इच्छा मृत्यु (Euthanasia) का कानूनी और मानवीय द्वंद्व

मौन की भाषा: जब रोगी की इच्छा दर्ज ही नहीं होती

परिवार, अर्थव्यवस्था और निर्णय का दबाव

चिकित्सा तंत्र और नैतिकता का संघर्ष

‘सम्मानजनक मृत्यु’ या छिपी हुई हत्या?

यह कविता “निजात” इच्छा मृत्यु (Euthanasia), पारिवारिक दबाव, और रोगी की अनसुनी इच्छा के बीच के गहरे नैतिक संकट को उजागर करती है। यह प्रश्न उठाती है कि क्या हर ‘सम्मानजनक मृत्यु’ वास्तव में सम्मानजनक होती है?

निजात

वो उसे विदा कर रहे थे

घर से;

चंदन का टीका लगाकर।

पर चंदन

माथे पर

नीला पड़ गया;

जैसे किसी भुजंग का ज़हर

घुल गया हो चंदन में,

झप्प से बुझा देने को

उसकी साँसें।

डॉक्टरों की एक टीम तैयार थी।

याचिका- माँ-बाप की,

आदेश- अदालत का।

पैसिव यूथेनेशिया।

इच्छा मृत्यु।

पर उसकी इच्छा?

कहीं दर्ज नहीं।

घर छूटते वक़्त

वो पलकों से

कुछ कह रहा था;

बार-बार।

पर भाषा ने साथ नहीं दिया,

और जो समझ सकते थे

इशारे;

वो नज़रअंदाज़ कर रहे थे।

उसे पहले कभी

अपनों के बीच

कोई डर नहीं लगा;

अनंत में खो जाने का भी नहीं।

शायद इसलिए

तेरह बरस तक

हर दिन, हर पल

वो कसे रहा

साँसों की डोर;

बदन पर ज़ोर लगाकर।

नील पड़ गए थे

भीतर तक;

पर उसने

विदा नहीं माँगी।

पर उनके लिए

यह सब महँगा था;

इतना

कि क़ीमत चुकाने में

सब चला गया;

घर,

ज़मीन,

ज़ेवर,

जायदाद।

अब जो बचा है,

बस इतना ही है;

कि वो

ख़ुद को ओढ़ लें।

फ़ैसला साफ़ है।

अचानक

मंजर बदल गए हैं;

भावनाओं पर

वास्तविकता की

चोट करारी है

पहली बार

वो अपनों से

डरा हुआ है

बिस्तर पर पड़ा वो

शायद

बदलना चाहता है

सबका फ़ैसला।

पर हर तरफ़

शोर है;

बहस,

तर्क,

और उनसे थकी-ऊबी

ज़िंदगियाँ;

किसी भी क़ीमत पर

राहत चाहती हैं।

उसकी जद्दोजहद से

बेख़बर लोग

निजात माँग रहे हैं।

इसलिए

तमाम तर्कों के बिछौने पर

लिटाकर

उसे धकेल दिया गया है

धीरे-धीरे

मौत की ओर।

सुना है;

अब मशीनें बंद कर दी गई हैं,

उसे पानी देना

रोक दिया गया है।

जिस कमरे में वो है,

वहाँ सिर्फ़

इंतज़ार बिछा है।

जिस रोज़ भी

मौत उसे झपट लेगी;

सब कुछ

सम्मानजनक हो जाएगा।

यह;

हत्या भी।

डॉ कविता अरोरा