प्रेम,प्रकृति और परम्परा की सतरंगी बारिश में भीगी डॉ. कविता अरोरा की श्रव्य - दृश्य कविताएँ
The international launch of Indian author Kavita Arora's book 'Sham Ki Tapri' took place at the Rustaveli National Theatre.
-डॉ. रमाकांत शर्मा
आज की कवयित्रियों में एक नाम ऐसा भी है जो अपनी विशेष काव्यसंवेदना और रचनाशीलता के चलते अपनी सर्वथा अलग पहचान बनाने में क़ामयाब हुआ है। जी हाँ, उस कवियत्री का नाम है डॉ. कविता अरोरा।
डॉ.कविता अरोरा के अब तक तीन कविता - संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं :
1.पैबंद की हँसी
2.चाँद का शरगा
3.कागज़ के नीले साहिल
अलावा इसके, आपकी कविताएँ देश की प्रमुख पत्र - पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशित और आकाशवाणी - दूरदर्शन से प्रसारित होती रही हैं। अनेक वीडियो और मंचों से इनकी कविताएँ सुनी और सराही जाती रही हैं।
कविता अरोरा की कविताओं से गुज़रते हुए मैंने यह महसूस किया कि इनकी एक नहीं, अनेक कविताएँ मानो प्रेमरस के सरोवर में डुबकियां लगाने वाली सद्य स्नाताएँ हैं। जहाँ अमृता प्रीतम की रचनाओं का कहीं प्रत्यक्ष तो कहीं परोक्ष रूप में प्रभाव भी लक्षित किया जा सकता है। जहाँ प्रेम का संबंध देह से नहीं, बल्कि दो आत्माओं से है। रूह से है।
ये ऐसी कविताएँ हैं जो सीधे दिल में उतरने का हुनर रखती हैं। उदाहरण स्वरूप देखिए कवयित्री अपनी ' बसंत के फूल ' कविता में प्रेम में पड़ी एक अल्हड़ लड़की की मनोदशा को व्यक्त करती हुई कहती है:
जब वह टहलती
तब मुंडेर पर
बसंत के फूल खिलते थे
हवाओं में गेसू
सरसराकर पतंगों से
खुलते थे
****
उल्टी किताब थामे
टहलकर
सबक याद करती लड़की
सुना है इश्क़ में
पागल थी।
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इसी प्रकार डॉ. कविता अपनी कविता ' इश्क़ का घर ' में लिखती हैं :
वो सतरह साल की
लड़कियाँ
साड़ी के पल्लू को
पिन से जोड़ती
ख़्वाबों के सतरंगी
फ़लक पर दौड़ती
****
लड़कियों की आँखें
निडर हैं
यहीं तो निगोड़े
इश्क़ का घर है।
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जैसा कि मैंने पूर्व में कहा कि डॉ. कविता अरोरा को अमृता प्रीतम की प्रेम कविताएँ पसंद हैं। आत्मिक प्रेम से बढ़कर दुनिया में कुछ भी नहीं। इस संदर्भ में ' इमरोज़ ' शीर्षक कविता की इन पंक्तियों को पढ़ा जा सकता है :
मैंने कभी सोचा नहीं था
कि ख़्वाबों की गलियों से
निकल कर
तमाम शिद्दत लिए
रंग भरी कूँचियों से
ता उम्र तुम मुझे ही
सजाते रहोगे।
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कभी तो तुम्हें भी
लगा होगा
किसी रोज़
सफ़्हों की सफ़ेद पीठ पर
खिला दूँ
कोई एक नीला फूल
तुम्हारे लिए भी।
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इसी प्रकार जब वे प्रकृति के विविध रूपों को अपने काव्य के कैनवस पर चित्रित करती हैं तो ऐसा लगता है कवि सुमित्रानंदन पंत अथवा कवि शमशेरबहादुर सिंह की कविताएँ
अपनी श्रव्य - दृश्य बिम्बात्मकता और प्रतीकात्मकता के साथ हमें आवाज़ दे रही हैं।
इनकी कविताओं में आप देखेंगे कि कहीं बादल बुला रहे हैं तो कहीं पक्षी चहचहा रहे हैं। कहीं चाँद - चाँदनी परस्पर बतिया रहे हैं। कहीं नदी सुस्ता रही है तो कहीं वृक्ष रिफ्यूजी हो गए हैं। ऐसे अनेक बिम्ब सहृदय पाठक को अनायास ही आकर्षित करते हैं।
इस तरह इनका प्रेम और प्रकृति चित्रण अपनी अनूठी धज लिए हुए है जो अमृता प्रीतम, सुमित्रानंदन पंत और शमशेर बहादुर की यादें अनायास ही ताज़ा कर देता है। बहरहाल।
