युद्ध का दंश: अन्तरराष्ट्रीय समुदाय की निष्क्रियता से 24 हज़ार से अधिक बच्चे हुए प्रभावित, यूएन ने जताई गहरी चिंता
यूएन रिपोर्ट के अनुसार 2025 में युद्धग्रस्त क्षेत्रों में 24 हजार से अधिक बच्चे प्रभावित हुए। अंतरराष्ट्रीय समुदाय की निष्क्रियता पर संयुक्त राष्ट्र ने गंभीर चिंता जताई;
Violation of children's rights in war!
सशस्त्र संघर्षों में बच्चों पर बढ़ते अत्याचार: यूएन ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय की निष्क्रियता पर उठाए सवाल
- युद्ध की सबसे बड़ी कीमत चुका रहे बच्चे, 2025 में अधिकार उल्लंघन के 38,558 मामले दर्ज
- स्कूल और अस्पताल बने रणभूमि: युद्धग्रस्त क्षेत्रों में बच्चों की सुरक्षा पर यूएन की चेतावनी
- UN Report: युद्ध और हिंसा के बीच फंसे बच्चे, रिकॉर्ड स्तर पर बढ़े मानवाधिकार उल्लंघन
- बच्चों के खिलाफ युद्ध अपराधों पर यूएन का आरोप-पत्र, वैश्विक नेतृत्व की निष्क्रियता कटघरे में
युद्ध और हिंसक संघर्षों का सबसे बड़ा दंश बच्चे झेल रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र की नई रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि 2025 में बच्चों के अधिकारों के उल्लंघन के 38,558 मामले दर्ज हुए। यूएन अधिकारियों ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय की निष्क्रियता को बच्चों की बढ़ती पीड़ा का प्रमुख कारण बताया है।
- सशस्त्र संघर्षों में बच्चों पर बढ़ते हमलों को लेकर यूएन की चेतावनी
- वैनेसा फ़्रेज़ियर ने क्यों कहा— निष्क्रियता एक राजनीतिक विकल्प है?
- 2025 में बच्चों के अधिकार उल्लंघन के रिकॉर्ड 38,558 मामले दर्ज
- बच्चों पर युद्ध का असर: हत्या, अपहरण, यौन हिंसा और जबरन भर्ती
- स्कूल, अस्पताल और जल केन्द्र क्यों बन रहे हैं युद्ध के निशाने?
- यूनीसेफ़ प्रमुख कैथरीन रसैल ने अंतरराष्ट्रीय कानून के उल्लंघन पर जताई चिंता
- सरकारी सुरक्षा बलों की भूमिका पर रिपोर्ट का चौंकाने वाला खुलासा
- बच्चों की सुरक्षा के लिए संयुक्त राष्ट्र ने क्या तत्काल कदम सुझाए?
- युद्धग्रस्त क्षेत्रों में बच्चों के अधिकारों की रक्षा क्यों जरूरी है?
युद्ध का दंश: 'अन्तरराष्ट्रीय समुदाय की निष्क्रियता का ख़ामियाज़ा भुगत रहे हैं बच्चे'
पिछले कई दशकों से उपलब्ध प्रमाणों, चेतावनियों और अपीलों के बाद, अन्तरराष्ट्रीय समुदाय यह दावा नहीं कर सकता है कि उसके पास यह जानकारी ही नहीं है कि सशस्त्र टकरावों में बच्चों के साथ क्या हो रहा है. बच्चों और हथियारबन्द संघर्षों के विषय पर यूएन महासचिव की विशेष प्रतिनिधि वैनेसा फ़्रेज़ियर ने सुरक्षा परिषद की वार्षिक बैठक को सम्बोधित करते हुए यह बात कही है.
जून महीने के लिए सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष देश, कोलम्बिया ने बुधवार को यह बैठक बुलाई, जिसमें बाल कल्याण की रक्षा करने, उल्लंघन मामलों की रोकथाम करने और अन्तरराष्ट्रीय क़ानूनी दायित्वों पर बल देने पर चर्चा हुई.
विशेष प्रतिनिधि वैनेसा फ़्रेज़ियर के अनुसार, निष्क्रियता कोई अज्ञानता का नतीजा नहीं है बल्कि यह सचेत होकर चुना गया एक राजनैतिक विकल्प है, जिसके प्रभाव को बच्चों के दैनिक जीवन में देखा जा सकता है.
उन्होंने कहा कि सशस्त्र टकराव और बच्चों के मुद्दे पर, यूएन महासचिव की रिपोर्ट को सुरक्षा परिषद, सदस्य देशों और अन्तरराष्ट्रीय समुदाय की अन्तरात्मा को झकझोर देना चाहिए.
“इसे आत्मसंतुष्टि की भावना को विचलित करना चाहिए, सौम्य शब्दों व घुमा-फिराकर कही जाने वाली बातों का भ्रम तोड़ देना चाहिए और सशस्त्र संघर्षों में बच्चों को जिन कठोर वास्तविकताओं का सामना करना पड़ता है, उनके बारे में हर बची-खुची भ्रान्ति को दूर किया जाना चाहिए.”
विशेष प्रतिनिधि ने इस रिपोर्ट को निष्क्रियता के विरुद्ध एक आरोप-पत्र बताते हुए कहा कि यह बच्चों की रक्षा के लिए पहले से उपलब्ध साधानों के कारगर उपयोग का आहवान है.
