गाज़ा युद्ध के 1000 दिन: दिल्ली में फ़िलिस्तीन के समर्थन में कविताएँ, प्रतिरोध और न्याय की आवाज़

गाज़ा में इज़राइली हमलों के 1000वें दिन दिल्ली में IPSN की सभा हुई। वक्ताओं ने फ़िलिस्तीन, न्याय, शांति और मानवाधिकारों के समर्थन में अपनी बात रखी।;

By :  Hastakshep
Update: 2026-07-05 15:50 GMT

1,000 Days of the Gaza War: Voices of Poetry, Resistance, and Justice for Palestine in Delhi

गाज़ा नरसंहार के 1000 दिन: दिल्ली में IPSN की एकजुटता सभा, वक्ताओं ने कहा— सत्य और न्याय की जीत होगी, मानवता की विजय होगी

गाज़ा संकट: 1000वें दिन दिल्ली में फ़िलिस्तीन के समर्थन में जुटे बुद्धिजीवी, पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता

  • गाज़ा पर इज़राइली हमलों के 1000 दिन: दिल्ली में फ़िलिस्तीन के समर्थन में IPSN की सभा, उठी न्याय और शांति की मांग
  • 'अगर मुझे मरना ही है…' रिफ़ात अल-अरीर की कविता से शुरू हुई गाज़ा के 1000वें दिन की यादगार सभा

Description

नई दिल्ली में इंडो पैलेस्टाइन सॉलिडेरिटी नेटवर्क (IPSN) ने गाज़ा में इज़राइली सैन्य अभियान के 1000वें दिन एक एकजुटता सभा आयोजित की। कार्यक्रम में फ़िलिस्तीन के इतिहास, नकबा, गाज़ा की मानवीय स्थिति, पत्रकारों की सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय राजनीति और न्यायपूर्ण शांति की आवश्यकता पर वक्ताओं ने अपने विचार रखे। सभा की शुरुआत फ़िलिस्तीनी कवि रिफ़ात अल-अरीर की कविता से हुई तथा अंत में फ़िलिस्तीन के समर्थन में अभियान तेज़ करने का संकल्प लिया गया।

सत्य और न्याय की जीत होगी, जीवन और मानवता की विजय होगी

गाज़ा में नरसंहार के 1000वें दिन को कविताओं और एकजुटता भाषणों के साथ किया गया याद

— विनीत तिवारी

नई दिल्ली। 5 जुलाई 2026. "अगर मुझे मरना ही है / तो तुम्हें जीना होगा / मेरी कहानी सुनाने के लिए / ... अगर मुझे मरना ही है / तो मेरी मौत एक उम्मीद लेकर तो आये / उसकी एक दास्तान तो बने।"

ये पंक्तियाँ रिफ़ात अल-अरीर की कविता से हैं जिनकी 6 दिसंबर 2023 को फ़िलिस्तीन के गाज़ा में इज़राइली हवाई हमले में उनके भाई, बहन और उनके बच्चों के साथ हत्या कर दी गई। अपनी मौत से महज़ पाँच हफ्ते पहले उन्होंने यह कविता लिखी थी और उसे अपने ट्विटर पर पिन किया था।

इन्हीं पंक्तियों और अन्य कविताओं के साथ उम्मीद जगाने, और फ़िलिस्तीनी लोगों की कुर्बानियों और बहादुरी की दास्तान कहने के लिए आयोजित सभा की शुरुआत हुई थी। यह बैठक 2 जुलाई 2026 को इंडो पैलेस्टाइन सॉलिडेरिटी नेटवर्क (IPSN) ने नई दिल्ली के प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया में आयोजित की। यह आयोजन 7 अक्टूबर 2023 से इज़राइल द्वारा गाज़ा पर थोपे गए नरसंहार के 1000वें दिन के मौक़े पर रखा गया था। इस काव्यात्मक शुरुआत के बाद सभा को कुछ कड़वे और कठोर तथ्यों तथा मुनाफ़े के भूखे साम्राज्यवादी ताकतों के छिपे हुए राजनीतिक मंसूबों से अवगत कराया गया, जिनके कारण फ़िलिस्तीन की सुंदर धरती और जीवन, तबाही और संकट में बदल गया है।

