‘शिक्षा के सौदागर सत्ता छोड़ो’: जंतर-मंतर पर समाजवादियों का प्रदर्शन, निजीकरण के खिलाफ देशव्यापी आंदोलन का आह्वान
जंतर-मंतर पर ‘शिक्षा के सौदागर सत्ता छोड़ो’ के नारे के साथ समाजवादियों का प्रदर्शन। युवा सोशलिस्ट पहल ने शिक्षा के निजीकरण, व्यावसायीकरण और सांप्रदायीकरण के खिलाफ देशव्यापी आंदोलन का आह्वान किया।;
"Merchants of Education, Quit Power": Socialists protest at Jantar Mantar, call for a nationwide movement against privatisation.
जंतर-मंतर पर ‘शिक्षा के सौदागर सत्ता छोड़ो’ का नारा, शिक्षा के निजीकरण और व्यवसायीकरण के खिलाफ समाजवादियों का आंदोलन
- शिक्षा के निजीकरण के खिलाफ जंतर-मंतर पर प्रदर्शन: युवा सोशलिस्ट पहल ने देशव्यापी आंदोलन का किया आह्वान
- शिक्षा के अधिकार और सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था के लिए समाजवादियों का देशव्यापी आंदोलन का आह्वान
- 'शिक्षा के सौदागर सत्ता छोड़ो' के नारे के साथ जंतर-मंतर पर समाजवादियों का प्रदर्शन
शिक्षा के अधिकार, सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था की मजबूती और शिक्षा के निजीकरण-व्यवसायीकरण-सप्रदायीकरण के खिलाफ युवा सोशलिस्ट पहल का देशव्यापी आंदोलन खड़ा करने का आह्वान
नई दिल्ली, 11 अगस्त 2026. भारत छोड़ो आंदोलन दिवस 9 अगस्त के अवसर पर नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर ‘शिक्षा के सौदागर सत्ता छोड़ो’ के नारे के साथ युवा सोशलिस्ट पहल के तत्वावधान में प्रदर्शन किया गया। प्रदर्शन में देश के अलग-अलग हिस्सों से समाजवादी कार्यकर्ताओं, ट्रेड यूनियन नेताओं, शिक्षकों, छात्रों,पत्रकारों और युवाओं ने भाग लिया।
यह कार्यक्रम समाजवादी आंदोलन के 90 वर्ष पूरे होने के अवसर पर अगले दस वर्षों तक आयोजित किए जाने वाले कार्यक्रमों की श्रृंखला की एक और कड़ी था। कार्यक्रम में 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन और उसमें समाजवादियों की महत्वपूर्ण भूमिका को याद करते हुए शिक्षा के संवैधानिक अधिकार को कारपोरेट-कम्यूनल गठजोड़ से बचाने के लिए देश-व्यापी आंदोलन खड़ा करने का आह्वान किया गया।
कार्यक्रम की शुरुआत सुबह महात्मा गांधी की समाधि राजघाट पर उन्हें नमन करके हुई। यहां युवा सोशलिस्ट पहल और भारतीय सोशलिस्ट मंच के सदस्यों ने गांधीजी की समाधि पर सभी भारट के समस्त विद्यार्थियों के लिए समान, गुणवत्तापूर्ण और मुफ़्त शिक्षा का अधिकार सुनिश्चित करने के लिए संघर्ष की शपथ ली।
तत्पश्चात ‘आचार्य नरेंद्र देव अमर रहें’ और ‘शिक्षा के सौदागर सत्ता छोड़ो’ के नारों के बीच समाजवादी आंदोलन के पुरोधा आचार्य नरेंद्रदेव की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया गया।
जंतर-मंतर पर आयोजित जनसभा में शिक्षा के सौदागरों की निम्नलिखित सूची जारी की गई:
1. कांग्रेस पार्टी, जिसने 1991 में बाजार-अर्थव्यवस्था लागू करके संविधान के बरखिलाफ शिक्षा के निजीकरण, व्यावसायीकरण और ग्लोबीकरण का रास्ता खोला;
2. भाजपा/आरएसएस, जिसने शिक्षा पर दो बड़े उद्योगपतियों – कुमार मंगलम बिड़ला और मुकेश अंबानी – की कमिटी बना कर शिक्षा के निजीकरण, व्यावसायीकरण और ग्लोबीकरण की प्रक्रिया को मजबूती और तेजी प्रदान की। नई शिक्षा नीति 2020 उस दिशा में एक लंबी छलांग है;
3. एनडीए और यूपीए में शामिल सभी राजनीतिक पार्टियां जो इस पूरी प्रक्रिया में शामिल रही हैं;
4. राजनीतिक सुभीता और संरक्षण पाकर शिक्षा के बाजार में मुनाफाखोरी के लिए प्रतिस्पर्धा में जुटे छोटे-बड़े व्यवसायी;
5. वे ‘धर्मात्मा’ (फिलेंथ्रोपिस्ट) जो निजी स्कूलों, महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों में वैश्विक स्तर की शिक्षा देने के नाम पर शिक्षा का व्यवसाय करते हैं;
6. संवैधानिक पदों पर आसीन विशिष्ट/अतिविशिष्ट महानुभाव जो निजी विश्वविद्यालयों के कार्यक्रमों में भागीदारी करते हैं;
7. देश के शिक्षाविद, शिक्षक और बुद्धिजीवी जो यूजीसी/सरकारी कमिटियों में रहते हुए इस संविधान-विरोधी काम को अंजाम देने में सरकारों के साथ रहे हैं;
8. देश के विद्वान शिक्षक जिन्होंने अपना कैरियर सार्वजनिक महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में बनाया, लेकिन निजी और विदेशी विश्वविद्यालयों की नौकरी बजाते और उनका विरुद गाते हैं;
9. एनजीओ जगत के वे लोग जो शिक्षा/ज्ञान के बाजार-चरित्र और बाजार-अर्थव्यवस्था को बनाए रख कर शिक्षा-सुधारों के टोटकों के नाम पर देशी-विदेशी अनुदान और पद-पुरस्कार लेते हैं और शिक्षा के संघर्ष को दबाने और भटकाने में बड़ी भूमिका निभाते हैं।
इसके बाद देश की जन-पंचायत के सामने युवा सोशलिस्ट पहल का निम्नलिखित संकल्प पेश किया गया:
संविधान-निर्माता, खास कर डॉक्टर अंबेडकर शिक्षा के अधिकार को संविधान के खंड 3 में मौलिक अधिकारों के साथ रखना चाहते थे। उसे संविधान के खंड 4 में राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों के साथ इस संकल्प के साथ रखा गया कि स्वतंत्र भारत में शिक्षा के अधिकार का लक्ष्य जल्दी ही हासिल कर लिया जाना चाहिए – यानि दस वर्षों में। लेकिन यह संवैधानिक संकल्प कभी पूरा नहीं हुआ। उल्टे, भारत के नेताओं और बुद्धिजीवियों ने इस संकल्प के विरुद्ध कानून बना कर शिक्षा को बाजारवाद का ग्रास बना दिया। इस सारी प्रक्रिया को उलटना होगा।
इसके लिए बिना देरी किए निम्नलिखित कदम उठाने होंगे:
1. नवउदारवादकालीन सभी संविधान-विरोधी कानूनों को निरस्त किया जाए ताकि संविधान-सम्मत शिक्षा-व्यवस्था की अविलंब बहाली और मजबूती हो सके;
2. पहली से स्नातकोत्तर कक्षा तक सभी को समान और उम्दा गुणवत्ता वाली शिक्षा देने की जिम्मेदारी राज्य की हो;
3. देश के प्रत्येक विद्यार्थी को उसकी पसंद के विषय/कोर्स में दाखिला सुलभ कराने की जिम्मेदारी राज्य की हो;
