स्मृतियों के उजास में भीगता मन : ‘स्मृति नाद’ का स्पर्श

  • कविता और जीवन का अंतर्संबंध: अपूर्वा का दार्शनिक दृष्टिकोण
  • घर, स्मृति और विस्थापन: प्रवासी मन की अकुलाहट
  • पिता का जाना: शोक, रिक्तता और स्मृति का भूगोल
  • निर्जीव वस्तुओं में जीवंत स्मृतियाँ: बिंबों की मार्मिकता
  • माँ, नानी और ननिहाल: स्नेह की शाश्वत उपस्थिति
  • प्रेम की सूक्ष्म अभिव्यक्तियाँ: व्यवहार में उजास
  • सामाजिक यथार्थ और संघर्ष: आम जनजीवन का दस्तावेज़
  • प्रकृति, समय और जीवन-दर्शन: कविताओं की दार्शनिक परतें
  • भाषा की सरलता और संवेदना की गहराई: काव्य की शक्ति

‘स्मृति नाद’ : स्मृतियों के सहारे जीवन को अर्थ देने की कोशिश

‘स्मृति नाद' नामक काव्य संग्रह अपूर्वा की पहली पुस्तक है, जिसे पढ़ना अत्यंत आत्मीय अनुभव रहा है। अपूर्वा ने ‘अपनी बात‘ के माध्यम से कविता और जीवन के अंतर्संबंधों को जिस दार्शनिक गहराई से परिभाषित किया है, वह सराहनीय है। उन्होंने बहुत खूबसूरती से इस धारणा को तोड़ा है कि प्रेम, परिवार और घर केवल 'निजी' विषय हैं। वे इसे सामूहिक स्मृतियों का हिस्सा मानती हैं, जो एक अकेले व्यक्ति की पीड़ा को व्यापक सामाजिक संदर्भ प्रदान करता है। घर के प्रति उनका दृष्टिकोण केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक है। घर की स्मृतियों की अकुलाहट प्रवासी जीवन की उस टीस को जीवंत कर देती है, जहाँ व्यक्ति भौतिक रूप से कहीं और होता है पर मानसिक रूप से अपनी जड़ों में बसता है।

हॉस्टल जीवन का वर्णन इस विस्थापन को और भी प्रखर बनाता है। उनका कविता को 'एस्केपिज्म' (पलायनवाद) न मानकर शरण मानना एक सशक्त विचार है, जो संसार की आंतरिक टूट-फूट के बीच एक मरहम की तरह कार्य करता है।

अपूर्वा का यह संग्रह कुल 45 कविताओं का एक सुंदर संगम है, जिसमें जीवन के विभिन्न पहलुओं और रंगों को बड़ी बारीकी से उकेरा गया है। यह संग्रह केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि जीवन के विविध अनुभवों की एक जीवंत यात्रा है। उनकी शैली में एक ठहराव और परिपक्वता नज़र आती है उनके पास जीवन के खट्टे-मीठे अनुभवों का एक विशाल खजाना है। रचनाएँ ऐसी हैं कि पढ़ते समय पाठक स्वतः ही उन अनुभूतियों से जुड़ जाता है।

‘पीछे छूट जाता है‘ यह कविता विछोह और स्मृतियों का एक मर्मस्पर्शी कोलाज है। 'पीहर का अंगना' और 'प्रतीक्षारत चाय का कप' जैसे बिम्ब उस खालीपन को जीवंत कर देते हैं, जो किसी के जाने के बाद घर में पसर जाता है।खिड़की का मनी-प्लांट ,अलमारी में रखी राखी या भाभी के ठहाके हों,यह रचना केवल घर छोड़ने की पीड़ा नहीं, बल्कि पीछे छूट जाने वाले उन अनगिन अहसासों की कहानी है जो समय के साथ धुंधले तो होते हैं, पर कभी खत्म नहीं होते।