चाँद और चाँदनी, वृक्ष और लताएँ, समंदर और नदियाँ, आकाश और पृथ्वी, अमृता और इमरोज़ आदि इनकी कविताओं के मुख्य क़िरदार हैं। कविता जी की कविताओं में इनका आना - जाना, बोलना - बतियाना, देखना और देखते ही जाना इनकी कविताओं में बराबर बना रहता है।
एक और बात। डॉ. कविता अरोरा की कविताओं में गाँव की गंध रची - बसी है। बचपन का अल्हड़पन, मेले -झूले, गलियाँ -चौबारे, छत - आँगन, माँ - दादी की कहानियाँ और सखा-सहेलियों की नोक -झौंक के अनेक प्रसंग वहाँ जीवंत हो उठते हैं।
इन्हें शहर की बहुमंज़िला इमारतें, आपाधापी वाली ज़िंदगी, व्यक्तिगत स्वार्थी नज़रिया रास नहीं आता।जहाँ न अपनी छत है। चाँद भी जहाँ इमारतों के पीछे छिपा बैठा रहता है।
चाँद का शरगा ( चाँद का बादामी रंग का घोड़ा ) कहानी में दौड़ता दिखाई नहीं देता।
इसी प्रकार हम देखते हैं कि शहर में ' अपणायत ' का भाव नहीं है, बल्कि एक तरह का ' अजनबीपन ' है। अपने एक गीत ' नहीं रमते शहरों में मन ' में शहरों के हालात पर कवयित्री डॉ. कविता अरोरा लिखती हैं :
अपनेपन को तरसते हैं
मन
नहीं रमते शहरों में मन।
है प्रीत अटारी
बड़ी सूनी सूनी
न रिश्तों में है
भोलापन
नहीं रमते शहरों में मन।
****
परिंदे तलाशे
छाँव का एक टुकड़ा
हैं इमारतें बहुत पर
शजर सिकुड़ा सिकुड़ा
तुलसियों को नहीं आँगन
नहीं रमते शहरों में मन।
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कविता जी समाज के कटु यथार्थ से भी आँखें चार करती हैं। सियासत के हथकंडे,नौकरशाही, भूख और ग़रीबी के दंश से भी वे बाख़बर हैं। अस्पतालों की दुर्दशा देखकर वे लिखती हैं :
अस्पतालों की भीड़ में
रोज़ दिखते हैं मुझे
लाचार आदमी
बोतलों में ख़ून
सिलेण्डरों में सांस
इंजेक्शन में विटामिन
पेसमेकर में
दिल की धड़कनें
क़ैद हैं।
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हाय
अब तक जोड़ जमा तो
डॉक्टरों की फीस निगल गई।
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घर - परिवार में दरकते रिश्तों की हक़ीक़त कवयित्री डॉ. कविता अरोरा कुछ इस प्रकार बयाँ करती हैं:
प्रेम
अपरिचित हो गया
मजबूरियों की
चादर ओढ़ कर
सारे रिश्ते मौन हो गए।
कल तक
' अज़ीज़ ' थे
अब कौन
हो गए।
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जहां तक कवयित्री कविता की काव्यभाषा और काव्यशिल्प का सवाल है, इनकी काव्यभाषा हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी और पंजाबी
का आफ़ताबी संगम है। यहाँ आमजन की बोली-बानी का मिठास पाठक को आकर्षित करता है। कवयित्री अपनी संवेदनाओं को पूर्ण सहजता और स्वाभाविकता के साथ शब्दों में रूपायित करती है। यद्यपि ये कविताएँ मुक्तछंदी हैं, लेकिन इसके बावजूद कवयित्री ने अपनी मुक्तछंदी कविताओं में आंतरिक लय को बराबर साधे रखा है। इसका विशेष कारण यह है कि कवयित्री स्वयं सुप्रसिद्ध गायिका भी हैं।
मुझे पूरा यक़ीन है कि डॉ. कविता अरोरा की कविताओं का हिंदी के पाठक - जगत में भव्य स्वागत होगा।
अंत में, मैं कवयित्री के रचनात्मक उत्कर्ष की कामना करता हूँ।
- डॉ. रमाकांत शर्मा
rkramakant.sharma(at)gmail.com
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काग़ज़ के नीले साहिल ( कविता - संग्रह )
डॉ. कविता अरोरा
बोधि प्रकाशन, जयपुर
मूल्य : ₹ 200 /-
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चाँद का शरगा ( कविता - संग्रह )
डॉ. कविता अरोरा
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