यूएन निगरानी तंत्र द्वारा जुटाए गए प्रमाणों के अनुसार, वर्ष 2025 में बच्चों के अधिकार उल्लंघन के 38,558 मामले दर्ज किए गए हैं, जिनसे 24 हज़ार से अधिक बच्चे प्रभावित हैं. उन्होंने कहा कि बच्चों और सशस्त्र टकराव के विषय में अधिदेश स्थापित होने के बाद से यह किसी एक वर्ष में प्रभावित बच्चों की सर्वाधिक संख्या है.
इन उल्लंघन मामलों में बच्चों को जान से मारना, उन्हें अपंग बनाना, हथियारबन्द गुटों द्वारा लड़ाकों के रूप में भर्ती करना, अगवा करना, यौन हिंसा का शिकार बनाना, मानवीय सहायता से दूर रखना, शिक्षा, स्वास्थ्य व संरक्षण सेवाओं से वंचित रखना समेत अन्य उल्लंघन मामले हैं.
स्कूल, रणभूमि नहीं हैं
संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (UNICEF) की कार्यकारी निदेशक कैथरीन रसैल ने क्षोभ व्यक्त करते हुए कहा कि स्कूलों, अस्पतालों और जल वितरण केन्द्रों को कभी भी रणभूमि में नहीं बदला जाना चाहिए.
इसके बावजूद, लाखों बच्चे हिंसक टकराव की छाया में जीवन गुज़ार रहे हैं और वे इस वास्तविकता का रोज़ सामना करते हैं.
यूनीसेफ़ प्रमुख के अनुसार, असुरक्षा, पहुँच न होने और बदले की भावना से कार्रवाई के भय की वजह से बहुत से मामलों में उल्लंघन मामलों की जानकारी एकत्र कर पाना सम्भव नहीं होता है और सक्रिय युद्ध क्षेत्रों में दुर्व्यवहार मामलों में प्रमाण जुटा पाना बहुत कठिन है.
“ये आँकड़े दर्शाते हैं कि अन्तरराष्ट्रीय क़ानून के तहत बच्चों के लिए संरक्षण व्यवस्था का अब कहीं अधिक संख्या में और बड़ी क़ीमत पर उल्लंघन किया जा रहा है.”
रिपोर्ट में पहली बार एक चिन्ताजनक निष्कर्ष भी साझा किया गया है: सरकारी सुरक्षा बल और सम्बद्ध गुट, ग़ैर-सरकारी तत्वों की तुलना में कहीं ज़्यादा, अधिकार उल्लंघन मामलों के लिए ज़िम्मेदार हैं.
तुरन्त कार्रवाई पर बल
कार्यकारी निदेशक कैथरीन रसैल ने कहा कि इस निष्कर्ष से इस कक्ष में उपस्थित हर एक देश को चेत जाना चाहिए और उनकी रक्षा के लिए क़ानूनी व नीतिगत फ़्रेमवर्क को सर्वोपरि रखना होगा और ज़िम्मेदार लोगों की जवाबदेही को सुनिश्चित किया जाना होगा.
यूनीसेफ़ की शीर्ष अधिकारी ने कहा कि वास्तविकता के अनुरूप जल्द से जल्द क़दम उठाने होंगे. साथ ही, उन्होंने सदस्य देशों से अनुरोध किया गया है युद्धरत पक्षों को मानवतावादी व मानवाधिकार क़ानून का पालन करने के लिए उन्हें प्रभाव का इस्तेमाल करना होगा.
“कोई भी, बच्चों पर युद्ध की वजह से हो रहे प्रभावों पर जानकारी न होने के तर्क का सहारा नहीं ले सकता है.”
उन्होंने कहा कि हिंसक टकराव में सभी पक्षों को बच्चों को बचाने के लिए क़दम उठाने होंगे, शिक्षा के विरुद्ध हमले रोकने होंगे और उल्लंघन मामलों की जवाबदेही तय की जानी ज़रूरी है.
FAQs
युद्ध में बच्चों के अधिकारों का उल्लंघन कितने स्तर तक बढ़ गया है?
यूएन रिपोर्ट के अनुसार 2025 में बच्चों के अधिकार उल्लंघन के 38,558 मामले दर्ज किए गए, जिनसे 24 हजार से अधिक बच्चे प्रभावित हुए।
संयुक्त राष्ट्र ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय पर क्या आरोप लगाया है?
यूएन अधिकारियों ने कहा कि बच्चों की पीड़ा के प्रति निष्क्रियता अज्ञानता नहीं बल्कि एक राजनीतिक विकल्प है।
युद्धग्रस्त क्षेत्रों में बच्चों के खिलाफ सबसे आम अपराध कौन से हैं?
हत्या, अपंग बनाना, अपहरण, यौन हिंसा, जबरन भर्ती, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित करना प्रमुख उल्लंघन हैं।
यूनीसेफ़ ने स्कूलों और अस्पतालों को लेकर क्या कहा?
यूनीसेफ़ ने कहा कि स्कूल, अस्पताल और जल वितरण केन्द्र कभी भी युद्ध का मैदान नहीं बनने चाहिए।
रिपोर्ट में सबसे चिंताजनक खुलासा क्या है?
रिपोर्ट के अनुसार पहली बार सरकारी सुरक्षा बल और उनसे जुड़े समूह गैर-सरकारी सशस्त्र गुटों की तुलना में अधिक उल्लंघनों के लिए जिम्मेदार पाए गए।