी सामूहिक हत्यारे, एंडर्स बेहरिंग ब्रेविक ने भारतीय 'हिंदू राष्ट्रवादियों' की ज़बरदस्त तारीफ़ की थी। उसने भारत के "हिंदू राष्ट्रवादी" आंदोलन को दुनिया भर में लोकतांत्रिक सरकारों को गिराने की वैश्विक लड़ाई में एक अहम सहयोगी बताया।

22 जुलाई 2011 को नॉर्वे में बड़ी संख्या में लोगों की हत्या करने से ठीक पहले, उसने 1,518 पन्नों का एक "घोषणापत्र" जारी किया, जिसमें से 102 पन्नों में भारत के हिंदुत्व आंदोलन की तारीफ़ की गई थी। इसमें "सनातन धर्म आंदोलनों और आम तौर पर भारतीय राष्ट्रवादियों" का समर्थन करने और विश्व भर में समाजवाद, बहूलता, नरीवाद, प्रजातन्त्र को ख़त्म करने के लिए इनका सैनिक सहयोग लेने पर ज़ौर दिया।

[‘Norwegian mass killer's manifesto hails Hindutva: Goals of Indian Hindu nationalists were identical to Justiciar Knights, Anders Breivik claimed’, The Hindu, December 4, 2021. ]

1. हिंदू-विरोधी

आरएसएस भारत के लोकतांत्रिक-धर्मनिरपेक्ष संविधान को हटाकर शूद्रों और हिंदू महिलाओं के खिलाफ़ शर्मनाक आदेश देने वाले धर्मग्रंथ 'मनुस्मृति' को लागू करने की मांग करता रहा है। जो लोग यह मानते हैं कि आरएसएस सिर्फ़ मुसलमानों और ईसाइयों को खत्म करना चाहता है, वे सच्चाई का आधा हिस्सा ही जानते हैं। हिंदू राष्ट्र बनाने के उसके प्रोजेक्ट में शूद्रों (दलितों) और हिंदू महिलाओं के लिए इंसानों से बदतर ज़िंदगी बिताने के हुक्म दिए गए हैं। की बात कही गई है। असल में, आरएसएस चाहता था कि इस संविधान की जगह 'मनुस्मृति' (मनु के कानून) को लाया जाए, जो शूद्रों, अछूतों और महिलाओं के बारे में अपमानजनक और अमानवीय बातों के लिए बदनाम है। जब भारत की संविधान सभा ने 26 नवंबर 1949 को भारत का संविधान अंतिम रूप से तैयार किया, तो आरएसएस खुश नहीं था। उसके मुखपत्र 'ऑर्गनाइज़र' ने 30 नवंबर 1949 के एक संपादकीय में शिकायत की थी:

“लेकिन हमारे संविधान में प्राचीन भारत के अनोखे संवैधानिक विकास का कोई ज़िक्र नहीं है। मनु के कानून स्पार्टा के लाइकरगस या फारस के सोलन से बहुत पहले लिखे गए थे। आज भी मनुस्मृति में बताए गए उनके कानून दुनिया भर में प्रशंसा पाते हैं और लोग खुद-ब-खुद उनका पालन करते हैं। लेकिन हमारे संविधान के जानकारों के लिए इसका कोई मतलब नहीं है।”

आज़ाद भारत में 'मनु कोड' लागू करने की मांग करके आरएसएस असल में अपने गुरु, विचारक और मार्गदर्शक सावरकर का ही अनुसरण कर रहा था, जिन्होंने कहा था:

“मनुस्मृति वह धर्मग्रंथ है जो हमारे हिंदू राष्ट्र के लिए वेदों के बाद सबसे अधिक पूजनीय है और जो प्राचीन काल से ही हमारी संस्कृति-रीति-रिवाजों, विचारों और आचरण का आधार रहा है। इस ग्रंथ ने सदियों से हमारे राष्ट्र की आध्यात्मिक और दैवीय यात्रा को व्यवस्थित रूप दिया है। आज भी करोड़ों हिंदू अपने जीवन और आचरण में जिन नियमों का पालन करते हैं, वे मनुस्मृति पर ही आधारित हैं। आज मनुस्मृति ही हिंदू कानून है।”

[Savarkar, V.D., ‘Women in Manusmriti’ in Savarkar Samagar (collection of Savarkar’s writings in Hindi) volume IV, Prabhat, Delhi, 2000, p. 416.]