गोवा से आए वरिष्ठ पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. रंजन सोलोमन इस दिन के मुख्य वक्ता थे। उन्होंने "स्मृति, प्रतिरोध और अधूरा सवाल: लगातार जारी नकबा" विषय पर सभा को संबोधित किया। वे जून 2026 में वेस्ट बैंक, फ़िलिस्तीन से लौटे थे। उन्होंने वहाँ के हालात का अपना प्रत्यक्ष और चश्मदीद ब्यौरा साझा किया।

उन्होंने कहा कि 7 अक्टूबर 2023 एक महत्त्वपूर्ण तारीख है क्योंकि उस दिन इज़राइल ने फ़िलिस्तीनी लोगों के दमन और जातीय सफ़ाये का एक नया दौर शुरू किया। लेकिन यह भूलना नहीं चाहिए कि फ़लस्तीन में संकट 7 अक्टूबर से शुरू नहीं हुआ है। बल्कि जो 7 अक्टूबर 2023 के बहुत वर्षों पहले से फ़लस्तीनी लोगों पर अत्याचार होता आ रहा है। यह कोई नई बात नहीं है। फ़िलिस्तीनी लोग 1948 के नकबा को भी पुराना इतिहास नहीं मानते। यह एक जारी क्रूरता है, जो हर बीतते दिन के साथ और बदतर होती जा रही है।

रंजन ने कहा कि नकबा एक जीती-जागती स्मृति है। कई परिवार अभी भी उन घरों की चाबियाँ सँजोए रखते हैं जिनमें वे अब प्रवेश नहीं कर सकते। ये चाबियाँ केवल पुरानी यादगार नहीं हैं। ये एक यादों में बसे गाँव की, एक खोये हुए घर की और सबसे बढ़कर एक ऐसे अन्याय की निशानी हैं, जो अभी तक सुलझा नहीं है। यह इतिहास को मिटने न देने का संकल्प है।

फ़िलिस्तीन पर इज़रायल के अत्याचार की यह कहानी 1948 में खत्म नहीं हुई। उन्होंने बताया कि फ़िलिस्तीन का आधुनिक इतिहास औपनिवेशवाद, राष्ट्रवाद, विस्थापन और ज़मीन पर लड़ी जाने वाली लड़ाइयों के के इतिहास से अलग नहीं है। सन 1948 में इज़राइल की स्थापना के समय हुए युद्ध में लगभग 7 लाख 50 हज़ार फ़िलिस्तीनी अपने घरों से उजाड़ दिए गए। सैकड़ों गाँव उजाड़ दिए गए या नष्ट कर दिए गए। परिवार सरहदों के पार बिखर गए। एक शरणार्थी संकट पैदा हुआ जो आज भी अनसुलझा है।

रंजन ने कहा कि इज़रायल फ़िलिस्तीनी ज़मीनों पर आक्रमण जारी रखे हुए है और फ़िलिस्तीनी लोगों पर क्रूरता थोप रहा है। शांतिपूर्ण समाधान चाहने वाले लोगों के सामने यह सवाल खड़ा है कि "क्या फ़िलिस्तीनी राज्य तब भी बन सकता है जब उस ज़मीन पर इज़रायली बस्तियाँ लगातार अपना क़ब्ज़ा बढ़ाती जा रही हैं, जिस पर वह राज्य बनना है?" जवाब साफ़ है — इज़रायली क़ब्ज़ा खत्म होना चाहिए और एक न्यायपूर्ण शांति स्थापित होनी चाहिए।

सभा के विशेष अतिथि, फ़िलिस्तीन राज्य के राजदूत डॉ. अब्दुल्ला एम. अबू शावेश ने आईपीएसएन को गाज़ा में नरसंहार के 1000वें दिन को याद करने के लिए इस सार्थक कार्यक्रम के आयोजन पर धन्यवाद दिया। उन्होंने कहा कि वे फ़िलिस्तीनी लोगों के लिए न्याय, आज़ादी और सम्मान की माँग में आईपीएसएन के साथियों की इस एकजुटता और प्रतिबद्धता से बहुत प्रभावित हैं।

उन्होंने यह भी बताया कि 7 अक्टूबर 2023 के बाद पिछले कुछ महीनों में उनके चचेरे भाई और परिवार के अन्य सदस्य भी इज़राइल द्वारा मारे गए हैं। उन्होंने कहा कि जब लोग कहते हैं कि इज़राइल ने हमास के हमले का जवाब दिया, तो उन्हें यह सवाल ज़रूर पूछना चाहिए — "7 अक्टूबर 2023 को हुआ क्या था? क्यों हुआ था? किसने किया था? आदि।"

