‘स्मृति नाद’ : मानवीय संवेदनाओं, परिवार और स्मृतियों का मर्मस्पर्शी काव्य-संग्रह
अपूर्वा के प्रथम कविता संग्रह ‘स्मृति नाद’ में परिवार, प्रेम, रिश्तों और स्मृतियों की गहन मानवीय संवेदनाएं उभरती हैं। डॉ. विदुषी भारद्वाज की यह समीक्षा भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों, स्त्री अनुभव और भावनात्मक संसार का गंभीर विश्लेषण प्रस्तुत करती है।;
Book review in Hindi
मानवीय संवेदनाओं का अनूठा राग - स्मृति नाद
- अपूर्वा की कविताओं में परिवार, प्रेम और स्मृतियों की जीवंत दुनिया
- ‘स्मृति नाद’ में स्त्री अनुभव और भारतीय पारिवारिक संस्कारों की अभिव्यक्ति
- पिता, मां, नानी और रिश्तों की भावनात्मक उपस्थिति का काव्यात्मक संसार
- महानगरीय जीवन के बीच घर-आंगन की स्मृतियों का मार्मिक राग
- भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों और मानवीय संवेदनाओं का सशक्त दस्तावेज
परिष्कृत भाषा और नवीन उपमाओं से सजी अपूर्वा की काव्य-शैली
अपूर्वा के कविता संग्रह 'स्मृति नाद' को पढ़ने का अवसर मिला। इसमें घर परिवार और प्रेम के चारों ओर घूमती कुल 45 कविताएं हैं। गहन संवेदना से परिपूर्ण उनकी कविताओं में विवाहोपरांत पीहर के अंगने के छूटने की हूक है, पिता के दिवंगत हो जाने पर बेटी की जिंदगी से कुछ रंग सदा के लिए उड़ जाने, सारे अनुभवों के अधूरे रह जाने की पीड़ा है, जीवन की क्षणभंगुरता की वेदनामयी पहचान एवं स्वीकृति है, अनेकानेक स्मृतियों का मौन रुदन है, घर से दूर महानगर के हॉस्टल में सताती घर की यादें हैं, मां के प्रेम और समर्पण को चीन्हती बिटिया की आंखें हैं उसका प्रतिरूप बनने की आकांक्षा है, जाड़ों की गुनगुनाती धूप में सिर में तेल लगाती नानी की गोरी गोरी उंगलियों का स्नेहिल स्पर्श है, जादूगर नाना का मिश्री घुला लाड़ है, सनातन का वह दांपत्य जीवन है, जहां प्रेम के जलते दिए मन के भीतर के तमस को तोड़ते हैं और पति की प्राथमिकता बनने की पत्नी की मीठी संतुष्टि ही श्रृंगार बन इठलाती है, कन्यादान करते भाई में दिवंगत पिता की छवि का अवलोकन और भाभी का प्रेम है। साथ ही महानगर की सड़कों पर सामान बेचने वालों के प्रति संवेदना भी है।
परिष्कृत भाषा, नवीन उपमाओं एवं मुहावरों का सार्थक प्रयोग अर्थगंभीर्य, चित्रात्मकता तथा सहजता से परिपूर्ण अंदाज़ेबयां आकर्षक है। दिवंगत पिता की स्मृति की कितने भावों का ज्वार लिए यह अभिव्यक्ति कैसी मर्मस्पर्शी है -'जब बहुत याद आते हो तुम, तो तुम्हारी चप्पल पहन लेती हूं, बिखरते-बिखरते संभल जाती हूं'
अपूर्वा के प्रथम काव्य संग्रह का कैनवस ऊपर से देखने में भले ही सीमित लगता हो पर इसमें चित्रित भाव -जगत नारी जीवन की परिधि को पार कर संवेदनशील प्राणी की शाश्वत भावनाओं का गीत बन जाता है जिसकी धुन पाठक के हृदय में देर तक गूंजती रहती है। प्रेम, परिवार और रिश्तों की सुंदरता और महत्व को प्रतिष्ठित करती ये कविताएं वामपंथी वोकिज़्म के कुचक्र को तोड़ती हैं। अपनी जमीन से उखड़ते व्यावसायिक एवं शुष्क ग्लोबलाइजेशन के इस वर्तमान युग में भारतीय संस्कृति के सरस सौंदर्य, संस्कार और परिष्कार की नींव परिवार प्रेम और रिश्तों के महत्व को दृढ़ता से प्रतिष्ठित करता अपूर्वा का यह प्रथम काव्य संग्रह अनुभूति की उदात्तता व गहराई और उत्कृष्ट कलात्मकता के कारण निश्चित रूप से स्वागत योग्य है।
डॉ विदुषी भारद्वाज
सेवानिवृत्त प्राचार्य
आर बी डी गर्ल्स पी जी कॉलेज
बिजनौर (उप्र)