आरएसएस के लिए जातिवाद और हिंदू राष्ट्र एक ही बात है

आरएसएस के बड़े नेताओं का मनुस्मृति में भरोसा है, इसलिए स्वाभाविक रूप से वे जातिवाद में भी यकीन रखते हैं, जिससे छुआछूत जैसी बुरी प्रथा पैदा हुई। आरएसएस के लिए जातिवाद ही हिंदू राष्ट्रवाद का मूल है। गोलवलकर ने साफ-साफ कहा था कि जातिवाद और हिंदू राष्ट्र एक ही हैं। उनके अनुसार,

“हिंदू लोग कोई और नहीं बल्कि 'विराट पुरुष' हैं, यानी सर्वशक्तिमान ईश्वर का ही रूप हैं। भले ही उन्होंने 'हिंदू' शब्द का इस्तेमाल नहीं किया, लेकिन ऋग्वेद के 10वें मंडल में 'पुरुष-सूक्त' में ईश्वर का जो वर्णन है, उससे यह बात साफ हो जाती है। उसमें कहा गया है कि सूर्य और चंद्रमा उनकी आंखें हैं, तारे और आकाश उनकी नाभि से बने हैं, और ब्राह्मण उनका सिर, क्षत्रिय हाथ, वैश्य जांघें और शूद्र पैर हैं। सका मतलब है कि जिन लोगों में यह चार-स्तरीय व्यवस्था है, यानी हिंदू लोग, वही हमारे ईश्वर हैं। ईश्वर का यह सर्वोच्च स्वरूप ही हमारी 'राष्ट्र' की अवधारणा का मूल है और इसने हमारी सोच को प्रभावित किया है तथा हमारी सांस्कृतिक विरासत की कई अनूठी अवधारणाओं को जन्म दिया है।"

[Golwalkar, M. S., Bunch of Thoughts, p.36-37.]

आरएसएस और हिंदुत्व खेमा मनु के कानूनों को लागू करके किस तरह की हिंदुत्व सभ्यता बनाना चाहता है, इसे मनु द्वारा हिन्दू निचली जातियों, अछूतों और महिलाओं के लिए बनाए गए कानूनों को देखकर समझा जा सकता है। यहाँ बताए गए कुछ अमानवीय और पतनशील कानून खुद ही अपनी कहानी ब्यान करते हैं।

दलितों, अछूतों के संबंध में मनु के क़ानून:

1. अनादि ब्रह्म ने लोक कल्याण एवं समृद्धि के लिए अपने मुख, बांह, जांघ तथा चरणों से क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र वर्णों को उत्पन्न किया। (1/31)

2. भगवान ने शूद्र वर्ण के लोगों के लिए एक ही कर्तव्य-कर्म निर्धारित किया है-तीनों अन्य वर्णों की निर्विकार भाव से सेवा करना। (1/91)

3. शूद्र यदि द्विजातियों-ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य को गाली देता है तो उसकी जीभ काट लेनी चाहिए क्योंकि नीच जाति का होने से वह इसी सज़ा का अधिकारी है। (8/270)

4. शूद्र द्वारा अहंकारवश उपेक्षा से द्विजातियों के नाम एवं जाति उच्चारण करने पर उसके मुंह में दस उंगली लोहे की जलती कील ठोक देनी चाहिए। (8/271)

5. शूद्र द्वारा अहंकारवश ब्राह्मणों को धर्मोपदेश देने का दुस्साहस करने पर राजा को उसके मुंह एवं कान में गरम तेल डाल देना चाहिए। (8/272)

6. यदि वह द्विजाति के किसी व्यक्ति पर जिस अंग से प्रहार करता है, उसका वह अंग काट डाला जाना चाहिए, यही मनु की शिक्षा है।(8/278)

7. यदि लाठी उठाकर आक्रमण करता है तो उसका हाथ काट डालना चाहिए और यदि वह क्रुद्ध होकर पैर से प्रहार करता है तो उसका पैर काट डालना चाहिए। (8/279)

8. उच्च वर्ग के लोगों के साथ बैठने की इच्छा रखने वाले शूद्र की कमर को दाग़ करके उसे वहां से निकाल भगाना चाहिए अथवा उसके नितम्ब को इस तरह से कटवा देना चााहिए जिससे वह न मरे और न जिये। (8/280)

9. अहंकारवश नीच व्यक्ति द्वारा उच्चजाति पर थूकने पर राजा को उसके होंठ, पेशाब करने पर लिंग एवं हवा छोड़ने पर गुदा कटवा देना चाहिए। (8/281)

महिलाओं के संबंध में मनु के क़ानून:

1. पुरुषों को अपनी स्त्रियों को सदैव रात-दिन अपने वश में रखना चाहिए। (9/2)

2. स्त्री की बाल्यावस्था में पिता, युवावस्था में पति तथा वृद्धावस्था में पुत्र रक्षा करते हैं, अर्थात् वह उनके अधीन रहती है और उसे अधीन ही बने रहना चाहिए; एक स्त्री कभी भी स्वतंत्रता के योग्य नहीं है। (9/3)

3. बिगड़ने के छोटे से अवसर से भी स्त्रियों को प्रयत्नपूर्वक और कठोरता से बचाना चाहिए, क्योंकि न बचाने से बिगड़ी स्त्रियां दोनों (पिता और पति के) कुलों को कलंकित करती हैं। (9/5)