उन्होंने कहा कि बेशक हमास के फ़िलिस्तीनी लड़ाकों ने इज़राइल पर हमला किया, सैकड़ों इज़राइली नागरिकों को मारा और लगभग 200 को बंधक बनाया। लेकिन क्यों? हमास ने ऐसा क्यों किया? सीधी-सी बात है — वे अब और दमन और बर्बरता बर्दाश्त करने में असमर्थ थे।

और यह भी ज़ेहन में रखें — हमास क्या है? एक समय हमास को अमेरिका ने फ़िलिस्तीनी संघर्ष को बाँटने के लिए बनाया था। यह कोई छिपी बात नहीं है, यह गूगल जैसे सार्वजनिक मंचों पर उपलब्ध जानकारी है। आज हमास और इज़रायल के बीच दुश्मनी हो गई तो इज़रायल और अमेरिका ने हमास का बहाना लेकर आम निर्दोष फ़िलिस्तीनी लोगों को क़त्ल करना और फ़िलिस्तीनी ज़मीन पर क़ब्ज़ा करना शुरू कर दिया है। इसलिए सही इतिहास जानना बेहद ज़रूरी है। ज़ायोनिज़्म इतिहास को मिटाना या झुठलाना चाहता है।

उन्होंने यह भी बताया कि 1917 में भारतीय सैनिकों ने ब्रिटिश सेना में हाइफ़ा में लड़ाई लड़ी थी, लेकिन वह ज़मीन फ़िलिस्तीन की थी, इज़राइल की नहीं — जैसा कि तथाकथित नयी कहानियाँ बताई जा रही हैं। फ़िलिस्तीन का नाम पौराणिक ग्रंथों में भी आता है, जिसका मतलब है कि यह तब भी अस्तित्व में था जब इज़राइल का कोई वजूद नहीं था। उन्होंने कहा कि फ़िलिस्तीनी लोग केवल अपने लिए नहीं, बल्कि दुनिया में सत्य और न्याय की जीत के लिए लड़ रहे हैं। फ़िलिस्तीन बहादुरी और सच्चाई का पर्याय भी है।

जाने-माने पत्रकार और न्यूज़क्लिक के संपादक प्रबीर पुरकायस्थ भी सभा में उपस्थित थे और उन्हें संक्षेप में अपनी बात रखने के लिए आमंत्रित किया गया। उन्होंने कहा कि सबसे पहले यह साफ़ होना चाहिए कि यह दो समुदायों, यानी यहूदियों और मुसलमानों की लड़ाई नहीं है। यह वह रूप है जो अमेरिका और इज़राइल की साम्राज्यवादी ताकतों ने इस संकट को दिया है। उन्होंने सभा को याद दिलाया कि इज़राइल का उस ज़मीन पर कोई स्वाभाविक हक़ नहीं था। उन्होंने वह जगह यूरोप की उकसावट और समर्थन से हथियाई। उन्होंने पूछा कि यूरोप ने किस वैधता से यहूदियों के पुनर्वास की समस्या उस क्षेत्र में थोप दी जिससे उनका कोई वास्तविक संबंध नहीं था। पश्चिम, और खासकर अमेरिका ने, इज़राइल को भारी सैन्य समर्थन और आर्थिक सहायता देकर एक क्षेत्रीय ताकत के रूप में उभरने में मदद की, जो आज अरबों डॉलर तक पहुँच चुकी है। इसी ताकत ने उसे एक क्षेत्रीय महाशक्ति बना दिया है। इज़राइल लगातार फ़िलिस्तीनी अरबों और अन्य पड़ोसी देशों को तबाह करने में लगा है।

प्रबीर ने यह कहते हुए अपनी बात समाप्त की कि उम्मीद है क्योंकि फ़िलिस्तीनियों ने हार नहीं मानी है। उन्होंने याद किया कि जब वे वहाँ गए तो उन्होंने एक बुज़ुर्ग महिला से मुलाकात की, जिसने उन्हें कहा — "हम किसी भी हालत में अपना देश नहीं छोड़ेंगे।" ऐसी कठिन परिस्थितियों में उनका टिके रहना ही उनका प्रतिरोध है।