लेखिका ने पिता के जाने को केवल एक व्यक्ति का `जाना` नहीं, बल्कि पूरे अर्थ-तंत्र और संदर्भों का विखंडन माना है। पिता के साथ और ‘पिता के जाने के बाद‘ की अनुभूतियों और स्मृतियों को उन्होंने बहुत ही भावपूर्ण व्यक्त किया है पितृ -शोक पर आधारित ये कविताएँ केवल अभिव्यक्ति नहीं हैं, बल्कि यह उस रिक्तता का मूर्त साक्षात्कार हैं जो एक ‘पिता के जाने के बाद‘ घर और मन के भूगोल में घटित होती है। पिता अपने बच्चों के लिए सुरक्षा का वह चिरपरिचित कांधा होते हैं, जो केवल शारीरिक सहारा नहीं, बल्कि हर परिस्थिति में जीवन भर साथ चलने वाला अदृश्य बल होता है।

पिता का जाना‘ कविता उस मनोवैज्ञानिक आघात को रेखांकित करती है, जहाँ जीवन के रंग चुनरी से उड़ जाते हैं। लेखिका का यह बिम्ब उनके ‘सर हवा में रह जाते हैं’ पितृ-विहीन बेटियों की असुरक्षा और उस अवलंब के छिन जाने की पराकाष्ठा है, जो उन्हें जमीन से जोड़कर रखता था। ’पिता ! तुम्हारा स्पर्श‘ में वे भावुक होकर लिखती हैं-

“याद आती है

छू लेती हूँ तुम्हारी चीज़ें…लगता है/छू लिया है तुम्हें पिता।”

पिता के दस्ताने' बहुत भावपूर्ण कविता है। यह कविता वस्तु के माध्यम से व्यक्ति की उपस्थिति को सहेजने का अद्भुत उदाहरण है। अलमारी में रखे दस्ताने केवल ऊनी वस्त्र नहीं हैं, वे पिता की ‘ऊष्मा और जिजीविषा’ के संवाहक हैं, जो दर्शाते है कि मृत्यु शरीर को छू सकती है, पर उस 'ऊष्मा' को नहीं जो स्मृतियों की पोरों में समाई है।

चले जाने के बाद रह जाना‘ में लेखिका ने बाहरी दुनिया की निरंतरता और आंतरिक दुनिया की शून्यता के बीच के क्रूर अंतर को पकड़ा है। फूल खिल रहे हैं, अखबार अपनी जगह पर है, चाय का मग भी वही है, दुनिया के लिए सब कुछ 'वैसा ही' है, पर लेखिका के लिए ‘अखबार भी हिचकियाँ लेता है।’ निर्जीव वस्तुओं में चेतना और पीड़ा का यह आरोपण उस मानसिक अवस्था को दर्शाता है जहाँ शोक पूरी प्रकृति को अपने रंग में रंग देता है।

कितना कुछ रह गया’ कविता में अभाव का स्वाद है। मीठी सिवइयां, नवंबर की ठंड, गजक और रेवड़ी ये सब उत्सव के प्रतीक थे, जो पिता के बिना बेस्वाद और फीके हो गए हैं। ‘कोहरे का फ़ेरन‘ पहनकर दिन का आना एक ठिठुरते हुए अकेलेपन का प्रतीक है।

थोड़ा तो रह ही जाता है‘ और ‘कितना कुछ रह गया‘ कविता की खूबसूरती उन सूक्ष्म विवरणों में है, जिन्हें हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं। लेखिका ने केवल भावनाओं की बात नहीं की, बल्कि उन निर्जीव वस्तुओं को जीवंत कर दिया है जो यादों का हिस्सा बन जाती हैं।

`छूट चुकी सड़क पर‘ खोए हुए अपनों की गहरी टीस और मन के अंतद्वंद्व को दर्शाती है। 'बरगद के पेड़' जैसी यादें और 'चाय का कप' मन की उस जिद्द के प्रतीक हैं, जो सत्य जानकर भी स्वीकार नहीं करती।

