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‘पंडित होई सो हाट न चढ़ा’: किशन पटनायक के चिंतन में बुद्धिजीवी, बौद्धिक गुलामी और बाजारवाद
‘पंडित होई सो हाट न चढ़ा’ में डॉ प्रेम सिंह ने किशन पटनायक के चिंतन के जरिए बुद्धिजीवी-वर्ग, बौद्धिक गुलामी, बाजारवाद, आधुनिक सभ्यता और वैकल्पिक विकास...
‘गाँव से लौटते हुए’ : स्मृतियों, संवेदनाओं और बदलते ग्राम्य जीवन का काव्यात्मक दस्तावेज
डॉ. पारुल के कविता संग्रह ‘गाँव से लौटते हुए’ की समीक्षा—ग्राम्य जीवन, स्मृतियों, रिश्तों और बदलते सामाजिक यथार्थ का संवेदनात्मक विश्लेषण।














