कमजोर मॉनसून के बाद अल नीनो का खतरा: रबी की फसलों पर संकट, सर्दियों में बढ़ेगी गर्मी

भारत में 2026 के मॉनसून में सामान्य से 13% कम बारिश हुई। अल नीनो, बढ़ते तापमान, घटती मिट्टी की नमी और कम जल भंडारण से रबी की फसलों, किसानों और खाद्य उत्पादन पर संकट बढ़ने की आशंका है;

Update: 2026-10-18 08:22 GMT

Changing Winters, Shrinking Grains: The Growing Climate Crisis Facing India's Wheat and the Challenge to Food Security

कमज़ोर मॉनसून के बाद अल नीनो की मार, रबी की फसलों पर बढ़ा खतरा

भारत में 13% कम मॉनसूनी बारिश से खेती पर दबाव, अल नीनो से रबी की फसल और जल संकट का खतरा

इस साल सामान्य से 13% कम बारिश, सर्दियों में भी गर्मी बढ़ने का अनुमान। कम मिट्टी की नमी और घटते जल भंडार से खेती पर दबाव बढ़ने की आशंका।

नई दिल्ली, 18 अक्तूबर 2026. भारत में 2026 का मॉनसून कम बारिश के साथ विदा हुआ है। जून से सितंबर के बीच देश में सामान्य से 13% कम बारिश दर्ज की गई। क्लाइमेट ट्रेंड्स की 16 अक्टूबर को जारी रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले दस वर्षों में यह सबसे कमजोर मॉनसून रहा। अब चिंता आने वाली सर्दियों और रबी की फसलों को लेकर है। प्रशांत महासागर में विकसित हो रहा अल नीनो बारिश की कमी के साथ तापमान बढ़ने का जोखिम भी बढ़ा सकता है।

रिपोर्ट के मुताबिक, अक्टूबर से दिसंबर 2026 के दौरान अल नीनो के 1950 के बाद सबसे शक्तिशाली घटनाओं में शामिल होने की 83% संभावना है। इसके फरवरी 2027 तक बने रहने की भी आशंका जताई गई है। इसका असर अगले साल तक महसूस किया जा सकता है।

कम बारिश का असर तापमान में भी दिखा है। रिपोर्ट के अनुसार, अगस्त 2026 भारत में 1901 के बाद सबसे गर्म अगस्त रहा। सितंबर भी रिकॉर्ड में पाँचवाँ सबसे गर्म सितंबर दर्ज किया गया। तेलंगाना, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र में सूखे की घोषणा की गई है। महाराष्ट्र के 75% हिस्से में सूखे की स्थिति घोषित होने से खेती और पानी की उपलब्धता को लेकर चिंता बढ़ी है।

मॉनसून की एक और बड़ी समस्या बारिश का असमान बँटवारा रहा। कई इलाकों में कुल बारिश कम हुई, लेकिन जहाँ बारिश हुई, वहाँ भारी बारिश की घटनाएँ भी देखने को मिलीं।

स्काईमेट वेदर के उपाध्यक्ष महेश पलावत के मुताबिक, मॉनसून की प्रणालियों का व्यवहार बदल रहा है। कम दबाव वाली प्रणालियाँ सामान्य से अधिक समय तक जमीन पर ठहर रही हैं और नमी की लगातार आपूर्ति के कारण अपनी ताकत बनाए रख रही हैं। उनके अनुसार, इससे अत्यधिक बारिश और बादल फटने जैसी स्थितियों में बढ़ोतरी हुई है, जो पहले कम देखने को मिलती थीं।

पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में बारिश की कमी 25.6% रही। इस क्षेत्र में जून से सितंबर के बीच 1,017.1 मिलीमीटर बारिश हुई, जबकि सामान्य बारिश 1,367.3 मिलीमीटर है। रिपोर्ट इसे 1901 के बाद इस क्षेत्र का सबसे कम मॉनसूनी वर्षा स्तर बताती है। पिछले दस वर्षों में नौ बार इस क्षेत्र में सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई।

असम के 35 में से 22 जिलों में बारिश की कमी रही। अरुणाचल प्रदेश के 16 में से 12 जिलों और मेघालय के 11 में से 10 जिलों में भी कम बारिश दर्ज की गई। बिहार के 38 में से 33 जिलों में बारिश सामान्य से कम रही।

