भारत छोड़ो आंदोलन: 9 अगस्त को लोहिया ने क्यों कहा था ‘भारत की जनता का दिन’?

भारत छोड़ो आंदोलन के 9 अगस्त 1942 के महत्व को लोहिया की दृष्टि से समझिए। क्यों था यह ‘भारत की जनता का दिन’ और आजादी के संघर्ष में जनता की क्या भूमिका थी?;

Update: 2026-08-08 17:30 GMT

(समाजवादी आंदोलन से जुड़े लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व शिक्षक और भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला के पूर्व फ़ेलो हैं।)

9 अगस्त: भारत की जनता का दिन क्यों? लोहिया के नजरिए से भारत छोड़ो आंदोलन और आजादी का अर्थ

  • 9 अगस्त: जब जनता ने संभाली आजादी की लड़ाई, लोहिया ने क्यों कहा—यह ‘जनता का दिन’ है

9 अगस्त 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन को डॉ. राममनोहर लोहिया ने ‘भारत की जनता का दिन’ क्यों कहा? जानिए जनता की भूमिका, आजादी की इच्छा और लोहिया की लोकतांत्रिक दृष्टि

भारत छोड़ो आंदोलन और 9 अगस्त 1942: जब जनता ने संभाली आंदोलन की कमान

  • लोहिया के लिए 9 अगस्त ‘जनता का दिन’ क्यों था?
  • भारत छोड़ो आंदोलन में आम जनता, महिलाओं और देशी रियासतों की भूमिका
  • आजादी की इच्छा से आजादी के संकल्प तक: 9 अगस्त और 26 जनवरी का संबंध
  • 9 अगस्त को भारत की जनता का दिन क्यों कहा जाता है?

9 अगस्त 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत के बाद ब्रिटिश सरकार ने कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को गिरफ्तार कर लिया था। इसके बाद आंदोलन को देशभर में आम जनता, छात्रों, महिलाओं और स्थानीय कार्यकर्ताओं ने आगे बढ़ाया। समाजवादी नेता डॉ. राममनोहर लोहिया ने इसी जनभागीदारी के कारण 9 अगस्त को ‘भारत की जनता का दिन’ कहा था।

भारत छोड़ो आंदोलन दिवस 9 अगस्त के अवसर पर 

प्रेम सिंह

‘‘नौ अगस्त का दिन जनता की महान घटना है और हमेशा बनी रहेगी। पंद्रह अगस्त राज्य की महान घटना थी। लेकिन अभी तक हम 15 अगस्त को धूमधाम से मनाते हैं क्योंकि उस दिन ब्रिटिश वायसराय माउंटबैटन ने भारत के प्रधानमंत्री के साथ हाथ मिलाया था और क्षतिग्रस्त आजादी क्षतिग्रस्त देश को दी थी। नौ अगस्त जनता की इस इच्छा की अभिव्यक्ति थी - हमें आजादी चाहिए और हम आजादी लेंगे। हमारे लंबे इतिहास में पहली बार करोड़ों लोगों ने आजादी की अपनी इच्छा जाहिर की। कुछ जगहों पर इसे जोरदार ढंग से प्रकट किया गया। लेकिन यह इच्छा थोड़े समय तक ही रही, लेकिन मजबूत रही। उसमें दीर्घकालिक तीव्रता नहीं थी। जिस दिन हमारा देश दृढ़ इच्छा प्राप्त कर लेगा उस दिन हम विश्व का सामना कर सकेंगे।’’ डॉ राममनोहर लोहिया

भारत छोड़ो आंदोलन में इक्कीस महीने तक भूमिगत भूमिका निभाने के बाद लोहिया को बंबई में 10 मई 1944 को गिरफ्तार किया गया। पहले लाहौर किले में, और फिर आगरा में उन्हें कैद रखा गया। लाहौर जेल में ब्रिटिश पुलिस ने उन्हें अमानुषिक यंत्रणाएं दीं। दो साल कैद रखने के बाद जून 1946 में लोहिया को छोड़ा गया। आंदोलन में पूरी निष्ठा के साथ सक्रिय हिस्सेदारी करनी वाले लोहिया ने 9 अगस्त को भारत की जनता का दिन क्यों बताया है, और उसे उसी रूप में जोरदार ढंग से मनाने की सलाह क्यों दी है, इस पर थोड़ा विचार करना मुनासिब होगा।

पहली बात, यह सभी जानते हैं कि मुंबई में कांग्रेस के भारत छोड़ो आंदोलन के आह्वान के बाद 9 अगस्त को कांग्रेस के गांधीजी समेत सभी वरिष्ठ नेता गिरफ्तार कर लिए गए थे; कम्युनिस्ट नेतृत्व सोवियत संघ के ‘जनयुद्ध’ में शामिल होते ही आंदोलन का विरोधी हो गया था; सांप्रदायिक ताकतें – हिंदू महासभा, आरएसएस, मुस्लिम लीग आदि – ब्रिटिश सत्ता के साथ थीं; रजवाड़े (प्रिंसली स्टेट्स) आंदोलन को कुचलने के लिए ब्रिटिश सत्ता को आर्थिक और सैन्य सहायता प्रदान कर रहे थे; और वायसराय की कौंसिल में बैठे लोग ब्रिटिश सत्ता के साथ बने ही थे। ऐसे संकट के समय भारतीय जनता ने खुद आंदोलन को सम्हाला और आगे बढ़ाया। जनता के भीतर से ही अलग-अलग जिम्मेदारी निभाने वाला नेतृत्व पैदा हुआ। यह कहने की जरूरत नहीं है कि जनता में यह सामर्थ्य (पॉटेंशल) आजादी के लंबे संघर्ष में हिस्सेदारी के अभ्यास से विकसित हुई थी।

