निशा निशांत
ओह लड़की...-१
ओह लड़की !
तूने क्यों बल पड़ी रस्सी चुन ली !
तुझे तो अपने हिस्से की रस्सी को
स्वयं ही बुनना था
देने थे अपने अनुसार ही बल और
मज़बूती के लिए मिलाने थे तीन सिरे
कि जब कभी दिन फिरें तो
तो तेरे पास मज़बूत हो तेरा आधार
सुख के दिनों में झूला बना
हर दिन सावन-सा बनाती
ब्रह्माण्ड के रचे लोकगीत गाती
और दु:ख के दिन ...
सबके जीवन में आते ही हैं
कुछ के जीवन में पहले तो
कुछ के जीवन में बाद में
तो सुख का झूला समेट
दु:ख के दिनों को बाँध देती
किसी नीम की या
पीपल की मज़बूत हरी शाख़ से
कि दिन ये भी बीत जाएँगे...
अपनी बुनी रस्सी तेरे हाथों सधी होती
ओह लड़की !
तब तू अपने ही चुने कठघरे में
बार-बार यों न खडी होती !
🌱निशा निशान्त
शरद पूर्णिमा, १३.१०,२०१९
साँझ की सुरमई चादर बिछाई
सूरज को सिरहाना कर लिया
करवटों में दिशाओं को लिया
आसमान को धरा-सा धर
तारों को चादर-सा तानकर
आकाशगंगा को सपनों-सा सँवार
ओस के कणों की बना बन्दनवार
साँस-साँस भोर की किरण-किरण
उजास के प्रवाह का फैला वितान
आँखों-आँखों में किया सृष्टि को नमन
जीवन का यही गमन, यही आगमन!
••• निशा निशान्त, 5/4/2026
सवाल पर सवाल कर
जवाब पर जवाब दे
सवाल पर जवाब दे
जवाब पर सवाल कर
नहीं है तू कोई कमाल
तो न कर कोई मलाल
दिन-ब-दिन पृष्ठ पर
शब्द-शब्द स्पर्श कर
पृष्ठ-पृष्ठ उजास भर
देहरी-देहरी दीए-सा धर
तिल-तिल तू यूँ न मर
धैर्य धर,सबर कर,सबर
जीव-जीव अमर अमोल
बात न ये कल्पित कपोल
चिन्तन कर रहस्य खोल
बोल-बोल, बोल-बोल
कर न तू अगर मगर
हो न तू इधर-उधर
मंज़िल नहीं यहाँ कहीं
सफ़र ही में हर कोई
बोल-बोल, बोल-बोल
सवाल पर जवाब दे
जवाब पर सवाल कर
॰॰॰निशा निशान्त,15/3/2026
दुःख की चादर झाड़, बिछाई
सोच की सिलवटें सीधी की
सुख की चादर तान रही थी
अहसास हुआ सीलेपन का
नींद हुई फिर कोसों दूर
किसे कोसती, मन मजबूर
जीवन सिरहाने खड़ा हुआ
और पाँव थकन से थे चूर
॰॰॰निशा निशांत,१२/३/२०२६
गुनगुनी धूप गुनगुनाते हुए
गुनगुना राग छेड़ देती है
सर्द सुबह में हौले-हौले
तन-मन को सहलाती है
और अपनी गरमाहट से
पोर-पोर को वीणा के
तारों-सा झनझनाती है
सुप्त, अलसाएपन को
ऊर्जस्वित कर जाती है !
घर में आँगन, दालान और
छत की आवश्यकता
इशारों-इशारों में समझाती है!
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॰॰॰ निशा निशान्त, 6/2/2026