दक्षिणी प्रायद्वीप में भी स्थिति चिंताजनक रही। यहाँ सामान्य 716 मिलीमीटर के मुकाबले 542 मिलीमीटर बारिश हुई। यह 1901 के बाद चौथा सबसे कम मॉनसूनी वर्षा स्तर है। कर्नाटक में बारिश की कमी 30%, केरल में 28%, आंध्र प्रदेश में 25% और तमिलनाडु में 20% रही।

इसके उलट, मध्य और उत्तर-पश्चिम भारत में बारिश लगभग सामान्य रही। भारत मौसम विज्ञान विभाग के पूर्व महानिदेशक डॉ. के. जे. रमेश के अनुसार, इस साल 14 कम दबाव वाली प्रणालियाँ बनीं, जिनसे कुल 77 दिन तक कम दबाव की स्थिति रही। ये प्रणालियाँ बंगाल की खाड़ी में नहीं बनी थीं, बल्कि पश्चिमी प्रशांत महासागर में बनी प्रणालियों के अवशेष थीं। इनका प्रभाव मुख्य रूप से मध्य और उत्तर-पश्चिम भारत तक सीमित रहा।

डॉ. रमेश ने कहा कि जलवायु परिवर्तन अल नीनो को जन्म नहीं देता, लेकिन पहले से गर्म हो चुके वातावरण में उसके प्रभावों को और तीव्र कर सकता है। भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान के जलवायु वैज्ञानिक और आईपीसीसी के प्रमुख लेखक डॉ. रॉक्सी मैथ्यू कोल ने भी कहा कि जलवायु परिवर्तन तापमान की पृष्ठभूमि को गर्म कर रहा है। उनके मुताबिक, जंगलों की कटाई जैसे स्थानीय और क्षेत्रीय भूमि उपयोग में बदलाव अल नीनो के प्रभावों को और बढ़ा सकते हैं। इसका असर मॉनसून की बारिश के अलावा समुद्री हीटवेव, मिट्टी की नमी, अगली फसल और पानी की उपलब्धता पर भी पड़ सकता है।

खेती पर इसका असर खरीफ की बुवाई के आँकड़ों में भी दिख रहा है। कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के आँकड़ों के मुताबिक, 5 अक्टूबर 2026 तक पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले धान की बुवाई का रकबा 15.56 लाख हेक्टेयर घटा है। तेलंगाना, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में धान का रकबा कम हुआ है। गन्ने और कपास के रकबे में भी गिरावट दर्ज की गई, जबकि दलहन और तिलहन का रकबा बढ़ा।

सेंटर फॉर सस्टेनेबल एग्रीकल्चर के कार्यकारी निदेशक डॉ. जी. वी. रामंजनेयुलु के मुताबिक, किसानों के सामने समस्या सिर्फ कम बारिश की नहीं, बल्कि बारिश के असमान वितरण, देर से शुरुआत और लंबे सूखे अंतराल की भी है। फसलें आम तौर पर करीब एक सप्ताह तक के सूखे अंतराल को सह सकती हैं, लेकिन इसके बाद मिट्टी में नमी कम पड़ने लगती है। बारिश कम होने से भूजल का पुनर्भरण भी प्रभावित होता है और सिंचाई पर निर्भरता बढ़ती है।

उन्होंने कहा कि किसानों को धान जैसी ज्यादा पानी माँगने वाली फसलों पर निर्भरता घटाकर कम अवधि वाली दलहन, तिलहन और मोटे अनाज की ओर विविधीकरण पर विचार करना चाहिए। मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ाने से पानी रोकने की क्षमता बेहतर हो सकती है और फसलें सूखे अंतराल को अधिक समय तक सह सकती हैं।

पानी की उपलब्धता को लेकर चिंता जलाशयों के आँकड़ों से भी सामने आती है। केंद्रीय जल आयोग के मुताबिक, 8 अक्टूबर 2026 को देश के 178 जलाशयों में उपलब्ध जीवित जल भंडारण पिछले साल की इसी अवधि का 78.71% और सामान्य भंडारण का 87.08% था। दक्षिणी क्षेत्र में भंडारण सामान्य स्तर का केवल 47.22% था। उत्तरी क्षेत्र में यह 58.63% रहा।