बेटियाँ, दो ज़िन्दगी जीती हैं‘ एक पिता के साथ और एक पिता के चले जाने के बाद, में रिक्तता का संवेदनशील चित्रण है। छोटी-छोटी यादों में बसा पिता का प्रेम, जीवन की सबसे बड़ी पूँजी बनकर उभरता है। लेखिका ने बेटियों के अंतस में चल रहे द्वंद्व, एक साथ जीना और खोना को बड़ी सरलता से व्यक्त किया है। यह कविता स्मृति, प्रेम और विछोह की गहरी अनुभूति कराती है।

प्रकृति मेरी सखी‘ यह कविता प्रकृति के साथ मानवीय अंतस के गहरे संबंध को अत्यंत कोमलता से अभिव्यक्त करती है। इसमें आसमान, चाँद, बादल और बारिश केवल दृश्य नहीं, बल्कि सहचर बनकर उभरते हैं, जो हर परिस्थिति में आश्वस्त करते हैं।

लेखिका ने प्रकृति को अपना मानकर जीवन की आशा, संघर्ष और सुकून को रूपायित किया है। निराशा के क्षणों में भी प्रकृति का स्नेह संबल देता है। यही भाव इस रचना को आत्मीय और स्पंदित बना देता है।

`संघर्ष` कविता साधारण जनजीवन के मौन दर्द और श्रम को प्रभावी ढंग से चित्रित करती है। फुटपाथ पर हेलमेट बेचता लड़का, सूखी रोटी और हरी मिर्च में लिपटा उसका भोजन, काम करते लोग, बूढ़ा मोची, और छोटी बच्ची के माध्यम से सामाजिक असमानता उजागर होती है। सशक्त बिंब और सरल भाषा कविता को जीवंत बनाते हैं। इस रचना से स्पष्ट होता है कि रोज़मर्रा का संघर्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण और मार्मिक होता है, जितना किसी बड़े युद्ध का संघर्ष।

'बुलबुले सा समय' यह कविता समय की क्रूरता और जीवन की नश्वरता का एक अत्यंत मर्मस्पर्शी चित्रण है। पिता को खोने का व्यक्तिगत शोक यहाँ एक दार्शनिक गहराई ले लेता है, जहाँ 'कलाई पर बँधी घड़ी' और 'समय के बंधन' के बीच का विरोधाभास हमें अपनी बेबसी का अहसास कराता है। कविता की सबसे सुंदर बात इसकी जिजीविषा है। लेखिका जीवन को एक 'बुलबुले' सा क्षणभंगुर मानते हुए भी, उसी अल्प समय में अपना 'घरौंदा' बनाने का संकल्प लेता है। यह हार न मानने का जज्बा ही इस रचना को केवल एक शोक-गीत नहीं, बल्कि एक प्रेरणादायक स्वीकारोक्ति बनाता है।

सपनों से लदा मन

'माँ बोती रही खुशबुएँ’ और माँ और दर्पण: एक संवाद’ यह कविताएँ माँ की स्मृतियों और उनके स्नेह की अनंत उपस्थिति को बेहद कोमलता से व्यक्त करती हैं।

खुशबुओं और अगरबत्तियों के प्रतीक के माध्यम से लेखिका ने यादों की गहराई को जीवंत बना दिया है। अछोर संभावनाओं/ जलती हुई असंख्य लालटेन जैसे सुन्दर बिम्ब मन मोहते हैं। समय बीतने पर भी माँ का वही स्नेहिल रूप मन में जस का तस बना रहता है। जीवन में माँ की बोई खुशियों की खुशबू जीवन भर साथ रहती है और कभी फीका नहीं पड़ती है।