4. सभी जातियों के लोगों के लिए स्त्री पर नियंत्रण रखना उत्तम धर्म के रूप में जरूरी है। यह देखकर दुर्बल पतियों को भी अपनी स्त्रियों को वश में रखने का प्रयत्न करना चाहिए। (9/16)

5. ये स्त्रियां न तो पुरुष के रूप का और न ही उसकी आयु का विचार करती हैं। इन्हें तो केवल पुरुष के पुरुष होने से प्रयोजन है। यही कारण है कि पुरुष को पाते ही ये उससे भोग के लिए प्रस्तुत हो जाती है चाहे वे कुरूप हों या सुंदर। (9/14)

6. स्वभाव से ही परपुरुषों पर रीझने वाली चंचल चित्त वाली और स्नेह रहित होने से स्त्रियां यत्नपूर्वक रक्षित होने पर भी पतियों को धोखा दे सकती हैं। (9/15)

7. मनु के अनुसार ब्रह्माजी ने निम्नलिखित प्रवृत्तियां सहज स्वभाव के रूप में स्त्रियों में पाई हैं-उत्तम शैय्या और अलंकारों के उपभोग का मोह, काम-क्रोध, टेढ़ापन, ईष्र्या द्रोह और घूमना-फिरना तथा सज-धजकर दूसरों को दिखाना। (9/17)

8. स्त्रियों के जातकर्म एवं नामकर्म आदि संस्कारों में वेद मंत्रों का उच्चारण नहीं करना चाहिए। यही शास्त्र की मर्यादा है क्योंकि स्त्रियों में ज्ञानेन्द्रियों के प्रयोग की क्षमता का अभाव (अर्थात् सही न देखने, सुनने, बोलने वाली) है। (9/18)

[मनु के नियमों का उपरोक्त चयन एफ. मैक्स मुलर की पुस्तक 'लॉज़ ऑफ़ मनु', एल.पी.पी. पब्लिकेशन्स, दिल्ली, 1996 से लिया गया है; जो पहली बार 1886 में प्रकाशित हुई थी। प्रत्येक नियम के बाद कोष्ठक में उपरोक्त संस्करण के अनुसार अध्याय संख्या/नियम संख्या दी गई है।]

यहाँ यह ध्यान देने वाली बात है कि 25 दिसंबर, 1927 को ऐतिहासिक महाड आंदोलन के दौरान डॉ. बी.आर. अंबेडकर की मौजूदगी में विरोध स्वरूप मनुस्मृति की एक प्रति जलाई गई थी। डॉ. अंबेडकर ने दलितों से आह्वान किया कि वे भविष्य में 25 दिसंबर को 'मनुस्मृति दहन दिवस' के रूप में मनाएँ। असल में, आरएसएस की विचारधारा का आधार बना ब्राह्मणवाद ही मानव सभ्यता के इतिहास में फासीवाद का मूल रूप है।

[https://www.thehindu.com]

केरल के हिंदुओं की नस्ल सुधारने के बारे में गोलवलकर का अमानवीय समाधान

आरएसएस , जो खुद को हिंदुओं का हितेशी दुनिया का सबसे बड़ा संगठन बताता है, असल में दक्षिण भारत के हिंदू समाज पर उत्तर भारतीय ब्राह्मणवादी व्यवस्था का दबदबा कायम करने के लिए ज़ोर-शोर से काम कर रहा है। आरएसएस का ब्राह्मणवाद दक्षिण भारतीय हिंदुओं को नस्लीय रूप से कमतर मानता है। उसकी सोच में, बाकी लोगों की तुलना में उत्तर भारतीय ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं।

और आरएसएस यह काम बेझिझक करता है। 17 दिसंबर 1960 को गोलवलकर को गुजरात यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ़ सोशल साइंस के छात्रों को संबोधित करने के लिए बुलाया गया था। इस संबोधन में, 'नस्ल सिद्धांत' (Race Theory) में अपने पक्के विश्वास को ज़ाहिर करते हुए, उन्होंने इतिहास में भारतीय समाज में इंसानों के बीच 'क्रॉस-ब्रीडिंग' (मिश्रित नस्ल पैदा करने) के मुद्दे पर बात की। उन्होंने कहा:

“क्रॉस-ब्रीडिंग के ज़रिए इंसानी नस्ल को बेहतर बनाने की कोशिश में उत्तर के नंबूदरी ब्राह्मणों को केरल में बसाया गया था और एक नियम बनाया गया था कि नंबूदरी परिवार का सबसे बड़ा बेटा केरल के वैश्य, क्षत्रिय या शूद्र समुदायों की बेटी से ही शादी कर सकता है। एक और भी साहसी नियम यह था कि किसी भी वर्ग की विवाहित महिला की पहली संतान का पिता एक नंबूदरी ब्राह्मण होना चाहिए और उसके बाद वह अपने पति से बच्चे पैदा कर सकती थी। आज इस प्रयोग को व्यभिचार कहा जाएगा, लेकिन उस समय ऐसा नहीं था, क्योंकि यह सिर्फ़ पहले बच्चे तक ही सीमित था।”

[M. S. Golwalkar cited in Organiser, January 2, 1961.]