अब अगली चुनौती सर्दियों की है। भारत मौसम विज्ञान विभाग के पूर्वानुमान के अनुसार, अल नीनो के साल के अंत तक चरम पर पहुँचने के साथ आगामी सर्दियों में देश के अधिकांश हिस्सों में सामान्य से कम बारिश होने की आशंका है। इससे दिन और रात, दोनों के तापमान सामान्य से ऊपर रह सकते हैं।

महेश पलावत के मुताबिक, अल नीनो और वैश्विक तापवृद्धि का संयुक्त असर आने वाले महीनों में तापमान के नए रिकॉर्ड बनने की आशंका बढ़ाता है। उन्होंने कहा कि अगस्त पहले ही रिकॉर्ड गर्म रहा है और 2026 तथा 2027 इस दशक के सबसे गर्म वर्षों में शामिल हो सकते हैं।

रिपोर्ट में डॉ. के. जे. रमेश ने आशंका जताई है कि गर्मी इस बार फरवरी में ही दस्तक दे सकती है। जलाशयों में कम भंडारण, घटता भूजल और मिट्टी में नमी की कमी रबी तथा उसके बाद की गर्मियों वाली फसलों पर सीधा असर डाल सकती है। केंद्र सरकार ने 2026-27 के लिए कुल खाद्यान्न उत्पादन का लक्ष्य 37.393 करोड़ टन रखा है, जो 2025-26 के अनुमानित उत्पादन से 26.3 लाख टन कम है।

क्लाइमेट ट्रेंड्स की निदेशक आरती खोसला के मुताबिक, अल नीनो पहले से गर्म होती जलवायु के ऊपर अपना असर दिखा रहा है, जिससे आने वाले महीनों में तापमान के रिकॉर्ड टूटने की आशंका बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि अब गर्मी को किसी एक असाधारण घटना की तरह देखने के बजाय लगातार बढ़ते जोखिम के रूप में लेकर तैयारी करनी होगी। इसके लिए शुरुआती चेतावनी प्रणालियों, हीट एक्शन प्लान, सार्वजनिक स्वास्थ्य तैयारियों और स्थानीय स्तर पर जोखिम से निपटने की क्षमता को मजबूत करना ज़रूरी है।

रिपोर्ट आईपीसीसी के आकलन का हवाला भी देती है। इसके मुताबिक, उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में अल नीनो और जलवायु परिवर्तन का संयुक्त असर खेती के जोखिम बढ़ा सकता है। 2050 तक दोनों के मिले-जुले प्रभाव से वैश्विक फसल पैदावार आधार स्थिति के मुकाबले 10 से 25% तक घट सकती है। भारत को भी सबसे अधिक जोखिम वाले देशों में शामिल किया गया है।

कमज़ोर मॉनसून का असर अब केवल बारिश के आँकड़ों तक सीमित नहीं है। मिट्टी की नमी, भूजल, जलाशयों, सर्दियों के तापमान और अगली फसल का जोखिम एक-दूसरे से जुड़ रहा है। आने वाले महीनों में इन मोर्चों पर तैयारी यह तय करने में अहम होगी कि बारिश की कमी का बोझ किसानों, खाद्य उत्पादन और पानी की उपलब्धता पर कितना पड़ता है ।

डॉ. सीमा जावेद

पर्यावरणविद & कम्युनिकेशन विशेषज्ञ

FAQs

1. अल नीनो क्या है और इसका भारत की खेती पर क्या असर पड़ता है?

अल नीनो प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय क्षेत्र में समुद्र की सतह के तापमान में असामान्य वृद्धि से जुड़ी जलवायु घटना है। यह भारतीय मॉनसून को प्रभावित कर सकता है और कुछ परिस्थितियों में बारिश की कमी, मिट्टी की नमी घटने तथा सिंचाई की जरूरत बढ़ने का जोखिम पैदा करता है।

2. 2026 में भारत में मॉनसून की बारिश कितनी कम हुई?

क्लाइमेट ट्रेंड्स की 16 अक्टूबर 2026 को जारी रिपोर्ट के मुताबिक, जून से सितंबर के बीच भारत में सामान्य से 13% कम मॉनसूनी बारिश दर्ज की गई। रिपोर्ट इसे पिछले दस वर्षों का सबसे कमजोर मॉनसून बताती है।

3. कमजोर मॉनसून और अल नीनो से रबी की फसलों पर क्या असर पड़ सकता है?