घर पर आधारित दो कविताएँ हैं। 'घर : एक’ में घर की परिभाषा बहुत दार्शनिक है। यहाँ घर एक अजेय भावना है। जब सब कुछ छूट जाता है, तब भी जो भीतर शेष रह जाता है, वह घर है। 'घर : दो’ स्मृतियों का एक खूबसूरत कोलाज है। यहाँ घर की खुशबू माँ की सिल्क साड़ियों में है और सुकून पिता के स्वेटर की गर्माहट में। हडसन लेन की किसी तीसरी मंजिल पर बैठा व्यक्ति जब अपनी खिड़कियाँ खोलता है, तो वह भौतिक खिड़की नहीं, बल्कि यादों का झरोखा होता है जो उसे अपने मूल से जोड़ता है। पहली कविता घर को एक शाश्वत सत्य मानती है, तो दूसरी उसे बचपन की सुनहरी यादों का पर्याय। दोनों ही कविताएँ हृदय को एक मीठी सी टीस और सुकून से भर देती हैं।

संग्रह में प्रेम पर तीन कविताएँ हैं। तीनों कविताएँ प्रेम के सूक्ष्म, मौन और गहरे रूप को अत्यंत संवेदनशीलता से व्यक्त करती हैं। कहीं वह ' सेफ्टी पिन' जैसी छोटी सावधानी में झलकता है, तो कहीं 'हथेलियों के स्पर्श' से अंतस की फुलवारी सींचता और तमस को तोड़ता है। स्मृतियों में डूबता-उतरता प्रेम मन को बार-बार नए भावों से भर देता है। इन पंक्तियों में प्रेम कोई प्रदर्शन नहीं, बल्कि देखभाल, स्नेह और आत्मीय उपस्थिति का नाम है, जहाँ प्रिय का होना ही जीवन का आधार बन जाता है और भीतर उजास भर देता है। प्रेम का वास्तविक स्वरूप शब्दों से अधिक व्यवहार में प्रकट होता है। ‘मेरे मन की चौखट पर रखे जलते दीये’ जैसे बिम्बों से यह दिखाया है कि प्रेम भीतर की उजास है, जो जीवन की थकान और अँधेरे को धीरे-धीरे दूर करता है। प्रेम को बड़े शब्दों में नहीं, बल्कि जीवन की छोटी-छोटी बातों में ढूँढ़कर उसे अधिक सच्चा और मानवीय बना दिया है। यही इन कविताओं की वास्तविक शक्ति है।

'जीवन डगर (सात्विक के जन्मदिन पर) ' एक अत्यंत स्नेहिल, भावप्रवण और आत्मीय कविता है, जिसमें बाल-मन की निष्कलुषता और सहज उल्लास का सुंदर चित्र उपस्थित हुआ है। नन्हीं हथेलियों से आरंभ होकर यह रचना ममता, स्मृति और आशा के कोमल रंगों में ढलती जाती है। लेखिका ने बच्चे की चंचलता में जीवन-दर्शन खोजते हुए उसे शुभकामनाओं और आशीषों से आलोकित किया है। भाषा सरल होते हुए भी हृदयस्पर्शी है। कहीं-कहीं लय को और संतुलित किया जा सकता है, किंतु समग्रतः यह कविता प्रेम, विश्वास और उज्ज्वल भविष्य की मंगलकामना का मधुर अभिव्यक्ति-पुष्प है।

'बूढ़ी डाइनिंग टेबल' कविता में निर्जीव वस्तुओं में प्राण फूँकने और उनके माध्यम से जीवन की यात्रा को दर्शाने का एक सुंदर प्रयास है। यहाँ डाइनिंग टेबल केवल फर्नीचर का टुकड़ा नहीं, बल्कि परिवार के इतिहास की मौन साक्षी है।

टेबल की 'दरारें' बचपन की यादों और अतीत के ठहाकों को खुद में समेटे हुए हैं। उत्सवों की चमक-धमक और मोमबत्तियों का श्रृंगार उसे एक जीवंत पात्र बना देता है। दाल-चावल के दानों की थिरकन और माँ की उंगलियों का स्पर्श ये छोटी-छोटी बारीकियाँ कविता को बेहद आत्मीय बनाती हैं। कविता का सबसे भावुक मोड़ वह है जब वही पुरानी मेज लेखिका के 'विवाह की वर मालाओं' का भार उठाती है। यह एक पीढ़ी के आगे बढ़ने और घर के बदलते स्वरूप का मार्मिक चित्रण है।