आरएसएस के अंदर: पुरुष 'स्वयंसेवक' हैं और महिलाएं 'सेविकाएं' (नौकरानियां) हैं

1925 में बनी आरएसएस एक ऐसी संस्था थी जिसमें सिर्फ़ पुरुष सदस्य थे, जिन्हें 'स्वयंसेवक' कहा जाता था। जब आरएसएस ने 1936 में महिलाओं के लिए 'राष्ट्र सेविका समिति' नाम से एक विंग शुरू करने का फ़ैसला किया, तो संगठन के बड़े नेताओं ने साफ़ कर दिया कि वे महिलाओं को पुरुषों से कमतर मानते हैं। नाम से ही साफ़ था कि महिला सदस्यों को 'स्वयंसेवक' नहीं, बल्कि 'राष्ट्र सेविका' (राष्ट्र की सेविकाएं या नौकरानियां) कहा जाता था। 'राष्ट्र सेविका समिति' में महिलाओं की यह 'सेविका' वाली पहचान सिर्फ़ एक तकनीकी बात नहीं थी, बल्कि हिंदू महिलाओं के प्रति आरएसएस के उस नज़रिए का ही नतीजा थी जो समाज में महिलाओं की ग़ुलाम भूमिका को बढ़ावा देता है। सिर्फ़ 'राष्ट्र सेविका समिति' की सदस्य ही (जिनकी संख्या संगठन की वेबसाइट के अनुसार लगभग तीन लाख है) 'वफ़ादारी/कौमार्य' बनाए रखने, 'संयमित' और 'दृढ़' रहने तथा 'अनैतिकता और बुरी आदतों' का शिकार न होने का संकल्प लेती हैं। आरएसएस के पुरुष स्वयंसेवक ऐसा कोई संकल्प नहीं लेते। [https://sevikasamiti.org/Prarthana]

मोहन भागवत जो अमरीका, कनाडा और इंग्लैंड में सारे विश्व में बराबरी पर प्रवचन देंगे, भारत में हिंदू महिलाओं की ग़ुलाम अधीन भूमिका पर ज़ोर देने का कोई मौका नहीं छोड़ते। इंदौर (जो आरएसएस का गढ़ है) में आरएसएस के प्रमुख कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि हिंदू महिलाओं को 'सामाजिक अनुबंध' (social contract) के अनुसार खुद को घर के कामों तक ही सीमित रखना चाहिए। उनके अनुसार:

"सामाजिक अनुबंध का सिद्धांत—पति और पत्नी एक अनुबंध से बंधे होते हैं, जिसमें कहा गया है कि 'तुम (महिला) घर के कामों को संभालो और मुझे संतुष्ट करो, मैं (पुरुष) तुम्हारी ज़रूरतों का ध्यान रखूंगा और तुम्हारी रक्षा करूंगा'; और जब तक वह बिना किसी चूक के अपने कर्तव्यों का पालन करती है, वह उसे अनुबंध के तहत बनाए रखता है, और यदि वह अनुबंध का सम्मान करने में विफल रहती है, तो वह उसे त्याग देता है..."

[‘'Women meant to do household chores': another shocker from RSS chief’, NDTV, Delhi, January 06, 2013. ]

2. आरएसएस लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता भारत विरोधी

आरएसएस का मकसद सबको साथ लेकर चलने वाला भारत नहीं, बल्कि सिर्फ़ हिंदुओं का राष्ट्र बनाना है। इसकी स्थापना 1925 में केशव बलिराम हेडगेवार (जिन्हें आरएसएस में 'डॉक्टरजी' कहा जाता है), उनके गुरु बालकृष्ण शिवराम मुंजे और हिंदुत्व की विचारधारा के जन्मदाता विनायक दामोदर सावरकर ने की थी। हेडगेवार पहले इंडियन नेशनल कांग्रेस में थे, लेकिन उन्होंने इसे छोड़ दिया क्योंकि वे उस आज़ादी की लड़ाई में सभी धार्मिक समुदायों के शामिल होने के खिलाफ़ थे, जिसका नेतृत्व मोहनदास करमचंद गांधी कर रहे थे। गांधीजी सभी धर्मों के लोगों को भारतीय राष्ट्र का हिस्सा मानते थे और एक ऐसे आज़ाद भारत के पक्ष में थे जिसमें सभी को साथ लेकर चला जाए। आरएसएस द्वारा प्रकाशित हेडगेवार की जीवनी में बताया गया है कि उन्होंने कांग्रेस इसलिए छोड़ी क्योंकि, "गांधीजी हमेशा हिंदू-मुस्लिम एकता को ध्यान में रखकर काम करते थे... लेकिन डॉक्टरजी को इस कदम में खतरा नज़र आया। असल में, उन्हें 'हिंदू-मुस्लिम एकता' का नया-नया नारा भी पसंद नहीं आया।" [Seshadri, H. V. (ed.), Dr. Hedgewar, the Epoch-Maker: A Biography, Sahitya Sindhu, Bangalore, 1981, p. 61.]