कम मॉनसूनी बारिश से मिट्टी की नमी और भूजल पुनर्भरण प्रभावित हो सकते हैं। अल नीनो के कारण सर्दियों में तापमान बढ़ने और बारिश कम होने की स्थिति में गेहूँ, चना, सरसों तथा अन्य रबी फसलों को नुकसान का जोखिम बढ़ सकता है। वास्तविक असर क्षेत्र, सिंचाई की उपलब्धता और मौसम की परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।

4. क्या अल नीनो के कारण भारत में सर्दियाँ गर्म हो सकती हैं?

हाँ, कुछ परिस्थितियों में अल नीनो भारतीय सर्दियों के तापमान और वर्षा के पैटर्न को प्रभावित कर सकता है। 2026-27 की सर्दियों में सामान्य से अधिक तापमान और कम बारिश की आशंका जताई गई है। हालाँकि, इसका प्रभाव सभी क्षेत्रों में एक जैसा होना जरूरी नहीं है।

5. कमजोर मॉनसून का किसानों और खाद्य उत्पादन पर क्या असर होगा?

कम बारिश, लंबे शुष्क अंतराल और घटती मिट्टी की नमी से फसलों की वृद्धि प्रभावित हो सकती है। सिंचाई की लागत बढ़ने, उपज घटने और बुवाई का रकबा कम होने का जोखिम भी रहता है। इसका असर खाद्य आपूर्ति और किसानों की आय पर पड़ सकता है।

6. कम बारिश से भारत के जलाशयों और भूजल पर क्या असर पड़ा है?

केंद्रीय जल आयोग के अनुसार, 8 अक्टूबर 2026 को देश के 178 जलाशयों में जीवित जल भंडारण पिछले वर्ष की समान अवधि का 78.71% और सामान्य भंडारण का 87.08% था। दक्षिणी क्षेत्र में यह सामान्य स्तर का केवल 47.22% था। कम पुनर्भरण से सिंचाई और घरेलू जल उपलब्धता पर दबाव बढ़ सकता है।

7. किसान कमजोर मॉनसून और बढ़ती गर्मी से बचाव के लिए क्या कर सकते हैं?

किसान स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्रों की सलाह के अनुसार कम अवधि वाली दलहन, तिलहन और मोटे अनाज की उपयुक्त किस्मों पर विचार कर सकते हैं। मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ाना, वर्षा जल संचयन, खेत में नमी संरक्षण और उपलब्ध पानी का कुशल उपयोग भी जोखिम कम करने में मदद कर सकते हैं।

8. क्या जलवायु परिवर्तन अल नीनो को जन्म देता है?

अल नीनो एक प्राकृतिक जलवायु प्रक्रिया है। जलवायु परिवर्तन सीधे इसका कारण नहीं है, लेकिन वैश्विक तापवृद्धि पहले से गर्म वातावरण में गर्मी और अन्य चरम मौसमी प्रभावों के जोखिम को बढ़ा सकती है। दोनों के संयुक्त प्रभाव क्षेत्र और मौसम के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं।

9. क्या कमजोर मॉनसून के कारण 2027 में गर्मी जल्दी शुरू हो सकती है?

कुछ मौसम विशेषज्ञों ने फरवरी 2027 से ही गर्मी बढ़ने की आशंका जताई है। कमजोर मॉनसून, कम मिट्टी की नमी, घटते जल भंडार और अल नीनो की परिस्थितियाँ गर्मी के प्रभावों को गंभीर बना सकती हैं। हालांकि, वास्तविक स्थिति का आकलन मौसम विभाग के ताजा पूर्वानुमानों से करना चाहिए।

10. कमजोर मॉनसून और अल नीनो के बारे में आधिकारिक जानकारी कहाँ मिलेगी?

भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD), केंद्रीय जल आयोग (CWC), कृषि एवं किसान कल्याण विभाग और भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (IITM) के आधिकारिक बुलेटिन तथा रिपोर्ट मौसम, जल भंडारण और कृषि संबंधी जोखिमों की जानकारी के लिए उपयोगी स्रोत हैं।

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