जानिए क्यों मनाया जाता है राष्ट्रीय दुग्ध दिवस? ‘मिल्कमैन ऑफ इंडिया’ डॉ. वर्गीज़ कुरियन की कहानी जिसने भारत को डेयरी महाशक्ति बनाया
26 नवंबर को भारत में National Milk Day क्यों मनाया जाता है? जानिए ‘मिल्कमैन ऑफ इंडिया’ डॉ. वर्गीज़ कुरियन की श्वेत क्रांति, ऑपरेशन फ्लड और उनकी विरासत की पूरी कहानी।

‘मिल्कमैन ऑफ इंडिया’ डॉ. वर्गीज़ कुरियन की कहानी जिसने भारत को डेयरी महाशक्ति बनाया
जानिए कौन थे डॉ. वर्गीज़ कुरियन? — एक दूरदर्शी, जिसने भारत की किस्मत बदली
- 26 नवंबर को ‘राष्ट्रीय दुग्ध दिवस’ मनाने का क्या है इतिहास?
- दुनिया की सबसे बड़ी डेयरी क्रांति ऑपरेशन फ्लड की कहानी
- अमूल और सहकारिता मॉडल: कैसे छोटे किसानों की बदली तक़दीर?
- डॉ. कुरियन को मिले सम्मान — देश ही नहीं दुनिया ने सराहा
- आधुनिक भारत में डेयरी सेक्टर की भूमिका: रोज़गार से लेकर आत्मनिर्भरता तक
- क्यों आज भी प्रासंगिक है कुरियन का ‘बिलियन-लीटर आइडिया’?
दूध से बदलाव तक—कुरियन की विरासत सदाबहार
नई दिल्ली, 26 नवंबर 2025. भारत भूमि ने कई क्रांतियाँ देखी हैं—हरित क्रांति (green Revolution), औद्योगिक क्रांति, सूचना क्रांति—लेकिन एक क्रांति ने गाँवों की कच्ची गलियों से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों तक भारत की तस्वीर बदल दी। यह थी श्वेत क्रांति, और इसके जनक थे डॉ. वर्गीज़ कुरियन, जिनका जन्म 26 नवंबर 1921 को केरल के कोझीकोड में हुआ था। इसीलिए यही तारीख हर साल राष्ट्रीय दुग्ध दिवस (National Milk Day) के रूप में मनाई जाती है। श्वेत क्रांति ने न केवल दूध उत्पादन बढ़ाया, बल्कि महिलाओं को सशक्त बनाया और उन्हें आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने का अवसर दिया।
डॉ. वर्गीज़ कुरियन: एक वैज्ञानिक के साथ-साथ एक समाज-निर्माता
डॉ. कुरियन का जीवन इस बात का जीता जागता प्रमाण है कि दूरदर्शी सोच और सामाजिक प्रतिबद्धता मिलकर किस तरह पूरे देश का भाग्य बदल सकती है। वे सिर्फ एक इंजीनियर नहीं थे बल्कि वे एक मिशन पर थे कि भारत को दूध के लिए किसी देश पर निर्भर न रहना पड़े।
क्यों मनाया जाता है राष्ट्रीय दुग्ध दिवस National Milk Day?
26 नवंबर 1921 को जन्मे डॉ. कुरियन को देश ‘The Milkman of India’ कहकर याद करता है। उन्होंने भारत के कोने-कोने में उन किसानों को संगठित किया, जिनकी मेहनत का सही दाम उन्हें कभी नहीं मिलता था।
डॉ. कुरियन की याद में 2014 से भारत सरकार ने 26 नवंबर को राष्ट्रीय दुग्ध दिवस के रूप में मनाना शुरू किया।
ऑपरेशन फ्लड : जिसने भारत को सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश बना दिया
60 के दशक के अंत में शुरू हुआ ऑपरेशन फ्लड सिर्फ एक परियोजना नहीं थी, यह ग्रामीण भारत की एक नई सुबह थी।
यह योजना 25 वर्षों तक चली
1700 करोड़ रुपए का निवेश हुआ
नतीजतन भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक बन गया
डेयरी सेक्टर आज भारत की GDP में 5.3% का योगदान देता है – छोटी बात नहीं! डेयरी उद्योग भारतीय अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है, जो लाखों लोगों को रोजगार प्रदान करता है और ग्रामीण विकास को गति देता है।
यह दुनिया का सबसे बड़ा कृषि विकास कार्यक्रम माना गया और इसे कहा गया "Billion-Litre Idea"—यानी एक अरब लीटर दूध का सपना, जिसे डॉ. कुरियन ने पूरा कर दिखाया।
अमूल और सहकारिता : किसानों की ताकत
सिर्फ एक ब्रांड नहीं, एक आंदोलन है अमूल।
डॉ. कुरियन ने अमूल को किसानों के स्वामित्व वाली सहकारी संस्था के रूप में विकसित किया, जहाँ मुनाफ़ा सीधे उन लाखों परिवारों के पास पहुँचा जो रोज़ सुबह गाय-भैंस का दूध निकालकर केंद्र तक पहुँचाते थे।
अमूल मॉडल ने दिखाया कि किसानों को मालिक बनाकर, ग्रामीण भारत को आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है।
डॉ. वर्गीज़ कुरियन को मिले सम्मान और उपलब्धियाँ
डॉ. वर्गीज़ कुरियन की क्रांतिकारी सोच ने उन्हें देश-विदेश के सर्वोच्च पुरस्कार दिलाए—
1965 मों पद्म श्री और 1966 में पद्म भूषण तथा 1999 में पद्म विभूषण से नवाजा गया। उन्हें रेमन मैग्सेसे अवॉर्ड, वर्ल्ड फूड प्राइज़ से भी सम्मानित किया गया।
किसानों के हित में डेयरी से आगे विस्तृत काम
कुरियन ने सिर्फ दूध तक सीमित नहीं रहे। उन्होंने ‘धारा’ ब्रांड लॉन्च कर खाद्य तेल कारोबार में क्रांति ला दी। दिल्ली में फलों–सब्जियों के लिए सप्लाई चेन मॉडल तैयार की।
ग्रामीण प्रबंधन के लिए विश्वस्तरीय संस्थान IRMA की स्थापना की। NDDB (राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड) की स्तापना की।
उन्होंने गुजरात को-ऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन (GCMMF) का 1973 से 2006 तक नेतृत्व किया। कुरियन का दृष्टिकोण बहुआयामी था, वे सिर्फ दूध उत्पादन तक सीमित नहीं थे, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था के समग्र विकास के लिए प्रयासरत थे।
आज भी कितनी प्रासंगिक है कुरियन की विरासत?
कुरियन कहते थे—
“इस देश की सबसे बड़ी पूँजी यहाँ के लोग हैं।”
उनका बनाया सहकारी मॉडल आज भी भारत के लाखों किसानों की आय और सम्मान की रीढ़ है।
देश में डेयरी उद्योग सबसे बड़ा ग्रामीण रोजगार प्रदाता बन चुका है—यह उनकी सोच की जीत है।
दूध से आत्मनिर्भरता तक
9 सितंबर 2012 को 90 वर्ष की आयु में डॉ. कुरियन इस दुनिया से विदा हो गए।
मगर उनकी विरासत आज भी हर घर तक पहुँचती है—दूध के हर गिलास, हर पैकेट, हर डेयरी किसान की मुस्कान में।
इसीलिए 26 नवंबर के दिन हम सिर्फ दूध नहीं, बल्कि एक दूरदर्शी भारतीय के सपने और संघर्ष को सलाम करते हैं।