लोकतांत्रिक-धर्मनिरपेक्ष भारत से आरएसएस की नफ़रत

लोकतंत्र के सिद्धांतों के उलट, आरएसएस ने हमेशा भारत में एक तानाशाही शासन की मांग की। 1940 में आरएसएस के 1350 शीर्ष कार्यकर्ताओं के सामने भाषण देते हुए गोलवलकर ने कहा था,

"एक झंडे [भगवा], एक नेता और एक विचारधारा से प्रेरित आरएसएस इस महान भूमि के हर कोने में हिंदुत्व की ज्योति जला रहा है।"

[MS Golwalkar, Shri Guruji Samagar Darshan (collected works of Golwalkar in Hindi), Bhartiya Vichar Sadhna, Nagpur, nd., Volume I, p. 11.]

आरएसएस एक ऐसा सांस्कृतिक संगठन जो लाठी भाँजता है हथियारों की पूजा करता है।

आरएसएस खुद को एक सांस्कृतिक संगठन और दुनिया भर के हिंदुओं का सबसे बड़ा संगठन बताता है। लेकिन यह दुनिया का एकमात्र ऐसा सांस्कृतिक-धार्मिक संगठन है जिस के स्वयंसेवक लाठी लेकर चलते हैं। अपने सब से बड़े त्योहार के अवसर पर हथियारों की पूजा करता है। आरएसएस की स्थापना दशहरा (विजय दशमी; वह त्योहार जो भगवान राम की रावण पर जीत के दिन के रूप में मनाया जाता है) के दिन हुई थी। इस दिन आरएसएस साल का अपना सबसे बड़ा कार्यक्रम आयोजित करता है, जो उसके स्थापना दिवस का जश्न भी होता है। इस जश्न का सबसे अहम हिस्सा आरएसएस प्रमुख द्वारा 'शस्त्र पूजा' (हथियारों की पूजा) करना है।

[‘RSS Festivals: Discover the six key celebrations and their significance for the Sangh’,  ]

मोदी के शासन में आरएसएस की आतंकवादी गतिविधियों पर एक सम्मानित भारतीय पुलिस अधिकारी, जूलियो रिबेरो, की राय

भारत के सबसे सम्मानित पुलिस अधिकारियों में से एक और रोमानिया में पूर्व राजदूत तथा पद्म भूषण (एक प्रमुख राष्ट्रीय पुरस्कार) से सम्मानित जूलियो रिबेरो ने बहुत दुखी मन से बताया है कि कैसे मोदी के प्रधानमंत्री के तौर पर पहले कार्यकाल (2014-19) के एक साल से भी कम समय में आरएसएस ने नफरत फैलाई और भारत में अल्पसंख्यकों को डराया-धमकाया। एक ईसाई होने के नाते डर महसूस करते हुए, उन्होंने 17 मार्च, 2015 को लिखा:

“आज, अपनी उम्र के 86वें साल में, मुझे खतरा महसूस हो रहा है, ऐसा लग रहा है जैसे मेरी ज़रूरत नहीं है और मैं अपने ही देश में अजनबी बन गया हूँ। जिन नागरिकों ने मुझ पर भरोसा किया था कि मैं उन्हें एक ऐसी ताकत से बचाऊंगा जिसे वे समझ नहीं पा रहे थे, वही लोग अब मेरे खिलाफ़ हो गए हैं और मेरे धर्म का पालन करने के लिए मेरी निंदा कर रहे हैं, क्योंकि मेरा धर्म उनसे अलग है। अब मैं भारतीय नहीं रहा, कम से कम 'हिंदू राष्ट्र' के समर्थकों की नज़र में तो नहीं।”

“क्या यह महज इत्तेफ़ाक है या कोई सोची-समझी साज़िश कि एक छोटे और शांतिप्रिय समुदाय को व्यवस्थित रूप से निशाना बनाने का सिलसिला तभी शुरू हुआ, जब पिछले साल मई में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी सरकार सत्ता में आई? ‘घर वापसी’, क्रिसमस को ‘सुशासन दिवस’ घोषित करना और दिल्ली में ईसाई चर्चों व स्कूलों पर हमले—इन सभी घटनाओं ने उस असुरक्षा की भावना को और गहरा कर दिया है, जिससे आज ये शांतिप्रिय लोग जूझ रहे हैं।