दूसरी बात, भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष के इतिहास में 9 अगस्त भारत की जनता का दिन है, इसका प्रमाण यह भी है कि यह आंदोलन देशव्यापी था जिसमें भारत की विविधतापूर्ण जनता – स्त्री-पुरुष दोनों - ने बड़े पैमाने पर हिस्सेदारी की, और अभूतपूर्व साहस और सहनशीलता का परिचय दिया। यहां तक कि देशी रियासतों की जनता ने ‘प्रजा मण्डल’ कायम करके भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। लोहिया ने रूसी क्रांतिकारी चिंतक लियों ट्राटस्की के हवाले से लिखा है कि रूस की क्रांति में वहां की एक प्रतिशत जनता ने हिस्सा लिया था, जबकि भारत की अगस्त क्रांति में देश के 20 प्रतिशत लोगों ने हिस्सेदारी की। अंग्रेजी समेत सभी भारतीय भाषाओं का कथा-साहित्य इसका प्रमाण है कि 9 अगस्त के दिन फूटा यह यह आंदोलन देशव्यापी था जिसने साहित्यिक कल्पना में आंदोलन के समय से लेकर अभी तक जगह बनाई हुई है।

तीसरी बात, जनता साम्राज्यवादी वर्चस्व और दमन के खिलाफ आजादी की इच्छा (विल टू फ्रीडम) के हथियार से लड़ी थी। वायसराय लिनलिथगो ने कांग्रेस नेताओं पर भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान सशस्त्र बगावत की योजना बनाने, और आंदोलन में बड़े पैमाने पर हिस्सा लेने वाली जनता पर हिंसक गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगाया था। लोहिया ने वायसराय को जेल से लिखे अपने पत्र में कहा, ‘‘श्रीमान लिनलिथगो, मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि यदि हमने सशस्त्र बगावत की योजना बनाई होती, लोगों से हिंसा अपनाने के लिए कहा होता, तो आज गांधीजी स्वतंत्र जनता और उसकी सरकार से आपके प्राणदंड को रुकवाने के लिए कोशिश कर रहे होते।’’

चौथी बात, दूसरे विश्व-युद्ध के बीचों-बीच हुआ भारत छोड़ो आंदोलन कई तरह के विवादों, बहसों और टकरावों, खास कर सोशलिस्ट-कम्युनिस्ट टकराव का केंद्र बन गया था। आंदोलन और उसके नेतृत्व पर दावेदारी तथा आंदोलन के खिलाफ गद्दारी के आरोप-प्रत्यारोप राजनैतिक हलकों में आज तक चलते हैं। लेकिन भारत की जनता उस दौर के प्रगतिशील अंतर्राष्ट्रीयतावादियों और प्रतिक्रियावादी/सांप्रदायिक पुनरुत्थानवादियों दोनों से आगे थी। लोहिया द्वारा 9 अगस्त को भारतीय जनता के नाम करने के बाद आरोप-प्रत्यारोप की स्थिति समाप्त हो जानी चाहिए थी। आशा की जानी चाहिए कि आगे इस विषय में समझदारी से काम लिया जाएगा।

दरअसल, लोहिया की यह मान्यता कि 9 अगस्त भारत की जनता का दिन है, उनकी राजनैतिक दृष्टि से जुड़ी है जिसके तहत वे देश के निर्माण में साधारण लोगों की भूमिका को सबसे ज्यादा महत्व देते हैं। एक सच्चा लोकतांत्रिक होने के नाते वे राज्य को जनता के साथ जनता का राज्य बनाने के समर्थक हैं। तभी उन्होंने ‘जनता का दिन’ और ‘राज्य का दिन’ आमने-सामने रखे हैं। उनकी इस मान्यता में सबसे बड़ी बात यह है कि आजादी भारतीय जनता के संघर्ष का नतीजा थी। लिहाजा, भारतीय राज्य पर स्वामित्व भी जनता का है, कारपोरेट घरानों और उनके सुविधादाता राजनैतिक और बौद्धिक वर्ग का नहीं।

लेख के शुरू में उद्धृत लोहिया के कथन की निरंतरता में आगे आता है, “बहरहाल, यह 9 अगस्त 1942 की पच्चीसवीं वर्षगांठ है। इसे अच्छे तरीके से मनाया जाना चाहिए। इसकी पचासवीं वर्षगांठ इस प्रकार मनाई जाएगी कि 15 अगस्त भूल जाए, बल्कि 26 जनवरी भी पृष्ठभूमि में चला जाए या उसकी समानता में आए। 26 जनवरी [1930] और 9 अगस्त एक ही श्रेणी की घटनाएं हैं। एक ने आजादी की इच्छा की अभिव्यक्ति की और दूसरी ने आजादी के लिए लड़ने का संकल्प दिखाया।”

आंदोलन की 50वीं सालगिरह अगस्त 1992 में थी। एक ऐसा राज्य, जिसने निगम पूंजीवाद की नियामक संस्थाओं के आदेश पर देश की आजादी को ही गिरवीं रख दिया हो; और एक 500 साल पुरानी मस्जिद का ध्वंस कर संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता के मूल्य को तिलांजलि दे दी हो, की गांठ में 9 अगस्त की चेतना बची ही कहां थी कि वह उसकी 50वीं वर्षगांठ मनाता!

(समाजवादी आंदोलन से जुड़े लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व शिक्षक और भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला के पूर्व फेलो हैं)

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