4. जो विद्यालय, महाविद्यालय और विश्वविद्यालय सरकारी अनुदान (सस्ती जमीन और कर्ज आदि के रूप में) से कायम किए गए हैं उन सभी का सार्वजनीकरण किया जाए;
5. वर्तमान शिक्षा मौजूदा पूंजीवादी बाज़ार व्यवस्था के लिए कुशल मजदूर पैदा करने तक सीमित कर दी गई है। शिक्षा का साम्प्रदायीकरण समाज में संकीर्णता, अंधविश्वास और तर्कहीनता को बढ़ावा दे रहा है। इस शिक्षा-विरोधी स्थिति को समाप्त कर विज्ञान, वाणिज्य, समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र, मानविकी, कला, टेक्नॉलाजी, मेडिकल, प्रबंधन आदि विषयों की शिक्षा का कंटेंट और भाषा ऐसी हो कि प्रत्येक विषय में मौलिक अवदान करने वाले तर्कशील नागरिकों का निर्माण हो सके;
6. कुल मिला कर, शिक्षा/ज्ञान के बाजारोन्मुख चरित्र और अर्थव्यवस्था को जनोन्मुख बनाया जाए;
7. शिक्षा के सवाल पर समग्रता में चर्चा के लिए संसद और विधानसभाओं का विशेष सत्र बुलाया जाए।
युवा सोशलिस्ट पहल का मानना है कि देश में जड़ जमा चुकी कारपोरेट राजनीति के तहत कारपोरेट हितों और सांप्रदायिकता की पोषक सरकार इन मांगों को नहीं मानेगी। लिहाजा, जन-जागृति एकमात्र रास्ता है। जैसा कि प्रोफेसर अनिल सदगोपाल ने कहा है, देश की संघर्षशील जनता को जल, जंगल, जमीन और जीविका की लड़ाई में शिक्षा के हक की लड़ाई को भी शामिल करना होगा।
भारत छोड़ो आंदोलन दिवस के ऐतिहासिक मौके पर युवा सोशलिस्ट पहल की अपील है कि भारतीय जनता के संवैधानिक अधिकारों का विभिन्न क्षेत्रों में संघर्ष करने वाले प्रगतीशील संगठन, समूह एवं व्यक्ति शिक्षा के निजीकरण, व्यावसायीकरण और ग्लोबीकरण को समाप्त करने का बीड़ा उठाएं। युवा सोशलिस्ट पहल का मानना है कि भारत के राष्ट्रीय जीवन पर कसे नवसाम्राज्यवादी शिकंजे को नष्ट करने के लिए सबसे पहले शिक्षा को गुलामी की जंजीरों से मुक्त करने की जरूरत है।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि गुजरात के वरिष्ठ ट्रेड यूनियन नेता जयंती भाई पांचाल थे। अध्यक्षता भारतीय समाजवादी मंच के अध्यक्ष एडवोकेट आदित्य कुमार ने की। भारत संवाद अभियान के संयोजक एडवोकेट बिजेंद्र यादव, जम्मू-कश्मीर से आए यूनाइटेड पीस इनीशीएटिव के ऐक्टिविस्ट शाहिद सलीम, वरिष्ठ समाजवादी देवेंद्र सिंह अवाना, देवेंद्र गुर्जर, चरणसिंह राजपूत कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि थे।
प्रदर्शन स्थल पर आयोजित सभा को कॉमरेड नरेंद्र, डॉ शशिशेखर सिंह, डॉ भगवान सिंह, अमर सिंह अमर, डॉ प्रेम सिंह, बंदना पांडे, डॉ सुरेश गवई समेत कई वक्ताओं ने अपने विचार रखे। समाजवादी ऐक्टिविस्ट तहसीन अहमद, पुरुषोत्तम, संजय कनौजिया, डॉ अतुल कुमार, लेखक रामेश्वर दूबे समेत दिल्ली विश्वविद्यालय और जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के कई छात्र-छात्राओं और शिक्षकों ने प्रदर्शन में भाग लिया। संचालन डॉ हिरण्य हिमकर ने किया।
युवा सोशलिस्ट पहल के लिए
डॉ हिरण्य हिमकर