'अस्पताल के पास' कविता संवेदनशीलता और मानवीय करुणा का एक अद्भुत दस्तावेज है। सामान्यतः अस्पताल को हम बीमारी, गंध और उदासी से जोड़ते हैं, लेकिन लेखिका यहाँ एक सकारात्मक बदलाव की कल्पना करती हैं। अस्पताल के पास 'फूल, तितली और दरख्त' की उपस्थिति न केवल वातावरण को सुंदर बनाती है, बल्कि भीतर दबे 'जमा हुए दुःख' को तितली की तरह उड़ाने की शक्ति रखती है। हर प्रिस्क्रिप्शन के साथ एक गुब्बारे की कल्पना बहुत गहरी है। यह संकेत देती है कि चिकित्सा केवल दवाओं से नहीं, बल्कि खुशी और आशाओं के रंगों से भी होनी चाहिए। कतारों में खड़े लोगों के लिए संगीत की पंक्तियाँ 'कहाँ तक ये मन को अंधेरे छलेंगे' एक मानसिक संबल प्रदान करती हैं, जो निराशा के क्षणों में 'मुक्ति' और 'उम्मीद' का मार्ग दिखाती हैं। यह कविता पाठकों को यह सोचने पर मजबूर करती है कि दर्द के समय मनुष्य को दवाओं के साथ-साथ सौंदर्य और संगीत की भी उतनी ही ज़रूरत होती है।

ननिहाल' कविता स्मृतियों के मधुर रस में डूबी एक अत्यंत भावुक रचना है। लेखिका ने 'मिसरी' जैसी दीवारों और 'रेशमी कढ़ाई' वाले मेज़पोश के माध्यम से बचपन की उन अनमोल यादों को सजीव कर दिया है, जहाँ नानी का स्पर्श आज भी महसूस होता है। विशेष रूप से, कविता के अंत में दो काले छतों की तुलना नाना-नानी से करना हृदयस्पर्शी है। जिस प्रकार छाते तेज़ बारिश से बचाते हैं, वैसे ही बुजुर्ग परिवार के रक्षक और आधार होते हैं। यह कविता जड़ों की ओर लौटने की एक सुंदर पुकार है।

नानी की उँगलियाँ ‘यह कविता, पुरानी यादों और सुकून का एक बेहद खूबसूरत कोलाज है। लेखिका ने जिस तरह से घर लौटने की खुशबू और नानी के स्पर्श को शब्दों में पिरोया है, वह सीधे दिल को छू जाता है। 'सुनहरा पानी-सा बनता तेल' और 'मक्खन-सी मुलायम उंगलियाँ' जैसे बिम्ब नानी के लाड़-प्यार को जीवंत कर देते हैं।यह भागदौड़ भरी 'यूनिवर्सिटी लाइफ' और घर के 'ठहराव' के बीच के अंतर को बखूबी दर्शाती है। यह कविता याद दिलाती है कि दुनिया चाहे कितनी भी तेज क्यों न हो जाए, अपनों का स्पर्श और घर की शांति ही हमारा असली ठिकाना है।

'नाना: मेरे जादूगर', दादा-नानी के घर मिलने वाले निस्वार्थ प्रेम और दुलार की एक कोमल अभिव्यक्ति है। यहाँ 'जादूगर' शब्द नाना के उस हुनर को दर्शाता है, जिससे वे कठोर अनुशासन को एक पल में ममता में बदल देते हैं।