“ईसाई समुदाय ने हमेशा अपनी आबादी के अनुपात से कहीं ज़्यादा अहम भूमिका निभाई है — भले ही यह पारसी समुदाय जितना न हो, लेकिन यह काफ़ी उल्लेखनीय रहा है। खासकर शिक्षा के क्षेत्र में उनका योगदान बहुत रहा है। ईसाइयों ने कई स्कूल, कॉलेज और नौकरी के लिए ज़रूरी हुनर सिखाने वाले संस्थान खोले और चलाए हैं। इन संस्थानों की बहुत मांग रहती है। कट्टर हिंदू भी ऐसे शिक्षण संस्थानों में दाखिला लेते रहे हैं और ईसाई शिक्षकों की लगन और ईमानदारी से फ़ायदा उठाते रहे हैं। वैसे, ऐसा नहीं लगता कि किसी का धर्म परिवर्तन करके ईसाई बनाया गया हो, हालांकि बहुत से लोगों ने ईसाई मूल्यों को अपनाया है और 'छद्म-धर्मनिरपेक्ष' (pseudo-secularist) बन गए हैं।

“भारतीय सेना की कमान एक ईसाई जनरल के हाथों में रही है, नौसेना और वायुसेना के साथ भी ऐसा ही हुआ है। देश की रक्षा सेनाओं में वर्दी पहने हुए अनगिनत ईसाई पुरुष और महिलाएं शामिल हैं। फिर 'परिवार' के वे उग्रवादी, जो एक शुद्ध हिंदू राष्ट्र बनाना चाहते हैं, उन्हें गैर-भारतीय कैसे घोषित कर सकते हैं?

“यह दुखद है कि नफ़रत और अविश्वास के माहौल ने इन चरमपंथियों का हौसला हद से ज़्यादा बढ़ा दिया है। ईसाई आबादी, जो कुल जनसंख्या का मात्र 2 प्रतिशत है, उसे सुनियोजित तरीके से कई बार ज़बरदस्त चोट पहुंचाई गई है। अगर ये चरमपंथी बाद में मुसलमानों की ओर अपना ध्यान केंद्रित करते हैं - जो कि उनका मकसद भी लगता है - तो इसके ऐसे नतीजे सामने आएंगे जिनकी कल्पना करने से भी यह लेखक डरता है।”

[‘As a Christian, suddenly I am a stranger in my own country, writes Julio Ribeiro: And, as a Christian, suddenly a stranger in my own country.’ The Indian Express, Delhi, March 17, 2015]

जब गोलवलकर के पसंदीदा आरएसएस छात्र मोदी ने राज्य पर शासन किया, तो गुजराती मुसलमानों के साथ क्या हुआ, यह भारत के एक प्रमुख अंग्रेज़ी दैनिक 'हिंदुस्तान टाइम्स' के संपादकीय की इन बातों से साफ़ हो जाएगा:

“बेटियों के साथ उनके पिताओं के सामने गैंग-रेप किया गया और फिर उनके सिर कुचल दिए गए। उनके पिताओं पर पेट्रोल डालकर उन्हें आग के हवाले कर दिया गया। उनकी संपत्ति लूट ली गई। उनके कारोबार बर्बाद कर दिए गए। और पुलिस तमाशबीन बनी रही और उसने कुछ नहीं किया।”

[Hindustan Times, New Delhi, March 21, 2002.]

आरएसएस के लिए भारतीय मुसलमान और ईसाई क्रमशः नंबर 1 और नंबर 2 के 'आंतरिक खतरे' हैं।

आरएसएस कार्यकर्ताओं की 'पवित्र' किताब 'बंच ऑफ़ थॉट्स' (Bunch of Thoughts) में 'आंतरिक खतरे' (Internal Threats) नाम का एक लंबा अध्याय है, जिसमें भारत के मुस्लिम और ईसाई नागरिकों को क्रमशः पहला और दूसरा खतरा बताया गया है। इस अध्याय की शुरुआत इस बात से होती है:

"दुनिया के कई देशों के इतिहास से यह दुखद सबक मिला है कि देश के भीतर मौजूद दुश्मन तत्व, बाहरी हमलावरों की तुलना में राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए कहीं ज़्यादा बड़ा खतरा पैदा करते हैं।"

[Golwalkar, M.S., Bunch of Thoughts, Sahitya Sindhu, Bangalore, 1996, p. 177.]

