कस्बाई जीवन का यथार्थ और ज्ञान रंजन: हिंदी कथा साहित्य में संक्रमणशील समाज की पड़ताल

हिंदी कथा साहित्य में ज्ञान रंजन ने कस्बाई जीवन की जटिलताओं, मध्यवर्गीय मानसिकता और मानवीय संबंधों को गहरी संवेदनशीलता के साथ रचा। यह लेख उनके कथा-संसार में कस्बे के यथार्थ और पात्रों के संघर्ष का आलोचनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

By :  Hastakshep
Update: 2026-01-09 17:33 GMT

Gyan Ranjan

कस्बाई जीवन का यथार्थ और ज्ञान रंजन

  • हिंदी कथा साहित्य में कस्बाई जीवन की परंपरा और ज्ञान रंजन
  • ग्रामीण रूमानियत और महानगरीय चमक के बीच का कस्बा
  • कस्बा एक पृष्ठभूमि नहीं, एक जीवंत चरित्र
  • संक्रमणशील समाज और मध्यवर्गीय मानसिकता का चित्रण
  • ज्ञान रंजन के पात्र: साधारण मनुष्य, असाधारण संघर्ष

ज्ञान रंजन की ‘पिता’ कहानी: पीढ़ियों का द्वंद्व और अकेलेपन की संवेदना

हिरण्य हिमकर

हिंदी कथा साहित्य में कस्बाई जीवन की अनुभूतियों को जिस गहरी प्रामाणिकता और संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया गया है, उसमें ज्ञान रंजन का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उन्होंने अपने कथा-संसार को न तो ग्रामीण जीवन की रूमानियत में सीमित रखा और न ही महानगरीय चमक-दमक से आक्रांत होने दिया। उनका कस्बा एक ऐसा जीवंत सामाजिक क्षेत्र है, जहाँ जीवन अपनी समस्त जटिलताओं, अंतर्विरोधों और संघर्षों के साथ उपस्थित होता है। कस्बाई जीवन के तमाम पहलुओं को प्रत्यक्ष अनुभव की प्रामाणिकता के साथ उन्होंने अपनी कहानियों में इस प्रकार रचा है कि पाठक स्वयं को उन परिस्थितियों का साक्षी अनुभव करता है।

ज्ञान रंजन की कहानियों में कस्बा केवल पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि एक सक्रिय चरित्र के रूप में उभरता है। यह कस्बा सामाजिक संरचना, आर्थिक असमानताओं, राजनीतिक चेतना और मध्यवर्गीय मानसिकता का प्रतिनिधि बन जाता है। यहाँ रहने वाले लोग न पूरी तरह ग्रामीण हैं और न ही शहरी; वे परिवर्तन की उस दहलीज पर खड़े हैं, जहाँ पुरानी मान्यताएँ टूट रही हैं और नई आकांक्षाएँ आकार ले रही हैं। ज्ञान रंजन ने इसी संक्रमणशील अवस्था को बड़ी सूक्ष्मता से अपनी कहानियों में उकेरा है।

उनकी कहानियों के पात्र साधारण होते हुए भी असाधारण जीवन-संघर्षों से गुजरते हैं। शिक्षक, क्लर्क, छोटे व्यापारी, छात्र, बेरोजगार युवक, राजनीतिक कार्यकर्ता—ये सभी पात्र कस्बाई जीवन की वास्तविक तस्वीर प्रस्तुत करते हैं। ज्ञान रंजन इन पात्रों को नायक या खलनायक के रूप में गढ़ने के बजाय मनुष्य के रूप में प्रस्तुत करते हैं, जिनमें कमजोरियाँ भी हैं और प्रतिरोध की चेतना भी। उनके पात्र परिस्थितियों से जूझते हुए कभी समझौता करते हैं, तो कभी व्यवस्था के विरुद्ध आंतरिक या बाह्य संघर्ष करते दिखाई देते हैं।

गौरतलब है कि इनकी 'पिता' कहानी में बूढ़ा पिता अपने संततियों से उपेक्षा का शिकार है लेकिन पारिवारिक संस्था को जीवित रखना चाहता है। 'पिता' कहानी में पुरानी पीढ़ी का अपने समकालीन परिवेश से कटते चले जाने का दर्द चित्रित है। लेकिन कहानी में कहीं भी परिवार संस्था का नकार नहीं है। पिता कहानी में दो पीढ़ियों के द्वन्द्व और उससे उपजा अकेलापन कहानी की मूल संवदेना है। उनकी कहानियों के संबंध में कथा आलोचक कुमार कृष्ण का कहना है, "ज्ञानरंजन की कहानियाँ चेको स्लोवाकिया की नहीं अपने देश के मध्यवर्गीय घर, परिवार, पिता, पुत्र, पति-पत्नी, भाई-बहन अर्थात् रिश्तों के बीच में घटित होती कहानियाँ है। ज्ञान रंजन मानवीय संबंधों का मुआयना करने वाले कहानीकार हैं। वह मानवीय रिश्तों की महीन पड़ताल करते हैं।"

ज्ञान रंजन को साहित्य वार्ता और ' आहंग ' की ओर से विनम्र श्रद्धांजलि!!


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