बिस्तर पर पाँच-छह तकियों का घेरा बनाना नाना के उस सूक्ष्म प्रेम को दर्शाता है, जहाँ वे अपनी नातिन के आराम के लिए घर का सारा अनुशासन भूल जाते हैं। नानी की साधारण डिब्बी में रखी 'रंग-बिरंगी काँच की चूड़ियाँ' केवल वस्तुएँ नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही स्मृतियों और विरासत का प्रतीक हैं। यह कविता पाठक को बचपन की उन सुनहरी यादों में ले जाती है जहाँ बड़ों का साया हर चिंता से बच्चों को मुक्त रखता था।

कविताओं की सबसे अनूठी विशेषता इनका अकृत्रिम सौंदर्य और सहज संप्रेषणीयता है। लेखिका ने स्वयं को भाषिक जटिलताओं और दुरूह प्रतीकों के मोहजाल से मुक्त रखा है। यहाँ शब्द किसी बौद्धिक प्रदर्शन का माध्यम न होकर, संवेदना के सीधे संवाहक हैं। यही कारण है कि ये रचनाएँ किसी भारी-भरकम शब्दावली की बैसाखी थामे बिना, अपनी सरलता के बल पर ही सीधे पाठक के हृदय-प्रदेश में उतर जाती हैं। यह सरलता ही वास्तव में इस संग्रह की सबसे सघन कलात्मक उपलब्धि है। जहाँ क्लिष्ट शब्दावली अक्सर भावों को उलझा देती है, वहीं अपूर्वा की भाषा की सादगी, जटिल से जटिल संवेदनाओं को भी पारदर्शी बना देती है।

'स्मृति नाद' की ये रचनाएँ पाठक को एक ऐसी संवेदनात्मक यात्रा पर ले जाती हैं जहाँ मृत्यु अंत नहीं, बल्कि स्मृतियों के 'चहचहाने' की शुरुआत है। यह लेखन शोक को भी पवित्रता प्रदान करता है और उस रिक्तता को गरिमा देता है जो किसी प्रिय के जाने से उत्पन्न हुई है। लेखिका की भाषा में एक सहज प्रवाह और 'एपिफ़ेनिक' क्षणों को पकड़ने की अद्भुत क्षमता है। जो पाठक को अपनी जड़ों की ओर लौटने और अपने भीतर जलते 'दीपक' को पहचानने के लिए प्रेरित करता है। आज के शोर-शराबे और कोलाहल भरे युग में, स्मृति नाद की ये कविताएँ एक जलतरंग की भाँति शान्तिदायक और सुरीली ध्वनि उत्पन्न करती हैं। यह मात्र लेखन नहीं, बल्कि एक 'शब्दोत्सव' है शब्दों का एक ऐसा त्योहार जो पाठक के मन-मस्तिष्क को हमेशा आनंदित करता रहेगा ।

पुस्तक के अंतिम पृष्ठों पर अपूर्वा ने अपनी अमूल्य निधियों को सहेजा है। ये अमूल्य निधियाँ वे पत्र हैं जो उनके बचपन से लेकर आज तक उन्हें कई वरिष्ठ लेखकों ने लिखें हैं।

यह संग्रह यह स्थापित करता है कि स्मृतियाँ ही वह सेतु हैं, जो अतीत, वर्तमान और भविष्य को जोड़ती हैं, और मनुष्य के अस्तित्व को गहराई और अर्थ प्रदान करती हैं। लेखिका की यह कलात्मकता पाठकों की स्मृति के कोश में इस कदर रच-बस जाएगी है कि वे लंबे समय तक इस प्रभाव से मुक्त नहीं हो पाएंगे।

अपूर्वा की लेखनी में वह सामर्थ्य है जो पुरानी रूढ़ियों से अलग हटकर एक नया कैनवास रच सके। साहित्य के इस विशाल परिवार में उनका स्वागत और भविष्य के लिए ढेर सारी शुभकामनाएँ।

डॉ पारुल तोमर

नई दिल्ली

स्मृति नाद ( काव्य संग्रह)

लेखिका-अपूर्वा

मूल्य-199

बोधि प्रकाशन जयपुर