मुसलमानों को नंबर 1 'आंतरिक खतरा' मानते हुए, गोलवलकर आगे कहते हैं,

"आज भी बहुत से लोग कहते हैं, 'अब कोई मुस्लिम समस्या नहीं है। पाकिस्तान का समर्थन करने वाले सभी दंगाई तत्व हमेशा के लिए चले गए हैं। बाकी बचे मुसलमान हमारे देश के प्रति समर्पित हैं। आखिरकार, उनके पास जाने के लिए कोई दूसरी जगह नहीं है और वे वफादार रहने के लिए मजबूर हैं'.... यह सोचना आत्मघाती होगा कि पाकिस्तान बनने के बाद वे रातों-रात देशभक्त बन गए हैं। इसके विपरीत, पाकिस्तान बनने से मुस्लिम खतरा सौ गुना बढ़ गया है, जो हमारे देश पर उनके भविष्य के सभी आक्रामक इरादों के लिए एक लॉन्चिंग पैड बन गया है।" [वहीं, पृष्ठ 177-78]

नंबर 2 'आंतरिक खतरे' ईसाइयों पर चर्चा करते हुए, वे कहते हैं,

"आज हमारी धरती पर रहने वाले सज्जनों की भूमिका ऐसी है कि वे न केवल हमारे जीवन के धार्मिक और सामाजिक ताने-बाने को नष्ट करने पर आमादा हैं, बल्कि विभिन्न इलाकों में और यदि संभव हो तो पूरी धरती पर अपना राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित करना चाहते हैं।" [वही, पृष्ठ 193।]

सिख, जैन और बौद्ध धर्मों स्वतंत्र धर्म नहीं: आरएसएस

आरएसएस इस्लाम और ईसाई धर्म के मानने वालों को प्रवासी या विदेशी मानता है और उन्हें हटाने या खत्म करने की मांग करता है क्योंकि इन दोनों धर्मों को विदेशी धर्म माना जाता है। हालाँकि, आरएसएस सिख, बौद्ध और जैन जैसे भारतीय धर्मों का सम्मान नहीं करता है क्योंकि इन्हें स्वतंत्र धर्म नहीं, बल्कि हिंदू धर्म का ही हिस्सा माना जाता है। गुरु गोलवलकर ने यह एजेंडा तय किया था कि, "बौद्ध, जैन और सिख, सभी उस एक व्यापक शब्द 'हिंदू' में शामिल हैं।"

[Golwalkar, MS, The Spotlights, Sahitya Sindhu, Bangalore, 1974, p. 171.]

आरएसएस के जाने-माने विचारक नाना देशमुख, जिन्होंने 1984 में सिखों के नरसंहार को सही ठहराया था, उन्हें मोदी सरकार ने देश के सबसे बड़े राष्ट्रीय सम्मान से नवाज़ा है

आरएसएस का दावा है कि वह हमेशा हिंदू-सिख एकता के पक्ष में रही है। वह कभी-कभी मुस्लिम हमलों से हिंदू धर्म को बचाने के लिए सिख धर्म का आभार भी जताती है। हालाँकि, यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि आरएसएस सिख धर्म को एक स्वतंत्र धर्म नहीं मानती—जिसने जाति-प्रथा और ब्राह्मणवादी वर्चस्व को नकारा हो—बल्कि उसे हिंदू धर्म का ही एक हिस्सा मानती है। जहाँ तक भारत में 1984 में हुए सिखों के नरसंहार की बात है, तो आरएसएस ने इस हालात के लिए सिखों को ही ज़िम्मेदार ठहराया था। आरएसएस के एक प्रमुख पूर्णकालिक कार्यकर्ता और विचारक नाना देशमुख [अब दिवंगत] ने 8 नवंबर, 1984 को 'मोमेंट्स ऑफ़ सोल सर्चिंग' (आत्म-मंथन के क्षण) नाम का एक दस्तावेज़ जारी किया था, जिसमें इस भयानक नरसंहार को सही ठहराया गया था। इस दस्तावेज़ में नाना देशमुख ने सिख नरसंहार को सही ठहराते हुए यह तर्क दिया था:

1. सिखों का नरसंहार किसी ग्रुप या असामाजिक तत्वों का काम नहीं था, बल्कि हिंदुओं में मौजूद गुस्से का नतीजा था। 2. देशमुख ने इंदिरा गांधी के दो सुरक्षाकर्मियों (जो सिख थे) के काम और पूरे सिख समुदाय के काम के बीच कोई फ़र्क नहीं किया। उनके दस्तावेज़ के मुताबिक, इंदिरा गांधी के हत्यारे अपने समुदाय के किसी आदेश पर काम कर रहे थे। 3. सिखों ने खुद इन हमलों को न्योता दिया। 4. उन्होंने ऑपरेशन ब्लू स्टार की तारीफ़ की और इसके किसी भी विरोध को देश-विरोधी बताया। जब हज़ारों सिखों को मारा जा रहा था, तब वे देश को सिख उग्रवाद के बारे में चेतावनी दे रहे थे, और इस तरह उन हत्याओं का वैचारिक बचाव कर रहे थे। 5. पंजाब में हिंसा के लिए पूरा सिख समुदाय ज़िम्मेदार था। 6. सिखों को आत्मरक्षा में कुछ नहीं करना चाहिए था, बल्कि हत्यारी भीड़ के सामने सब्र और सहनशीलता दिखानी चाहिए थी। 7. नरसंहार के लिए सिख बुद्धिजीवी ज़िम्मेदार थे, न कि हत्यारी भीड़। उन्होंने सिखों को एक उग्रवादी समुदाय में बदल दिया था और उन्हें उनकी हिंदू जड़ों से काट दिया था, जिससे राष्ट्रवादी भारतीयों के हमले हुए। इसके अलावा, उन्होंने सभी सिखों को एक ही गिरोह का हिस्सा माना और उन पर हुए हमलों को राष्ट्रवादी हिंदुओं की प्रतिक्रिया बताया। 8. हैरानी की बात है कि 'मोमेंट्स ऑफ़ सोल सर्चिंग' (आत्म-दर्शन के क्षण) भारतीय राज्य या हत्यारे दस्तों के लिए नहीं थे, बल्कि पीड़ित सिखों से इसकी मांग की गई थी।

[देशमुख की मूल दस्तावेज़ के लिए पढ़ें: 1984 सिख क़त्ले-आम को भूल जाने की 40वीं वर्षगांठ: क़ातिलों को सज़ा देना तो दूर उन की पहचान होना भी बाक़ी!]

नाना देशमुख को देश का सबसे बड़ा राष्ट्रीय सम्मान 'भारत रत्न' दिया गया।

1984 के नरसंहार के शहीदों और पीड़ितों के साथ हुए अन्याय के बावजूद, 2019 के गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर भारत के आरएसएस-भाजपा शासकों ने नाना देशमुख को देश का सर्वोच्च राष्ट्रीय सम्मान 'भारत रत्न' प्रदान किया। भारतीय प्रधानमंत्री मोदी ने देशमुख की प्रशंसा करते हुए कहा, "वे विनम्रता, करुणा और वंचितों की सेवा की प्रतिमूर्ति हैं। वे सच्चे अर्थों में भारत रत्न हैं।"

कृपया इन तथ्यों के साथ आरएसएस के मौजूदा सुप्रीमो का सामना करें, जो अभी USA, कनाडा और UK के दौरे पर हैं। इस मौक़े का इस्तेमाल आरएसएस के आपराधिक हिंदुत्व प्रोजेक्ट को बेनक़ाब करने के लिए करें; यह संगठन उन बुरी ताकतों का केंद्र बनता जा रहा है जो इंसानियत और शांति को खत्म करना चाहती हैं। यह डॉक्युमेंट उन लोगों को जागरूक करने के लिए भी है जो नव-फासीवाद (Neo-Fascism) और नाज़ीवाद के बढ़ते प्रभाव को लेकर चिंतित हैं।

यह कॉपीराइट-फ़्री है, कृपया इसका बेझिझक इस्तेमाल करें!

शम्सुल इस्लाम

26 अगस्त, २०२६

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मोहन भागवत न्यूयॉर्क क्यों जा रहे हैं?

मीडिया रिपोर्टों और कार्यक्रम संबंधी दावों के अनुसार मोहन भागवत न्यूयॉर्क में 'Universal Oneness Celebration' नामक कार्यक्रम में भाग लेने वाले हैं। इस यात्रा को RSS के वैश्विक संपर्क और प्रवासी भारतीय समुदाय के साथ संवाद के संदर्भ में देखा जा रहा है।

Universal Oneness Celebration क्या है?

'Universal Oneness Celebration' को विश्व एकता और वैश्विक संवाद से जुड़े कार्यक्रम के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। हालांकि आलोचक RSS की ऐतिहासिक विचारधारा और संगठन की वर्तमान राजनीति के संदर्भ में इसके संदेश पर सवाल उठा रहे हैं।

Madison Square Garden में मोहन भागवत का कार्यक्रम क्यों चर्चा में है?

Madison Square Garden अमेरिका के सबसे चर्चित सार्वजनिक कार्यक्रम स्थलों में से एक है। मोहन भागवत का वहां प्रस्तावित संबोधन RSS की अंतरराष्ट्रीय पहुंच और भारतीय प्रवासी राजनीति के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

RSS की विचारधारा पर विवाद क्यों होता है?

RSS की विचारधारा को लेकर इतिहासकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और राजनीतिक विश्लेषकों के बीच लंबे समय से बहस रही है। आलोचक संगठन के हिंदू राष्ट्र, धार्मिक पहचान, जाति, धर्मनिरपेक्षता और अल्पसंख्यकों से जुड़े विचारों पर प्रश्न उठाते रहे हैं, जबकि RSS अपने दृष्टिकोण को राष्ट्रवादी और सांस्कृतिक संगठन के रूप में प्रस्तुत करता है।

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