जानी-मानी सामाजिक कार्यकर्ता मैमूना मोल्लाह ने बैठक का संचालन किया। उन्होंने फ़िलिस्तीन, यमन, लेबनान, सीरिया और पश्चिम एशिया के अन्य देशों के संघर्षरत लोगों के साथ एकजुटता का एक बयान पढ़ा। सभा ने यह दृढ़ता से माना कि फ़िलिस्तीनियों की आज़ादी और मुक्ति के लिए इज़रायली क़ब्ज़े का अंत और एक न्यायपूर्ण शांति की शुरुआत अनिवार्य है।

शुरुआत में वरिष्ठ अर्थशास्त्री डॉ. जया मेहता ने रिफ़ात अल-अरीर की कविता पढ़ी। डॉ. सैयदा हामिद ने फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का कलाम सुनाया। डॉ. जॉयसिया थोराट ने फ़िलिस्तीनी कवि मुसाब अबू तोहा और महमूद दरवेश की अनूदित कविताएँ पढ़ीं। विनीत तिवारी ने फ़िलिस्तीनी कवयित्री लिसा सुहैर मजाज की अनूदित कविता पढ़ी। प्रबीर पुरकायस्थ को दमनकारी राज्य के विरुद्ध उनके संघर्ष के लिए सम्मानित किया गया।

जाने-माने विद्वान प्रो. चमनलाल, ईश मिश्र, पत्रकार रामशरण जोशी, कवि अजय सिंह, मुकुल सरल, पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव, रंगमंच कार्यकर्ता मनीष श्रीवास्तव, पत्रकार भाषा सिंह, सामाजिक कार्यकर्ता बेज़वाड़ा विल्सन और लेखक बजरंग बिहारी तिवारी भी खचाखच भरे हॉल में उपस्थित रहे।

अंत में प्रख्यात पत्रकार जॉन दयाल ने सभा को संबोधित किया। उन्होंने बताया कि 7 अकटूबर 2005 से अब तक गाज़ा में 226 फ़िलिस्तीनी पत्रकारों को IDF (इज़राइली रक्षा बल) ने मार दिया है। वर्ष 1948 के पहले नकबा से अब तक खोई गई निर्दोष जिंदगियों की याद में दो मिनट का मौन रखा गया।

IPSN ने फ़िलिस्तीन की आज़ादी और मुक्ति के समर्थन में विस्तृत अभियान और वकालत के ज़रिए अपने आंदोलन को और आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता जताई है।

Summary

यह रिपोर्ट 2 जुलाई 2026 को नई दिल्ली के प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में आयोजित इंडो पैलेस्टाइन सॉलिडेरिटी नेटवर्क (IPSN) के कार्यक्रम पर आधारित है। कार्यक्रम गाज़ा में जारी युद्ध के 1000वें दिन के संदर्भ में आयोजित किया गया, जिसमें फ़िलिस्तीन के इतिहास, 1948 के नकबा, मानवीय संकट, अंतरराष्ट्रीय राजनीति, युद्ध, मानवाधिकार, पत्रकारों की सुरक्षा तथा न्यायपूर्ण शांति जैसे विषयों पर चर्चा हुई। इसमें फ़िलिस्तीन के राजदूत, वरिष्ठ पत्रकारों, शिक्षाविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भाग लिया।

FAQ (AEO)

प्रश्न: गाज़ा में 1000वें दिन का कार्यक्रम किसने आयोजित किया?

उत्तर: इंडो पैलेस्टाइन सॉलिडेरिटी नेटवर्क (IPSN) ने 2 जुलाई 2026 को नई दिल्ली के प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में यह कार्यक्रम आयोजित किया।

प्रश्न: कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य क्या था?

उत्तर: गाज़ा में जारी युद्ध के 1000वें दिन फ़िलिस्तीनी नागरिकों के प्रति एकजुटता व्यक्त करना तथा न्यायपूर्ण शांति और मानवाधिकारों की मांग को दोहराना।

प्रश्न: कार्यक्रम में किन प्रमुख वक्ताओं ने भाग लिया?

उत्तर: डॉ. रंजन सोलोमन, फ़िलिस्तीन के राजदूत डॉ. अब्दुल्ला एम. अबू शावेश, पत्रकार प्रबीर पुरकायस्थ, जॉन दयाल सहित अनेक शिक्षाविद, पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता उपस्थित रहे।

प्रश्न: कार्यक्रम की शुरुआत किससे हुई?

उत्तर: फ़िलिस्तीनी कवि रिफ़ात अल-अरीर की कविता "अगर मुझे मरना ही है" के पाठ से कार्यक्रम की शुरुआत हुई।

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